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'जेन जी' विरोध को रचनात्मक आधार भी दें

दिल्ली की हालिया घटनाओं को सरकार और विपक्ष के बीच के तात्कालिक टकराव से कहीं आगे बढ़कर देखने की ज़रूरत है।

जेन जी विरोध को रचनात्मक आधार भी दें
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  • डॉ. सुदर्शन आयंगर

जयप्रकाश नारायण ने 'संपूर्ण क्रांति' का आह्वान कर एक अलग ऐतिहासिक दौर में इसी तरह के विचार को आगे बढ़ाया। उनके आंदोलन ने भ्रष्टाचार, तानाशाही और लोकतांत्रिक संस्थाओं के पतन के खिलाफ छात्रों, नागरिकों और राजनीतिक समूहों को एकजुट किया। आपातकाल के बाद लोकतंत्र की बहाली निस्संदेह भारत के लिए एक बड़ी जीत थी।

दिल्ली की हालिया घटनाओं को सरकार और विपक्ष के बीच के तात्कालिक टकराव से कहीं आगे बढ़कर देखने की ज़रूरत है। भारत में कुछ ज़्यादा गहरी चीज़ आकार ले रही है—नागरिकों (खासकर युवाओं) और उन संस्थाओं के बीच भरोसे का संकट, जिनसे यह उम्मीद की जाती है कि वे रोज़मर्रा की राजनीति से ऊपर उठकर काम करेंगी। चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है। नेशनल टेस्टिंग एजेंसी को परीक्षाएं आयोजित करने के लिए एक स्वायत्त निकाय के रूप में बनाया गया था। फिर भी, मतदाता सूचियों और राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (नेशनल एलिजिबिलिटी कम एंट्रेंस टेस्ट-नीट) को लेकर हुए विवादों ने युवाओं के बीच यह धारणा मज़बूत की है कि जिन संस्थाओं पर उनका भविष्य टिका है वे पर्याप्त रूप से पारदर्शी, जवाबदेह या स्वतंत्र नहीं हैं। बड़ा सवाल यह है कि इतने सारे युवा व्यवस्था की निष्पक्षता पर संदेह क्यों करने लगे हैं?

इसलिए युवाओं के विरोध-प्रदर्शनों पर सरकार की प्रतिक्रिया काफी मायने रखती है। बैरिकेड्स, पाबंदियां, भारी पुलिस बल की तैनाती और लोगों को हिरासत में लेने जैसी कार्रवाइयां शायद किसी तात्कालिक प्रदर्शन को तो नियंत्रित कर लें लेकिन इनसे भरोसा बहाल नहीं हो सकता। कोई भी लोकतंत्र केवल पुलिस के दम पर भरोसे के संकट को हल नहीं कर सकता। जब शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन को मुख्य रूप से 'कानून-व्यवस्था' की समस्या मान लिया जाता है, तो हो सकता है कि सरकार उस पल तो जीत जाए लेकिन वह कुछ ऐसा खो देती है जो कहीं ज़्यादा कीमती है- नागरिकों का भरोसा!

स्थापित राजनीतिक दलों के नेतृत्व में होने वाले विरोध और युवाओं के उस समूह के लामबंद होने में फर्क है जो खुद को किसी राजनीतिक दल का हिस्सा नहीं मानते। सरकारें राजनीतिक दलों को समझती हैं- उनके नेताओं, उनके ढांचे और चुनावी मजबूरियों को। युवाओं का स्वत:स्फूर्त जुड़ाव अधिक लचीला व अनिश्चित होता है और हो सकता है कि यह लंबे समय तक बना रहे। फिर भी, युवाओं का स्वतंत्र रूप से लामबंद होना एक अलग तरह की चुनौती पेश करता है। इन्हें रोजगार, उद्यमिता, तकनीक और विकास के अवसर दिए जा सकते हैं। इन्हें राजनीतिक प्रलोभन देकर या डरा-धमका कर भी बिखेरा जा सकता है तो भी एक चीज को संभालना बहुत मुश्किल है- वह पीढ़ी, जिसका लोकतांत्रिक संस्थाओं से ही भरोसा उठ जाए।

यहीं पर पहले गांधी और बाद में जयप्रकाश नारायण महत्वपूर्ण सबक देते हैं। गांधी ने कभी भी ब्रिटिश शासन के विरोध को ही पूरी 'स्वतंत्रता की लड़ाई' नहीं माना। सत्याग्रह और असहयोग के साथ-साथ एक 'रचनात्मक कार्यक्रम' भी था- सांप्रदायिक सद्भाव, छुआछूत का खात्मा, ग्रामीण उद्योग, शिक्षा, स्वच्छता, स्वास्थ्य, किसानों और मजदूरों के बीच काम, आदिवासियों का कल्याण और ग्रामीण समाज का पुनर्निर्माण। यह रचनात्मक कार्य राजनीतिक संघर्ष का कोई गौण हिस्सा नहीं था बल्कि यह 'स्वराज' की तैयारी थी।

जयप्रकाश नारायण ने 'संपूर्ण क्रांति' का आह्वान कर एक अलग ऐतिहासिक दौर में इसी तरह के विचार को आगे बढ़ाया। उनके आंदोलन ने भ्रष्टाचार, तानाशाही और लोकतांत्रिक संस्थाओं के पतन के खिलाफ छात्रों, नागरिकों और राजनीतिक समूहों को एकजुट किया। आपातकाल के बाद लोकतंत्र की बहाली निस्संदेह भारत के लिए एक बड़ी जीत थी।

इसके बावजूद इतिहास हमारे सामने एक कठिन सवाल छोड़ जाता है- इतने शक्तिशाली राष्ट्रव्यापी आंदोलन के बाद भारत इतनी जल्दी अपने पुराने राजनीतिक और सामाजिक तौर-तरीकों पर वापस क्यों लौट आया? इस आंदोलन ने तानाशाही को हराने में मदद तो की लेकिन 'संपूर्ण क्रांति' कोई ऐसा निरंतर चलने वाला, राष्ट्रव्यापी और गैर-दलीय रचनात्मक कार्यक्रम नहीं बन पाई जिसके जरिए आम नागरिक अपने रोजमर्रा के जीवन में नए लोकतंत्र का अभ्यास जारी रख सकते।

इस आंदोलन से बनी जगह पर राजनीतिक दलों ने कब्ज़ा कर लिया। सरकारें बदलीं लेकिन असमानता, भ्रष्टाचार, सत्ता के केंद्रीकरण और राजनीतिक शक्ति पर निर्भरता जैसी गहरी संरचनाएं बनी रहीं। इससे मिलने वाला सबक असहज है- एक देशव्यापी आंदोलन किसी सरकार को तो हटा सकता है लेकिन वह अकेले समाज का पुनर्निर्माण नहीं कर सकता। सामाजिक पुनर्निर्माण के बिना मिली राजनीतिक जीत, राजनीतिक संस्कृति को काफी हद तक वैसा ही बनाए रख सकती है।

यहीं पर गांधीजी का 'रचनात्मक कार्यक्रम' फिर से प्रासंगिक हो जाता है। युवा केवल विरोध ही क्यों करें? अगर उन्हें चुनाव आयोग पर भरोसा नहीं है तो वे नागरिकों के ऐसे समूह बना सकते हैं जो किसी राजनीतिक दल से न जुड़े हों। ये समूह नागरिकों को मतदाता सूची की जांच करने, उसमें सुधार की प्रक्रिया समझने और वास्तविक अनियमितताओं का दस्तावेजीकरण करने में मदद कर सकते हैं। अगर उन्हें परीक्षा प्रणाली पर भरोसा नहीं है, तो वे ऐसे संस्थागत सुधारों की मांग करें जिससे लाखों परीक्षार्थियों के हितों की रक्षा हो सके। वे बेरोजगारी पर चिंतित हैं तो वे केवल सरकारी नौकरियों के बजाय समुदायों के साथ मिलकर आजीविका, कौशल और उद्यम विकसित करने का काम कर सकते हैं। जलवायु परिवर्तन की चिंता है तो वे जल स्रोतों को पुनर्जीवित करने, खराब हो चुकी जमीन को फिर से उपजाऊ बनाने और किसानों के साथ मिलकर पर्यावरण के अनुकूल आजीविका पर काम कर सकते हैं। वे गांवों की हालत पर चिंतित हैं, तो हर कॉलेज गांवों के एक समूह को गोद ले सकता है और स्वास्थ्य, शिक्षा, स्वच्छता, डिजिटल साक्षरता तथा स्थानीय आर्थिक विकास को छात्रों की नागरिक जिम्मेदारी का हिस्सा बना सकता है। इसका मतलब यह नहीं है कि विरोध करना छोड़ दिया जाए। इसका अर्थ यह है कि विरोध को एक रचनात्मक आधार दिया जाए।

यही सिद्धांत भारत के वन क्षेत्रों पर भी लागू होता है। माओवादी हिंसा को हराना ज़रूरी है। कोई भी समाज यह इजाज़त नहीं दे सकता कि सशस्त्र हिंसा उसके नागरिकों का भविष्य तय करे। विद्रोह के खत्म होने का मतलब यह नहीं हो सकता कि वनों और प्राकृतिक संसाधनों को बड़ी कंपनियों को सौंप दिया जाए, खासकर तब, जब इसमें वनवासी समुदायों के अधिकारों और आजीविका तथा पर्यावरण पर पड़ने वाले असर पर कोई विचार ही न किया गया हो। गांधी पूछते- विकास किसके लिए और इसे तय कौन करेगा? विकास का मतलब उद्योगों को पूरी तरह नकारना नहीं है लेकिन विकास ऐसा हो जो स्थानीय लोगों की क्षमताओं, आजीविका और सम्मान को बढ़ाए, न कि उनके संसाधनों के आधार को कहीं और स्थानांतरित कर दे।

विपक्ष की भी अपनी एक जिम्मेदारी है। उसे युवाओं के गुस्से और युवाओं के हर जुटान को किसी राजनीतिक रैली में बदलना नहीं चाहिए। उसे यह भी नहीं मान लेना चाहिए कि मौजूदा सरकार को हरा देना ही भारत को बदलने के बराबर है। जेपी आंदोलन से हमें यह सीख मिलती है कि राजनीतिक जीत का मतलब सामाजिक बदलाव नहीं होता। विपक्ष भरोसेमंद विकल्प बनना चाहता है तो उसे यह दिखाना होगा कि शिक्षा, रोजगार, संस्थानों, गांवों, जंगलों और नागरिकों के रोजमर्रा के जीवन में 'अलग तरह की राजनीति' का क्या मतलब होगा।

युवाओं को दूसरा 'विपक्ष' बनने की जरूरत नहीं है। वे एक ऐसी स्वतंत्र लोकतांत्रिक ताकत बन सकते हैं जो हर सरकार से सवाल तो पूछे लेकिन किसी से जुड़ी न हो; जो जरूरत पड़ने पर विरोध करे लेकिन लगातार निर्माण भी करती रहे; जो संस्थानों से जवाबदेही की मांग करे और खुद भी जवाबदेह बनी रहे। गांधीजी का 'स्वराज' ब्रिटिश शासकों से भारतीय शासकों के हाथों में सत्ता का हस्तांतरण भर नहीं था। इसकी शुरुआत आत्म-नियंत्रण से होती है और इसके लिए ऐसे नागरिकों की जरूरत होती है जो वर्चस्व का विरोध तो कर सकें लेकिन खुद वर्चस्व का जरिया न बनें।

(लेखक गुजरात विद्यापीठ के पूर्व कुलपति हैं। सिंडिकेट : द बिलियन प्रेस)


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