देश गंभीर स्थिति में इंडिया की बैठक पर सबकी निगाह
जनता की समस्याओं का हल उसके बाद ही होना शुरू होगा। मोदी को जनता की समस्याएं हल करने में कोई दिलचस्पी नहीं है

जनता की समस्याओं का हल उसके बाद ही होना शुरू होगा। मोदी को जनता की समस्याएं हल करने में कोई दिलचस्पी नहीं है। उनकी कोशिश है कि जनता खासतौर से युवा, स्टूडेंट का ध्यान अपनी समस्याओं से हट जाए। हिन्दू-मुसलमान में उलझ जाएं! मगर अब लोग इससे बाहर निकलें हैं तो विपक्ष की जिम्मेदारी है कि उन्हें सही दिशा दे। इंडिया गठबंधन की बैठक से नई उम्मीद आना चाहिए।
इंडिया गठबंधन की इस बैठक पर सबकी निगाहें लगी हुई है। लंबे समय बाद हो रही है। लेकिन सही समय पर।
इस समय विपक्ष के सभी दलों को एक दूसरे की सख्त जरूरत है। भाजपा ने जिस तरह तृणमूल कांग्रेस तोड़ी है उससे डर का माहौल इतना ज्यादा है कि कोई भी दल खुद को अटूट नहीं बता पा रहा है।
दूसरी तरफ डर मोदी जी को भी है। जिस तरह वे चारों तरफ से घिरे हुए हैं और स्टूडेंट एवं युवा सड़क पर आ गए हैं उससे उन्हें डर है कि इसका फायदा विपक्ष को खासतौर से कांग्रेस को नहीं मिल जाए।
विपक्षी एकता कितनी घातक होती है उनके लिए ये वे 2024 लोकसभा चुनाव में देख चुके हैं। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के शब्दों में 80 से ज्यादा सीटों पर मोदी चुनाव आयोग की मदद से जीते हैं। अगर चुनाव में धांधली नहीं होती तो मोदी जी सरकार नहीं बना सकते थे। इतनी गड़बड़ियों के बावजूद भी इंडिया गठबंधन की ताकत इतनी थी कि वे बहुमत नहीं पा सके। चार सौ के दावे कर रहे थे। 240 पर रुक गए।
2024 के बाद से ही मोदी अपनी पुरानी धमक वापस नहीं पा सके हैं। और अब तो राहुल ने बाकायदा सार्वजनिक घोषणा कर दी है कि एक साल में मोदीजी प्रधानमंत्री नहीं रहेंगे।
बहुत बड़ी बात है। मोदीजी के खेमे में हलचल मची हुई है। यहां एक बात समझना जरूरी है कि 2024 के बाद भाजपा और संघ में मोदी जी पहले वाले नहीं रहे हैं। राहुल के ही शब्दों में ढाई-तीन साल पहले मोदीजी का फुल कंट्रोल था। आज वह खत्म हो गया। उनके यहां से मेरे पास सारी खबरें आ रही हैं। सरकार की हर संस्था से। मोदीजी का कोई कंट्रोल नहीं बचा। एक साल में चले जाएंगे।
राहुल ने इतनी बड़ी बात कह दी। मगर आश्चर्यजनक यह है कि सरकार, भाजपा या गोदी मीडिया की तरफ से भी इसका कोई बड़ा प्रतिवाद नहीं किया गया। नहीं तो पहले राहुल के कुछ बोलते ही पूरा सिस्टम उन पर टूट पड़ता था। लेकिन लगता है कि राहुल ने बात तो मोदी के सरकार पर कंट्रोल खोने की की है मगर नियंत्रण पार्टी और संघ पर भी कमजोर हो गया है।
ऐसे में मोदी की तरफ से स्ट्रटेजी चेंज हुई है। और वे इंडिया गठबंधन में फूट डालने की कोशिश कर रहे हैं। इंडिया गठबंधन की बैठक से ठीक पहले जनता दल यू के कार्यकारी अध्यक्ष संजय कुमार झा से कहलवाया गया है कि नीतीश कुमार को इंडिया गठबंधन का संयोजक नहीं बनने दिया। बहुत सही किया। नहीं तो नीतीश कुमार अपने साथ इंडिया गठबंधन को भी बेच आते।
मगर संजय झा ने जिस तरह कहा है वह इसलिए है कि सोमवार 8 जून जब आप यह पढ़ रहे होंगे उस समय इंडिया गठबंधन की बैठक में यह विवाद पैदा हो। और आपस में लड़ें कि नीतीश को इसने नहीं बनने दिया था, उसने नहीं। लेकिन संजय झा और भाजपा भूल गए कि कई ठोकर खाए इंडिया गठबंधन के दल यह समझ गए हैं कि उन्हें लड़ाने के लिए यह सब गैर जरूरी मुद्दे उठाए जा रहे हैं। नीतीश अब अप्रसांगिक हो गए हैं।
उन्हें नहीं बनाया तो यह बहुत अच्छा ही किया। भारतीय राजनीति के सबसे विश्वासघाती चेहरे हैं वह। मोदी जी को भी धोखा दिया। उन्हें तो खाने की दावत देकर सामने से थाली खींच ली थी। मगर मोदीजी ने उनका इलाज सही तरीके से कर दिया। वह कहां हैं क्या उनकी हैसियत है किसी को नहीं मालूम। पार्टी खतम हो गई है और सारे नेता मोदीजी को खुश करने में लगे हुए हैं।
इसी सिलसिले में संजय झा ने ममता बनर्जी और अरविन्द केजरीवाल पर सवाल उठाए। ममता इंडिया गठबंधन की बैठक में आ रही हैं। और आम आदमी पार्टी ने जैसे पहले जब यह गठबंधन बन रहा था तो शुरूआती बैठकों में आने से इनकार किया। और फिर इसकी बढ़ती ताकत देखकर बैठकों में शामिल हुए।
केजरीवाल जो सोमवार की बैठक में नहीं आएंगे उसका कोई महत्व नहीं है। इसी तरह डीएमके के नहीं आने का। गोदी मीडिया इसे बड़ी खबर बनाए हुए हैं। मगर बाकी विपक्षी दलों के लिए इसका भी कोई महत्व नहीं है। डीएमके खुद कई बार गठबंधन बदल चुकी है। अब अगर बनती हुई सरकार का कांग्रेस समर्थन नहीं करती तो क्या करती? मोदीजी को राष्ट्रपति शासन लगा लेने देती। फिर वे सबको तोड़कर अपने समर्थन की सरकार बनवा लेते। कांग्रेस ने यह नहीं होने दिया। डीएमके की तो वैसे भी सरकार नहीं बन सकती थी। हां उसके टूटने का खतरा जरूर हो जाता। एआईडीएमके पहले टूट गई। डीएमके राष्ट्रपति शासन लगाने के बाद टूट जाती। राहुल ने जनता की मर्जी के अनुरूप एक सरकार बनने दी।
तमिलनाडु की जनता इससे खुश है। अब डीएमके नाराज होती है तो हो जाए उससे कोई फर्क नहीं पड़ता है। इंडिया गठबंधन की बैठक इन सबसे ऊपर उठकर देश के सामने मौजूदा गंभीर समस्याओं पर बात करने के लिए हो रही है। मुद्दा यह है कि मोदी जी इनसे निपटने के बदले जनता का ध्यान डाइवर्ड करने की छोटी कोशिशों में अटके हुए हैं।
ट्रंप द्वारा किया जा रहा बार-बार अपमान तो मोदीजी पर असर करता ही नहीं है। लेकिन अब घरेलू स्थितियों को तेजी से बिगड़ने का असर वे रोक नहीं सकते हैं। स्टूडेंट और युवा के सब्र का बांध टूट चुका है। पेपर लीक और बारहवीं की परीक्षा भी ढंग से न होने के कारण उसका भविष्य खतरे में पड़ गया है। दूसरी तरफ जिन्होंने शिक्षा प्राप्त कर ली है उनकी बेरोजगारी।
गैस, तेल के दाम रोज बढ़ाए जा रहे हैं। महंगाई को कोई हिसाब नहीं। पहले कहते थे महंगाई डायन खाय जात है। मगर उससे पहले की पंक्ति थी कि सखी सैंया तो बहुत कमात है...! मगर अब कमाई ही खतम हो गई। तो महंगाई डबल मार कर रही है। एक तो सैंया भी नहीं कमात है और महंगाई डबल होत जात है!
राहुल ने यही कहा है कि जनता का यह प्रेशर अब सरकार पर आ रहा है और साथ ही दूसरी संस्थाओं पर भी। देश चौतरफा समस्याओं से घिरा हुआ है और मोदी एवं उनके मुख्यमंत्री समझते हैं कि हिन्दू-मुसलमान की राजनीति से वे इन सब समस्याओं पर काबू पा लेंगे। हिन्दू-मुसलमान के अलावा वे और कुछ करने को तैयार नहीं हैं। अमेरिका के लगातार भारत पर लगाए जाने वाले प्रतिबंध, तेल इससे खरीदो, उससे नहीं, हमारे यहां सामान बेचना है तो इतना शुल्क दो और हम जो भेजेंगे उस पर एक पैसा भी नहीं लेना और फिर इस पर भी ट्रंप का कहना कि मुझे भारत से पैसा कमाना है। जैसे सेठ-साहूकार लाचार गरीब से कहते हैं कि सब वसूल तो तुझ से ही होगा! चीन की घुसपैठ, भारत के बाजारों में सिर्फ उसी उसका माल इन सबसे भी वे क्या हिन्दू-मुसलमान करके निपटेंगे?
इंडिया गठबंधन की बैठक में पहला सवाल कि लड़ाई निर्णायक मोड़ पर आ गई है एक होकर इसे लड़ना है। नेतृत्व या संयोजक जैसा सवाल कोई मायने नहीं रखता है। राहुल सबको लड़ते हुए दिख रहे हैं। सबको मालूम है कि अगर राहुल नहीं होते तो विपक्ष का क्या होता!
जैसा राहुल कहते हैं पहला लक्ष्य मोदी को हटाना होना चाहिए। एक साल में या उससे पहले। जनता की समस्याओं का हल उसके बाद ही होना शुरू होगा। मोदी को जनता की समस्याएं हल करने में कोई दिलचस्पी नहीं है। उनकी कोशिश है कि जनता खासतौर से युवा, स्टूडेंट का ध्यान अपनी समस्याओं से हट जाए। हिन्दू-मुसलमान में उलझ जाएं! मगर अब लोग इससे बाहर निकलें हैं तो विपक्ष की जिम्मेदारी है कि उन्हें सही दिशा दे। इंडिया गठबंधन की बैठक से नई उम्मीद आना चाहिए।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार है)


