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एआई शिखर सम्मेलन और कोटा के कोचिंग कारखाने

जब देश नई दिल्ली में आयोजित एआई शिखर सम्मेलन से खुश था तभी एक विश्वविद्यालय द्वारा रोबोडॉग विकसित करने के भयानक दावे ने उसे विचलित कर दिया।

एआई शिखर सम्मेलन और कोटा के कोचिंग कारखाने
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जगदीश रत्तनानी

एआई सभी तकनीकी कार्य करता है जो कभी इंजीनियरों का क्षेत्र था, यह केवल एनईपी का दृष्टिकोण है जो बचाव में आ सकता है। हमें समग्र रूप से बहुमुखी प्रतिभा वाले छात्रों का निर्माण करने की आवश्यकता है जो नई दुनिया के अनुकूल हों और चमक सकें। संदर्भ, मूल्यों और सामुदायिक गियरिंग के अभाव में तकनीकी ज्ञान, स्वयं की सेवा करने और डिग्री का उपयोग करने के विचार के साथ समुद्र पार नौकरी के लिए भागना एनईपी के आदर्शों के अनुरूप नहीं है।

जब देश नई दिल्ली में आयोजित एआई शिखर सम्मेलन से खुश था तभी एक विश्वविद्यालय द्वारा रोबोडॉग विकसित करने के भयानक दावे ने उसे विचलित कर दिया। यह रोबोडॉग वास्तव में चीन से आयात किया गया था। इसी समय जुड़वां बच्चों ने देश का ध्यान अपनी तरफ खींचा जो प्रवेश परीक्षाओं में अच्छे अंकों के साथ उत्तीर्ण हुए थे। वे प्रवेश परीक्षाएं जो भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों के प्रवेश द्वार के रूप में काम करते हैं। दोनों घटनाओं में एक में झूठ की कहानी प्रस्तुत की गई है और दूसरी में बहुत प्रयास और कष्ट के बाद मिलने वाली उपलब्धि व सफलता की कहानी है। इसमें से अधिकांश कहानियां कोटा, राजस्थान की परीक्षा कोचिंग कारखानों से आती हैं। एक को हर उस चीज के रूप में देखा जाता है जो भारत के साथ गलत है; दूसरे, आईआईटी जैसे संस्थानों द्वारा दावा जाता है, जो भारतीय तकनीकी उत्कृ ष्टता के एक उच्च स्तर की निशानी है।

उम्मीद है कि जुड़वां बच्चे अच्छा प्रदर्शन करेंगे और माता-पिता और देश को गौरवान्वित करेंगे। फिर भी दो कहानियां- एक विफलता की और दूसरी उपलब्धि की- भारत के लिए समान रूप से परेशान करने वाली हैं जहां विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित, (एसटीईएम- स्टेम)- साईंस, टेक्नालॉजी, इंजीनियरिंग एंड मैथेमेटिक्स) स्नातकों की संख्या लगातार बढ़ रही है लेकिन रचनात्मकता, नवाचार या विश्व स्तरीय समाधानों के मामले में बहुत खराब प्रदर्शन है जो देश और छात्रों द्वारा किए गए निवेश को सही ठहरा सकता है।

हमने उस निजी विश्वविद्यालय की कड़ी निंदा की है जिसने एआई से संबंधित बुनियादी ढांचे में 350 करोड़ रुपये के निवेश का दावा किया था। लेकिन चिंता उत्पन्न करने वाले कु छ मुद्दे भी हैं। हमारे नियामक एक विश्वविद्यालय को लगभग हर नेतृत्व की स्थिति, शैक्षणिक और प्रशासनिक के साथ प्रवर्तक परिवार के सदस्य के कब्जे वाले कार्य करने की अनुमति कैसे देते हैं? जैसा कि इस मामले में आरोप लगाया गया है। आखिरकार पेटेंट फाइलिंग एक खेल कैसे बन जाता है या कोरोना वायरस को मारने के लिए बर्तनों को पीटने पर विश्वविद्यालय के तहत एक पेपर कैसे लिखा जाता है? इस घटना ने इस बात को उजागर किया कि भारत इन संदिग्ध साख वाले निजी संस्थानों द्वारा उच्च शुल्क पर चलने वाली शिक्षा प्रणाली में किस बुरी तरह फंस गया है। निजी क्षेत्र के कुछ उदाहरणों के अलावा जिनके पास उच्च मानक हैं या सार्वजनिक क्षेत्र के संस्थान जो संसाधनों और शैक्षणिक स्वतंत्रता पर भारी दबाव के बावजूद रुके हुए हैं,

भारत में शेष उच्च शिक्षा क्षेत्र के बारे में बहुत कुछ नहीं कहा जा सकता। यह चिंताजनक है क्योंकि छात्रों की बड़ी संख्या सार्वजनिक संस्थानों के बजाय निजी संस्थानों में पढ़ती है। ग्लैमर और समझौता करने वाली सख्ती को जोड़कर विषमता जटिल तरीकों से खेलता है जबकि सार्वजनिक शिक्षा में घटता निवेश उन लोगों से अवसरों को दूर करता है जो निजी क्षेत्र द्वारा मांगी जाने वाली फीस का भुगतान नहीं कर सकते हैं।

2021-22 के नवीनतम उपलब्ध आधिकारिक आंकड़ों से पता चलता है कि देश में कुल विश्वविद्यालयों में सरकारी विश्वविद्यालयों की संख्या 58.6 प्रतिशत हैं जिसमें कुल नामांकन का 73.7 प्रतिशत है। निजी विश्वविद्यालय (41.4 फीसदी), स्वायत्त, डिग्री देने वाले और आम तौर पर कहीं अधिक स्तर पर फीस के साथ कुल नामांकन का हिस्सा 26.3 प्रति सैकड़ा है जो और बढ़ रहा है। लेकिन यह पूरी तस्वीर नहीं है। निजी सहायता प्राप्त और गैर-सहायता प्राप्त कॉलेजों की संख्या 78.5 प्रतिशत है; सरकारी कॉलेज कुल कॉलेजों का 21.5 फीसदी हैं। इससे यह सामने आता है कि भारत में उच्च शिक्षा में अधिकांश नामांकन किसी न किसी रूप में निजी क्षेत्र के संस्थान में हैं। उच्च शिक्षा के निजीकरण की प्रवृत्ति अच्छी तरह से पहचानी, स्पष्ट है और अक्सर अभ्यास का विषय है। इसका खतनाक पहलू यह है कि सख्त मानदंडों और अच्छे विनियमन के अभाव में शिक्षा कुछ लोगों के लिए पैसा कमाने का जरिया बन जाएगी (जैसे अस्पतालों में पहले से ही पैसा है) जबकि भारत का बड़ा हिस्सा शिक्षित नहीं रहेगा इसलिए विकास आकांक्षाओं का समर्थन करने के लिए देश सुसज्जित नहीं होगा। शिक्षा क्षेत्र विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि देश शिक्षा के अपने व्यापक दृष्टिकोण के साथ नई शिक्षा नीति (एनईपी) को लागू करने की तैयारी कर रहा है जो न्यायसंगत, बहु-अनुशासनात्मक, समग्र और भारतीय लोकाचार में निहित है। यह नीति 'चरित्र निर्माण और 21वीं सदी के प्रमुख कौशल से लैस समग्र और सर्वांगीण व्यक्तियों का निर्माणÓ करने की बात करती है। सार्वजनिक निवेश के बिना इन लक्ष्यों तक पहुंचने की संभावना कम है। एक संतुलित दृष्टिकोण है जो शिक्षा क्षेत्र को सार्वजनिक भलाई के रूप में फलता-फूलता देखना चाहता है और सभी के लिए सुलभ है।

फिर भी यह अविस्मरणीय है कि विशेष रूप से प्रसिद्ध एसटीईएम शिक्षा अपने आप में एक अंत बन गई है। कोटा और अन्य जगहों के प्रशिक्षण शिविरों और आईआईटी तैयारी स्कूलों में युवा वयस्कों के दबाव, रटने और कड़ी मेहनत में इसे देखा जाता है। पिछले हफ्ते संयुक्त प्रवेश परीक्षा (जेईई) में उड़ीसा के जुड़वां भाइयों के समान अंकों के साथ उत्तीर्ण होने के बाद आयोजित समारोहों की तस्वीरें देखीं लेकिन यह भी देखा कि क्या खो गया-स्कोर प्राप्त करने के लिए बच्चों को बहुत कड़ी मेहनत करनी पड़ी जिसके बारे में माना जाता है कि यह उनके जीवन को बदल देगा (और अगले सीजन में प्रवेश परीक्षा तैयारी केंद्र में अधिक पैसा लाएगा)। लेकिन विशेष रूप से इंजीनियरों को एआई के युग में पुनर्विमुख होना होगा।

जैसा कि माना जाता है कि एआई सभी तकनीकी कार्य करता है जो कभी इंजीनियरों का क्षेत्र था, यह केवल एनईपी का दृष्टिकोण है जो बचाव में आ सकता है। हमें समग्र रूप से बहुमुखी प्रतिभा वाले छात्रों का निर्माण करने की आवश्यकता है जो नई दुनिया के अनुकूल हों और चमक सकें। संदर्भ, मूल्यों और सामुदायिक गियरिंग के अभाव में तकनीकी ज्ञान, स्वयं की सेवा करने और डिग्री का उपयोग करने के विचार के साथ समुद्र पार नौकरी के लिए भागना एनईपी के आदर्शों के अनुरूप नहीं है। तेजी से बदलती दुनिया में, यह तकनीकी विशेषज्ञों की भी सेवा नहीं करेगा।

दार्शनिक मार्था नुसबाम इसे अच्छी तरह से समझाती हैं-'भारत की शैक्षिक संस्कृति में प्रगतिशील आवाजें हुआ करती थीं, जैसे कि महान टैगोर, जिन्होंने इस बात पर जोर दिया था कि अगर विकसित कल्पना और परिष्कृत आलोचनात्मक संकायों द्वारा उपयोग नहीं किया जाता है तो दुनिया में सभी कौशल बेकार हैं, यहां तक कि हानिकारक भी। अब वैश्विक बाजार में लाभप्रदता की बढ़ती मांग ने इस तरह के विचारों को खामोश कर दिया है। माता-पिता चाहते हैं कि उनके बच्चे विपणन योग्य कौशल सीखें और उनका सबसे बड़ा गौरव भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान या भारतीय प्रबंधन संस्थान में बच्चे का प्रवेश है। मुझे लोकतंत्र के लिए डर है, जब इसे विनम्र इंजीनियरों द्वारा चलाया जाता है जैसा कि यह तेजी से होगा,... राजनेताओं के प्रचार की आलोचना करने में असमर्थ और दूसरे इंसान के दर्द की कल्पना करने में असमर्थ।Ó

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। सिंडिकेट:द बिलियन प्रेस)


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