ललित सुरजन की कलम से चुनाव परिणाम आने के बाद
असम आंदोलन के प्रारंभिक दौर याने 1980 में भी ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (आसू) तथा असम गण परिषद (अगप) को संघ का प्रच्छन्न समर्थन प्राप्त था।

'चुनाव परिणाम आने के बाद कतिपय विश्लेषकों की राय आई है कि भाजपा ने असम में पहले से चली आ रही हिन्दू-मुस्लिम खाई को और गहरा कर चुनावी लाभ उठाया है। इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं। असम आंदोलन के प्रारंभिक दौर याने 1980 में भी ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (आसू) तथा असम गण परिषद (अगप) को संघ का प्रच्छन्न समर्थन प्राप्त था। सवाल यह है कि नए मुख्यमंत्री इस खाई को पाटने के प्रयत्न करेंगे या इसे और गहरा करने की दिशा में जाएंगे। अगर प्रदेश में शांति और स्थिरता चाहिए तो दूरियां कम करने के प्रयत्न ही करना होंगे। एक अच्छी बात यह हुई है कि मौलाना बदरूद्दीन अजमल खुद चुनाव हार गए। दूसरे- तरुण गोगोई के पन्द्रह साल के शासन के बारे में सामान्य धारणा है कि उन्होंने प्रशासन ठीक से चलाया तथा प्रदेश विकास की राह पर आगे बढ़ा। अगर युवा मुख्यमंत्री संकीर्ण मतवाद में न उलझ कर विकास को प्राथमिकता देते हैं तो इससे उनका राजनीतिक भविष्य उज्ज्वल होगा।'
(देशबन्धु में 26 मई 2016 को प्रकाशित)
https://lalitsurjan.blogspot.com/2016/05/blog-post_25.html


