ललित सुरजन की कलम से कसाब को फांसी के बाद
एक ही परिवार की दो शाखाओं में खेती की जमीन पर मिल्कियत को लेकर झगड़ा होता है और बढ़ते-बढ़ते खून-खराबे तक पहुंच जाता है।

'यह भारत के किसी गांव की कहानी है। एक ही परिवार की दो शाखाओं में खेती की जमीन पर मिल्कियत को लेकर झगड़ा होता है और बढ़ते-बढ़ते खून-खराबे तक पहुंच जाता है। कुछ लोग मारे जाते हैं और कुछ को कड़ी सजा भुगतना पड़ती है। इनमें से एक पुरुष कई साल जेल में बिताने के बाद घर लौटता है, तो उसकी पत्नी उससे मांग करती है कि तू मुझे फिर एक बेटा दे दे ताकि वह बड़े होकर अपने परिवार में हुई हत्याओं का बदला ले सके। अगर मेरी याददाश्त सही है तो जगदीशचन्द्र के उपन्यास 'कभी न छोड़े खेत' का अंत इसी वार्तालाप के साथ होता है। अगर लेखक और उपन्यास का नाम मुझे सही-सही याद न भी हो तब भी इस कहानी के पीछे जो सच्चाई छिपी है, क्या उससे इंकार किया जा सकता है!'
'भारत उपमहाद्वीप में यह कथा न जाने कितने हजार सालों से बार-बार दोहराई जाती रही है। ऐसा कोई प्रसंग छिड़ने पर मुझे हमेशा राजमोहन गांधी की मूल अंग्रेजी में लिखी पुस्तक 'रिवेन एण्ड रिकन्सीलिएशन' का ध्यान हो आता है। भारत के सामाजिक इतिहास की बहुत सटीक व्याख्या उन्होंने इस पुस्तक में की है। फिलहाल वह हमारी विवेचना का विषय नहीं है। मुझे लगता है कि इस कहानी को अगर थोड़ा विस्तार दें तो इसे शायद भारत के विभिन्न प्रांतों के बीच संबंधों पर लागू किया जा सकता है। मसलन, बेलगांव को लेकर महाराष्ट्र व कर्नाटक के बीच विवाद या ऐसे और तमाम प्रकरण। अगर थोड़ा और विस्तार करें तो हमें गांव और प्रदेश की जगह हम शायद दो पड़ोसी देश को देख सकेंगे: भारत-पाकिस्तान, भारत-बंगलादेश या फिर भारत-श्रीलंका। बुनियादी सवाल यही है कि अंतत: प्रतिशोध का पलड़ा भारी बैठता है या सद्भाव व साहचर्य्य का।'
(देशबन्धु में 29 नवम्बर 2012 को प्रकाशित)
https://lalitsurjan.blogspot.com/2012/11/blog-post_28.html


