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ऊंचे सपनों के साथ आख़िर कब तक झुलसते रहेंगे हमारे मासूम युवा?

आज देश भर में सरकारी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए कोचिंग केंद्रों की भरमार है।

ऊंचे सपनों के साथ आख़िर कब तक झुलसते रहेंगे हमारे मासूम युवा?
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  • स्वराज्य करुण

आज देश भर में सरकारी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए कोचिंग केंद्रों की भरमार है। लेकिन क्या इन केंद्रों के सरकारी पंजीयन का भी कोई प्रावधान है? अगर नहीं है तो क्या उनका सरकारी रजिस्ट्रेशन नहीं होना चाहिए ताकि अगर वहां कोई हादसा हो जाए तो प्रारंभिक ज़िम्मेदारी तत्काल तय की जा सके!

बड़े सपने देखने वाले छोटी उम्र के हमारे उन मासूम युवाओं को भला क्या मालूम था कि वह उनकी ज़िन्दगी का आख़िरी दिन होगा! उत्तरप्रदेश के लखनऊ में कल 22 जून को एक बहुमंजिली इमारत में संचालित कोचिंग सेंटर में अचानक आग लगी और देखते ही देखते अपने ऊंचे सपनों के साथ वे बच्चे भी झुलसकर दुनिया से चले गए, जो अपनी ज़िन्दगी में कुछ बनने और कुछ ऊंचा कर दिखाने का ख़्वाब लेकर पढ़ाई के लिए वहां गए थे। उनकी चीखें आग और धुएं में घुटकर रह गईं।

उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस हादसे पर गहरा दु:ख व्यक्त करते हुए तत्काल घटनास्थल का दौरा किया, पीड़ितों और उनके परिवारजनों से मुलाकात की। उन्होंने लखनऊ के अलीगंज में हुए इस हादसे पर नाराजगी व्यक्त करते हुए इसकी उच्च स्तरीय जांच के भी निर्देश दिए और कहा कि जांच में दोषी पाए जाने वालों पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी। प्रधानमंत्री ने मृतकों के परिवारों के लिए दो-दो लाख रूपए और प्रत्येक घायल के लिए 50 हजार रूपए की आर्थिक सहायता की घोषणा की है। गहन दु:ख की इस घड़ी में पीड़ितों और शोक संतप्त परिवारों के प्रति उन सबकी भावनाएं और संवेदनाएं अपनी जगह बिलकुल ठीक हैं। पीड़ित परिवारों को मुआवजा भी मिल जाएगा और दोषियों पर कार्रवाई भी हो जाएगी, लेकिन सवाल यह है कि जिन घरों के चिराग हमेशा के लिए बुझ गए, उन घरों में रौशनी अब कैसे होगी?

यह दर्दनाक हादसा अपने पीछे यह सवाल छोड़ गया है कि जोखिम भरे कोचिंग सेंटरों में अपने ऊंचे सपनों के साथ हमारे मासूम युवा आख़िर कब तक झुलसते रहेंगे? देश में ऐसे हादसे पहले भी हो चुके हैं।

लगभग दो साल पहले जुलाई 2024 में दिल्ली के पुराने राजेन्द्र नगर स्थित एक कोचिंग सेंटर के बेसमेंट में बरसात का पानी घुस गया था, जिसमें तीन अभ्यार्थियों की मौत हो गई थी, इस हादसे के तत्काल बाद प्रशासन द्वारा अभियान चलाकर दिल्ली के कई कोचिंग सेंटरों की जांच की गई और उनमें से कई को सील भी किया गया। आगे क्या हुआ, इसकी जानकारी इन पंक्तियों के लेखक को नहीं है। आज से लगभग सात साल पहले मई 2019 में गुजरात के सूरत शहर की एक बहुमंजिली इमारत में चल रहे कोचिंग सेंटर में आग लगने पर झुलस जाने से 22 मौतें हुई थीं।

मेरा ख़्याल है कि स्कूल-कॉलेजों की नियमित पढ़ाई के अलावा प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए युवाओं में कोचिंग के प्रति रूझान पिछले दस-बीस वर्षों में पागलपन की हद तक बढ़ गया है। हर युवा बड़े से बड़ा सरकारी अफ़सर बनना चाहता है। आज दसवीं-बारहवीं बोर्ड की वार्षिक परीक्षाओं में अस्सी, नब्बे, पंचानवे और निन्यानवे प्रतिशत अंकों से हजारों, लाखों बच्चे उत्तीर्ण हो रहे हैं। इसके बाद भी उन्हें प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए अलग से कोचिंग करनी पड़ती है। बताया जाता है कि उन परीक्षाओं का पाठ्यक्रम दसवीं-बारहवीं के पाठ्यक्रमों से अलग होता है। लेकिन ऐसा क्यों? इन कोचिंग सेंटरों में दाखिले के लिए बच्चे अपने स्कूल-कॉलेज की नियमित कक्षाएं भी छोड़ देते हैं, वहां से अपना ट्रांसफर सर्टिफिकेट भी ले जाते हैं। कोचिंग केंद्रों के प्रबंधक उनका एडमिशन किसी प्राइवेट स्कूल या कॉलेज में करवा देते हैं, जहां संबंधित छात्र-छात्रा को क्लास अटेंड करने के लिए जाना नहीं पड़ता, लेकिन उनकी हाजिरी लगती रहती है। वे सिर्फ वार्षिक परीक्षाओं में शामिल होते हैं। उनकी इस प्रकार की कक्षाओं को 'डमी क्लास' कहा जाता है। क्या इन 'डमी कक्षाओं' का प्रचलन गलत नहीं है?

विगत कुछ वर्षों में कु छ कोचिंग केंद्रों में हुए हादसों को लेकर सवाल यह भी उठता है कि ऐसे हादसे होते ही क्यों हैं? क्या इसलिए कि अधिकांश कोचिंग सेंटरों में मानव जीवन की सुरक्षा का कोई पुख्ता इंतज़ाम नहीं रहता? कहीं आग से बचाव के लिए फायर सेफ्टी की कोई व्यवस्था नहीं रहती, तो कहीं कई-कई मंजिलों वाली गगनचुम्बी इमारतों में आग लगने पर बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं रहता। अधिकांश कोचिंग सेंटर अत्यधिक भीड़-भाड़ वाले इलाकों में संचालित होते हैं। जिन्हें इनका निरीक्षण करते रहना चाहिए, वे अपनी ज़िम्मेदारी नहीं निभाते।

आज देश भर में सरकारी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए कोचिंग केंद्रों की भरमार है। लेकिन क्या इन केंद्रों के सरकारी पंजीयन का भी कोई प्रावधान है? अगर नहीं है तो क्या उनका सरकारी रजिस्ट्रेशन नहीं होना चाहिए ताकि अगर वहां कोई हादसा हो जाए तो प्रारंभिक ज़िम्मेदारी तत्काल तय की जा सके! क्या लाखों रूपयों की फीस वाले कोचिंग सेंटरों के संचालन की अनुमति सरकार की ओर से या स्थानीय प्रशासन की ओर से दी जाती है? अगर नहीं तो अनुमति अनिवार्य होनी चाहिए। ये कोचिंग सेंटर जिन भवनों में संचालित होते हैं, उनमें आग से बचाव के लिए पुख्ता इंतज़ाम होने चाहिए। स्थानीय प्रशासन को ऐसी बिल्डिंगों में फायर सेफ्टी की जांच भी नियमित रूप से और आकस्मिक रूप से भी करनी चाहिए। बशर्ते यह कार्य पूरी ईमानदारी और गंभीरता से हो।

देश की कई ऊंची-ऊंची इमारतों में हुए ऐसे हादसों से कोई सबक भी तो नहीं लेता। कोई सबक लेना भी नहीं चाहता। एक हादसा होता है, चीख़-पुकार मचती है, रोना-धोना मचता है, डांट-फटकार भी होती है, उसके बाद सब कुछ यथावत चलने लगता है। बात आई गई हो जाती है। दिल्ली के मालवीय नगर की एक बहुमंजिली इमारत में संचालित रेस्टोरेंट में आग लगने से 21 मौतों की घटना सिर्फ 20 दिन पहले की है, यानी तीन जून 2026 के इस हादसे को एक महीना भी नहीं हुआ और ऐसा लगता है कि महज तीन हफ्ते में ही सब उसे भूल गए। सड़क हादसों, रेल हादसों और विमान हादसों को भी लोग बहुत जल्दी भूल जाते हैं।

ज़रूरत भूलने की नहीं, बल्कि सबक लेने और बचाव के समुचित उपाय समय से पहले सुनिश्चित कर लेने की है। लखनऊ में कल 22 जून को कोचिंग सेंटर में हुई भयानक अग्नि दुर्घटना देश में भविष्य में और कहीं न हों, यह देखना सरकार और समाज दोनों की जिम्मेदारी है।


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