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ललित सुरजन की कलम से अब्बास और कृश्न चन्दर

मुझे कृश्न चंदर की जो पहली पुस्तक याद आती है वह है 'बावन पत्ते'। यह शायद उनका एकमात्र पूर्णाकार उपन्यास है,

ललित सुरजन की कलम से अब्बास और कृश्न चन्दर
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मुझे कृश्न चंदर की जो पहली पुस्तक याद आती है वह है 'बावन पत्ते'। यह शायद उनका एकमात्र पूर्णाकार उपन्यास है, अन्यथा उनके बाकी उपन्यासों को लंबी कहानी की श्रेणी में भी रखा जा सकता है। 'बावन पत्ते' में उन्होंने बंबई के फिल्म जगत याने आज के बॉलीवुड में जो प्रपंच होते हैं उनका वर्णन किया है। याद रखिए कि लेखक उस दौर का बयान कर रहा है जब बॉलीवुड में आज जैसी बेहूदा और उटपटांग फिल्में नहीं बनती। इस उपन्यास में फिल्म के फाइनेंसर और प्रोड्यूसर किस तरह से कलाकारों का शोषण करते हैं, कैसे डायरेक्टर को अपने इशारों पर नचवाते हैं, कैसे अभिनेता और एक्स्ट्रा की विवशता का फायदा उठाया जाता है, ऐसी तमाम सच्चाइयों का वर्णन उपन्यास में हुआ था। इसी थीम पर उन्होंने बाद में एक-दो उपन्यास और भी लिखे। उनकी परवर्ती रचनाओं में हमें भारत के अभिजात समाज की तस्वीरें देखने मिलती हैं। इनमें कहीं नैनीताल का बोट क्लब है, कहीं महालक्ष्मी रेसकोर्स, कहीं हांगकांग में हीरों के तस्कर, तो कहीं बड़े-बड़े सटोरिए और जुए के अड्डे चलाने वाले लोग। इनके सामने दिखने वाले सभ्य-सभ्रांत जीवन के पीछे कितनी कुरूपता है पाठक उसे देख सकता है।

(अक्षर पर्व मई 2014 में प्रकाशित)

https://lalitsurjan.blogspot.com/2014/05/blog-post_20.html


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