अनोखी हरियाली यात्रा
सतपुड़ा की घाटी में आदिवासी पेड़ लगाने का अनोखा हरियाली अभियान चला रहे हैं।

- बाबा मायाराम
हरियाली अभियान उपयोगी है। चाहे भले ही अच्छी उपजाऊ वाले खेतों में हम वार्षिक व मौसमी खेती करते रहें, लेकिन कम पानी वाली व अपेक्षाकृत कम उपजाऊ ढोंगा ( ऊंची-नीची) टीले वाली जमीनों में पेड़ लगाए जा सकते हैं। फिर इन पेड़ों का जमीन में नमी बनाए रखने में प्रमुख योगदान होता है। पेड़ों से गिरी पत्तियां व टहनियां नमी को बचाती हैं, साथ ही जैव खाद बनाती हैं। पेड़ों की जड़ें गहरी होती हैं, वे पोषक तत्वों को बांधे रखती हैं। भोजन में फलों के शामिल होने से स्वस्थ रहने में मदद मिलती है।
सतपुड़ा की घाटी में आदिवासी पेड़ लगाने का अनोखा हरियाली अभियान चला रहे हैं। अभियान का नारा है- हरियाली खुशहाली लाएंगे- पर्यावरण बचाएंगे, भुखमरी भगाएंगे। इसके लिए जगह-जगह हरियाली रैलियां निकाली जा रही हैं, पर्चे बांटे जा रहे हैं, सभा व गांव की बैठकों में पेड़ लगाने का संकल्प लिया जा रहा है। यह अभियान मध्यप्रदेश के बैतूल जिले में चल रहा है। आज के कॉलम में इस अनोखी हरियाली यात्रा के बारे में बताऊंगा, जिससे पौधारोपण के विविध आयामों को समझा जा सके।
समाजवादी जन परिषद और श्रमिक आदिवासी संगठन के बैनर तले यह अभियान करीब दो दशक से चल रहा है। बरसों की मेहनत अब रंग लाने लगी है। आदिवासियों के द्वारा रोपे गए पौधे अब फल देने लगे हैं। इन फलों को आपस में बांटकर भी पेड़ लगाने का संदेश दिया जाता है। अब तक सैकड़ों पौधे लगाए जा चुके हैं। आदिवासियों ने अपने घर के आसपास, खाली पड़ी जमीन पर, खेतों में और जंगल में फलदार पेड़ लगाए हैं।
श्रमिक आदिवासी संगठन के राजेन्द्र गढ़वाल कहते हैं कि फलदार पेड़ हर दृष्टि से उपयोगी हैं। इससे हरियाली बढ़ेगी, कुपोषण दूर होगा, जैव विविधता बचेगी और पर्यावरण भी बचेगा। मिट्टी का कटाव रुकेगा और पानी का संचय होगा। पेड़ों पर पक्षी आएंगे, वे कीट नियंत्रण करेंगे। आदिवासियों के भोजन में पोषक तत्व होंगे, उनका स्वास्थ्य ठीक होगा और इन फलों की बिक्री से आमदनी भी बढ़ेगी।
इस साल अभियान की शुरूआत बैतूल में 23 जुलाई को हरियाली रैली निकालकर की गई और यह अभियान 8 अगस्त को शाहपुर में समाप्त हुआ। इस मौके पर आदिवासियों ने कांवड़ में पौधे सजाकर बाजार में जुलूस निकाला, ढोल-टिमकी के साथ गीत, नारों व बातचीत से पेड़ लगाने का संदेश दिया और सामूहिक रूप से पौधारोपण का संकल्प लिया। रैलियों में बड़ी तादाद में आदिवासी शामिल हुए।
पेड़ लगाने की मुहिम की तैयारी गर्मी के मौसम से ही शुरू हो जाती है। बीजों को एकत्र करना, उनकी साफ-सफाई करना, उनका रख-रखाव करना और पौधे तैयार करना और फिर उन्हें लगाना। इसके लिए गांवों में नर्सरी भी बनाई जाती है और साथ ही वनविभाग से भी पौधे देने का आग्रह किया जाता है। इस अभियान का खर्च संगठन चंदे के रूप में जुटाता है। इस साल भी संगठन ने अपील जारी कर आर्थिक सहयोग मांगा था। कुछ कार्यकर्ता इस काम की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं।
संगठन के कार्यकर्ता राजेन्द्र गढ़वाल बताते हैं कि यहां पहले अच्छा जंगल हुआ करता था। वह आदिवासियों के भूख और जीवन का साथी था। यहां से उन्हें कई तरह के कंद मूल, मशरूम, शहद, अचार, महुआ और हरी पत्तीदार भाजियां मिलती थीं। जंगल ही उनका पालनहार था। अगर आज भी उनके खेतों में व आसपास फलदार पेड़ होंगे तो उनका पोषण भी सुधरेगा और उन्हें बेचकर आमदनी भी होगी।
हरियाली अभियान के तहत कटहल, आम, बादाम, जाम, नींबू, मौसंबी, संतरा, रीठा, मुनगा, अनार, आंवला, बील, आचार, जामुन, काजू, छीताफल, बेर इत्यादि कई फलदार पेड़ लगाए जा रहे हैं। पीपलबर्रा गांव के सरपंच मुंशी चौहान ( कोरकू) खुद इस मुहिम में जुटे हैं। घर-घर जाकर पेड़ लगवाने का काम कर रहे हैं। ग्राम बोड़ के कुंवर सिंह और समोती ने अपने खेत के पेड़ दिखाए।
एक जमाना था तब खेतों में कई फलदार पेड़ हुआ करते थे, अब ट्रेक्टर व मशीनों से खेती होने के कारण पेड़ कट गए हैं। इन फलदार पेड़ों से भी लोगों को पोषण मिलता था। अब इस मुहिम से अगर लोग खेतों के आसपास या सब्जी बाड़ी में पेड़ लगाए तो पोषण सुधरेगा, ऐसी उम्मीद की जा सकती है।
इस पूरे अभियान से कुछ बातें समझी जा सकती हैं। आज के जलवायु बदलाव के दौर में खेती की सोच बदलनी होगी। रासायनिक और मशीनी खेती में ठहराव आ चुका है। वृक्षों के साथ खेती का तालमेल बिठाना होगा। पेड़ों व मौसमी फसलों की मिली-जुली खेती करनी होगी। पहले ऐसा ही था। खेतों में महुआ, आम और आंवले जैसे कई तरह के पेड़ थे। महुआ खाते थे। उसके कई तरह के व्यंजन व भूंजकर खाया जाता है। बुजुर्ग लोग ऐसे व्यंजन व भोजन के स्वाद को अब भी याद करते हैं। उसकी अनुभूति अब भी उनके जेहन में है।
इस दृष्टि से भी हरियाली अभियान उपयोगी है। चाहे भले ही अच्छी उपजाऊ वाले खेतों में हम वार्षिक व मौसमी खेती करते रहें, लेकिन कम पानी वाली व अपेक्षाकृत कम उपजाऊ ढोंगा ( ऊंची-नीची) टीले वाली जमीनों में पेड़ लगाए जा सकते हैं। फिर इन पेड़ों का जमीन में नमी बनाए रखने में प्रमुख योगदान होता है। पेड़ों से गिरी पत्तियां व टहनियां नमी को बचाती हैं, साथ ही जैव खाद बनाती हैं। पेड़ों की जड़ें गहरी होती हैं, वे पोषक तत्वों को बांधे रखती हैं।
भोजन में फलों के शामिल होने से स्वस्थ रहने में मदद मिलती है। कुपोषण तो दूर होता ही है, भोजन की गुणवत्ता भी बढ़ती है। इनमें पोषक तत्व तो होते ही हैं, रेशा अधिक होने से वे कई बीमारियों से बचाते हैं। पेड़ों से ईंधन के लिए लकड़ियां मिलती हैं। तापमान को पेड़ नियंत्रित करते हैं। हवा देते हैं। कार्बन को सोखते हैं।
जिन इलाकों में वर्षा का कोई भरोसा नहीं है, मौसम की अनिश्चितता है, जो कि बढ़ रही है, उन इलाकों में खेतों में फलदार पेड़ होना, खाद्य सुरक्षा के लिए बहुत उपयोगी होगा। और इनके अतिरिक्त होने पर कुछ हद आर्थिक सुरक्षा होती है। धरती पर हरियाली चादर कई तरह से उपयोगी व सार्थक है।
इस सबके साथ मनुष्य और प्रकृति के बीच टूटता रिश्ता फिर से जुड़ेगा। मनुष्य ने प्रकृति पर आधिपत्य की सोच अपनाई है, उसी का परिणाम है आज का पर्यावरण का संकट। संसाधनों के बेजा दोहन की होड़। हरियाली अभियान जैसी पहल ने मनुष्य और प्रकृति के सहअस्तित्व की राह दिखाई है, जो आज पर्यावरण के संकट के हल के साथ मनुष्य के अस्तित्व के लिए भी बहुत जरूरी है। फिर स्थानीय आदिवासियों के सहयोग से जंगल व पर्यावरण बचाए जा सकते हैं। इस पूरे अभियान से बहुत कुछ सीखा जा सकता है, इसका अनुकरण किया जा सकता है।


