ललित सुरजन की कलम से यात्रा वृत्तांत : आम खाने का सुख
'एक हाथ में आम, दूसरे में मोबाइल। आम चूसते हुए ही मैंने रवि श्रीवास्तव को फोन कर धन्यवाद दिया कि उन्होंने ऐसे उम्दा स्वादिष्ट आम भिजवाए।

'एक हाथ में आम, दूसरे में मोबाइल। आम चूसते हुए ही मैंने रवि श्रीवास्तव को फोन कर धन्यवाद दिया कि उन्होंने ऐसे उम्दा स्वादिष्ट आम भिजवाए। भिलाई में रवि भाई के आंगन में आम के 2-3 पेड़ हैं, जिनके फलों पर मुख्य रूप से मुहल्लावासियों का अधिकार बनता है, लेकिन हम जैसे साथियों को भी कभी-कभार उनका स्वाद पाने का सौभाग्य मिल जाता है। सच बताऊं तो मैं हमेशा इस ताक में रहता हूं कि किस-किस मित्र के बागीचे में आम फल रहे हैं। (उनके नाम नहीं बताऊंगा, ताकि मेरा हिस्सा बाँटने कोई और मित्र न आगे आ जाए) बाज़ार से खरीदकर भी आम खाए जाते हैं, लेकिन मित्रों-पड़ौसियों के यहां धावा बोलकर जो फल मिलें, उनका स्वाद कई गुना बेहतर होता है। मैं बचपन के उन दिनों को याद करता हूं जब पचमढ़ी की पगडंडियों पर घूमते हुए हम आम बीना करते थे। देसी आम के ऊंचे-ऊंचे वृक्ष। हवा चलती थी तो छोटे-छोटे फल टूटकर गिरते थे। घर लाए, कुछ देर मटके के पानी में उन्हें ठंडा किया और फिर खूब लालच के साथ आम चूसे, इस तरह कि छिलके में एक भी रेशा बाकी न रह जाए और गुठली पूरी तरह सफेद हो जाए। कितने भी आम खा लो, मन कहां भरता था!'
( 4 जून 2011 को देशबन्धु में प्रकाशित)
https://lalitsurjan.blogspot.com/2012/05/blog-post_9793.html


