हिंदुस्तान को बदलने का घातक मंसूबा
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह लोकतांत्रिक चुनाव प्रक्रिया को प्रभावित कर सत्ता पर भाजपा का शिकंजा कस रहे हैं,

अब सवाल ये है कि आखिर मोदी-शाह हमेशा के लिए भाजपा की सत्ता क्यों बनाना चाहते हैं। लोकतांत्रिक राजनीति में जिसका भी यकीन होता है, वह इस सच्चाई को स्वीकार करके ही चलता है कि आज जीत मिली है, तो कल हार भी मिल सकती है। चुनाव में भले दावे किए जाएं कि जीत हमारी ही होगी, लेकिन ताकतवर और लोकप्रिय नेता भी चुनावी नतीजों के इंतजार में थोड़े तनाव में दिखते ही हैं। मोदी-शाह को यह तनाव क्यों नहीं होता।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह लोकतांत्रिक चुनाव प्रक्रिया को प्रभावित कर सत्ता पर भाजपा का शिकंजा कस रहे हैं, इसके कई उदाहरण हाल-फिलहाल में सामने आ चुके हैं। द इंडियन एक्सप्रेस ने पिछले हफ्ते मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से अन्य दोनों चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की असहमतियों, ईसीआईनेट के जरिए दिल्ली में बैठ कर राज्यों की मतदाता सूची से नामों को कटवाने समेत कई खबरों से पर्दा उठाया है। इसके बाद भाजपा जहां खुलकर चुनाव आयोग के बचाव में उतर आई है, वहीं खुद चुनाव आयोग ने भी बीते शनिवार एक बैठक कर उसका लंबा-चौड़ा स्पष्टीकरण दिया और बताया कि अब से चुनाव आयोग हर बैठक से पहले एजेंडा भी बनाएगा और बैठक के बाद उसके नोट्स भी जारी करेगा। यानी मामूली से मामूली बैठकों में भी जो सामान्य प्रक्रिया अपनाई जाती है, वह चुनाव आयोग में अब तक नहीं अपनाई जा रही थी, यह खुद चुनाव आयोग ने बता दिया। बहरहाल, चुनाव आयोग की सफाई से ज्ञानेश कुमार का कितना बचाव हो पाएगा यह तय नहीं है। यह भी फिलहाल कहा नहीं जा सकता कि इस पूरे मुद्दे पर भाजपा के तमाम नेता तो बयान दे रहे हैं, लेकिन मोदी-शाह कुछ भी नहीं कह रहे हैं तो इसकी क्या वजह है।
आम तौर पर होता यही है कि अगर विपक्ष की तरफ से गंभीर आरोप लगें तो सत्ता में शीर्ष पर बैठे लोग ही उसका जवाब देते हैं। जैसे नरेन्द्र मोदी और अमित शाह कह सकते थे कि हमें जनता ने ही तीसरी बार सत्ता सौंपी है और चुनाव में कहीं कोई गड़बड़ी नहीं हुई है। लेकिन ये दोनों नेता इतनी सामान्य सी सफाई देना भी जरूरी नहीं समझते। संभवत: उन्हें पूरा यकीन है कि अब देश की तमाम संस्थाएं और व्यवस्था उनकी मुट्ठी में आ चुकी हैं और उनकी सत्ता को कोई खतरा नहीं है तो वो किसी के भी प्रति जवाबदेह नहीं हैं। प.बंगाल चुनाव जीतने के बावजूद जिस तरह टीएमसी के विधायकों और सांसदों को ममता बनर्जी से अलग करवा कर एक तरफ टीएमसी को दो फाड़ करवाया गया और दूसरी तरफ सांसदों को एनसीपीआई नाम की अनजानी पार्टी में भेजा गया, उससे यह भी जाहिर हो गया है कि संसद से लेकर विधानसभाओं तक मोदी-शाह अपनी पकड़ मजबूत करना चाहते हैं। यह पकड़ चुनाव में जीत के जरिए बने न बने, लेकिन जांच एजेंसियों के दबाव, धन और पद का लोभ आदि से बनाई जा सकती है।
अब सवाल ये है कि आखिर मोदी-शाह हमेशा के लिए भाजपा की सत्ता क्यों बनाना चाहते हैं। लोकतांत्रिक राजनीति में जिसका भी यकीन होता है, वह इस सच्चाई को स्वीकार करके ही चलता है कि आज जीत मिली है, तो कल हार भी मिल सकती है। चुनाव में भले दावे किए जाएं कि जीत हमारी ही होगी, लेकिन ताकतवर और लोकप्रिय नेता भी चुनावी नतीजों के इंतजार में थोड़े तनाव में दिखते ही हैं। मोदी-शाह को यह तनाव क्यों नहीं होता, यह भी विचारणीय है। इन सवालों की पड़ताल करने के लिए देश में बड़ी सावधानी और चालाकी से किए जा रहे अहम फैसलों को समझना होगा। 2023 में जब विपक्ष के सौ से ज्यादा सांसद निलंबित थे, तब अहम कानूनों में बदलाव किया गया और इसी दौरान मुख्य चुनाव आयुक्त को हमेशा के लिए कानूनी संरक्षण दिया गया। मतलब पद पर रहने के दौरान को उन पर कोई कार्रवाई नहीं हो सकती, जब वो पद से हटेंगे, तब भी कोई दीवानी या आपराधिक कार्यवाही नहीं की जा सकेगी। इस कानून पर विपक्ष ने तो आपत्ति जाहिर की थी, और सवाल उठाए थे। लेकिन जनता के बीच इसकी जितनी चर्चा मीडिया के माध्यम से होनी चाहिए थी, वो नहीं हुई। क्योंकि जनता पूछ सकती थी कि आखिर मुख्य चुनाव आयुक्त से ऐसे कौन से काम करवाए जाने हैं, जो उन्हें आजीवन कानूनी संरक्षण दिया जा रहा है। खैर, इस कानून के जरिए भाजपा ने बेधड़क चुनावी गड़बड़ी का पक्का इंतजाम कर लिया।
भाजपा का सत्ता पर बने रहना राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लिए भी जरूरी है, क्योंकि इसी तरह हिंदू राष्ट्र का एजेंडा पूरा होगा। इसके लिए संविधान खत्म करना भी जरूरी है। अब नरेन्द्र मोदी और अमित शाह ने इसके लिए एक और फैसला लिया है। पिछले साल 15 अगस्त को मोदी ने हाई पावर्ड डेमोग्राफी मिशन की घोषणा की थी, जिसके बाद गृह मंत्रालय ने इस साल 26 मई को 'जनसांख्यिकीय बदलावों पर उच्च-स्तरीय समिति' का गठन किया और सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस प्रकाश प्रभाकर नावलेकर को इसका अध्यक्ष बनाया। अभी इस समिति ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से जिलावार पिछले 15 वर्षों में धार्मिक आबादी में आए बदलावों का डाटा मांगा है। यह डाटा वाहनों के पंजीकरण, संपत्ति की खरीद, स्कूल, कॉलेज में दाखिले, आधार, वोटर आईडी के धार्मिक आधार पर जुटाया जा रहा है। आसान शब्दों में कहें तो नागरिकों की धार्मिक प्रोफाइल तैयार की जा रही है। नस्लीय नफरत में अंधे हिटलर ने ऐसा ही काम अपने शासन में किया था। उसके बाद किस तरह यहूदियों का कत्लेआम किया गया, सब जानते हैं।
बताया जा रहा है कि राज्यों को धर्म के आधार पर इतना बड़ा डाटा इकट्ठा करने में मुश्किल हो रही है क्योंकि इन मानकों पर अब तक डाटा इकट्ठा नहीं किया जाता था। जब भारत को उसकी मूल पहचान के साथ ही रहने देना है तो ऐसे डाटा की कोई जरूरत कभी थी ही नहीं। मगर अब घुसपैठियों पर कार्रवाई या ऐसे ही किसी फालतू से बहाने को लेकर भाजपा अपने इस फैसले को न्यायोचित ठहरा सकती है। हालांकि उसके असली मकसद को समझना कठिन नहीं है कि वह मुसलमानों, ईसाइयों, दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों को अलग-थलग करने के लिए ऐसे डाटा का इस्तेमाल करेगी।
भाजपा शैक्षणिक पाठ्यक्रम और सोशल मीडिया के जरिए भी भारत के असल ताने-बाने को तोड़ने में लगी है, क्योंकि इसी तरह हिंदू राष्ट्र बनाने में उसे आसानी होगी। इतिहास की मनमानी व्याख्या और तथ्यों को गलत पेश करने का काम तो मोदी सरकार में हुआ ही है, अब सामाजिक विज्ञान की किताब के जरिए आधुनिकता के नाम पर बच्चों को गुमराह किया जा रहा है। एनसीईआरटी ने नौवीं कक्षा की किताब में सेंगोल को शासन और सुशासन का सांस्कृतिक प्रतीक बताया है। इसी किताब में एक जगह लिखा है कि शाहजहां ने जब भव्य जामा मस्जिद बनवाई थी, तो उसी समय चित्तौड़ के राजा ने उदयपुर में जगदीश मंदिर बनवाया जो उतना ही भव्य और ऊंचा था। नौवीं कक्षा के मासूम बच्चों के मन में किस तरह मस्जिद बनाम मंदिर का विचार थोपा जा रहा है, यह उसकी ताजा मिसाल है। अबोध उम्र के इन बच्चों के मन में नफरत का बीज बोने का मकसद यही है कि कल उसका फल भाजपा को मिले। यही कोशिश संघ ने आजादी के वक्त भी की थी, लेकिन तब कांग्रेस की मजबूती के कारण उसे सफलता नहीं मिली। अब एक बार फिर वही माहौल बन रहा है।
दस साल पहले कांग्रेस कमजोर नजर आ रही थी, लेकिन राहुल गांधी मोदी-शाह के सामने अब बड़ी चुनौती बन चुके हैं। यहां सोशल मीडिया भाजपा का हथियार बन रहा है। पिछले दो-तीन दिनों से राहुल गांधी की तुलना मुंबई हमलों के अपराधी आतंकवादी अजमल कसाब से करने वाले पोस्ट शेयर हुए। वायुसेना के एक पूर्व अधिकारी अनूप वर्मा ने राहुल गांधी को भारत के लिए कसाब से ज्यादा खतरनाक बताया। टी शर्ट, कार्गो पैंट्स और कंधे पर टंगे बैग से दोनों को एक समान बताया जा रहा है। हालांकि कसाब के हाथों में जो बंदूक है, वो नफरत में अंधे हो चुके लोगों को नहीं दिख रही। कांग्रेस सेवादल ने फिलहाल इसमें साइबर अपराध वाला मामला दर्ज करवाया है। लेकिन असल में यह देशद्रोह से कम नहीं है कि नेता प्रतिपक्ष को आतंकवादी से ज्यादा खतरनाक कहा जा रहा है। इस मामले में कानूनी कार्रवाई जो भी हो, सवाल बना हुआ है कि आखिर ऐसी पोस्ट करने का दुस्साहस लोगों को किसने दिया?
मोदी-शाह इसी तरह सत्ता पर काबिज रहे तो भारत की तस्वीर आने वाले कुछ सालों में कैसी बन जाएगी, ऊपर बताए गए उदाहरणों से इसकी कल्पना की जा सकती है।


