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ललित सुरजन की कलम से अपनी बेगुनाही की पैरवी
राजनैतिक दल जानते हैं कि किसान से चंदा वसूल करना कठिन काम है।

राजनैतिक दल जानते हैं कि किसान से चंदा वसूल करना कठिन काम है। यह गांधीयुग नहीं है कि पार्टी की सदस्यता के लिए आम आदमी से चार-चार आने इक_े करते घूमो। उस समय भी बिड़ला आदि बड़े चंदा दिया करते थे, लेकिन आज की बात ही कुछ और है। अमेरिका से रेबेका मार्क आती हैं और मेनका जैसी अदाओं से सत्ताधारियों को लुभा कर एनरॉन कंपनी के लिए अनुबंध कर आनन-फानन में हस्ताक्षर हो जाते थे। यह दीगर बात है कि वही कंपनी दस साल के भीतर दिवालिया हो गई। आज भी बड़े-छोटे औद्योगिक घराने अपने लाव-लश्कर के साथ आते हैं और एमओयू कर जाते हैं। उनका दिया चंदा उस आदिवासी के पास नहीं जाता, जिनकी जमीन छीनी जाती है।
(20 दिसंबर 2007 को प्रकाशित)
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