आने को है आर्थिक दिक्कतों का दौर
जब सरकार के फैसलों से उसके ऊपर बोझ बढ़ेगा तो वह एक के बदले तीन पैसे की वसूली अपने ग्राहकों और उपभोक्ताओं से शुरू कर देगा

अरविन्द मोहन
तय मानिए कि यह बदलाव सिर्फ पेट्रोलियम पदार्थों तक सीमित नहीं रहेगा। कई अन्य चीजों और सेवाओं के दाम भी सरकार बढ़ा सकती है। निजी क्षेत्र तो उसका इंतजार भी नहीं करता, वह अभी ही अपने उत्पादों और सेवाओं को महंगा करने लगा है। और जब सरकार के फैसलों से उसके ऊपर बोझ बढ़ेगा तो वह एक के बदले तीन पैसे की वसूली अपने ग्राहकों और उपभोक्ताओं से शुरू कर देगा। सिर्फ सेवा देने वाले मजदूरों की मजदूरी बढ़ाने का दौर शुरू हो गया है।
जी हां, 29 अप्रैल तक भारत सरकार और उसके कर्ता-धर्ता बंगाल चुनाव में व्यस्त हैं। होने को तो पांच राज्यों के चुनाव अभी अपनी प्रक्रिया के बीच ही हैं और 29 के पहले तमिलनाडु का मतदान भी पूरा हो जाएगा लेकिन बंगाल चुनाव का दूसरा और अंतिम फेज 29 को पूरा होगा और उसके बाद ही प्रधानमंत्री समेत सरकार के सभी प्रमुख लोगों का ध्यान उधर से हटेगा। सबके रिजल्ट 4 मई को आने हैं और अगर नरेंद्र मोदी समेत सारे प्रमुख लोग चुनाव में इतने जुनून से जुटे हैं तो रिजल्ट का महत्व सहज समझा जा सकता है। लेकिन पांच राज्यों की विधान सभाओं के परिणाम और देश की राजनीति पर उसका प्रभाव सामने आए इससे पहले ही 29 रात से परिणाम आने की भविष्यवाणी करना मुश्किल नहीं है। सबसे पहला नंबर तो पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस की कीमतों का होना चाहिए। और खैरियत यही है कि ईरान अमेरिका/इजरायल युद्ध की आंच मद्धिम पड़ी है और संभव लगता है कि 29 तक कोई समझौता ही हो जाए। माहौल अभी भी बदला है और पेट्रोलियम के दाम समेत शेयर बाजार और सर्राफा बाजार की तेजी कुछ मद्धिम पड़ी भी है। लेकिन इससे हम आप नई मूल्य वृद्धि से बच नहीं सकते।
तय मानिए कि यह बदलाव सिर्फ पेट्रोलियम पदार्थों तक सीमित नहीं रहेगा। कई अन्य चीजों और सेवाओं के दाम भी सरकार बढ़ा सकती है। निजी क्षेत्र तो उसका इंतजार भी नहीं करता, वह अभी ही अपने उत्पादों और सेवाओं को महंगा करने लगा है। और जब सरकार के फैसलों से उसके ऊपर बोझ बढ़ेगा तो वह एक के बदले तीन पैसे की वसूली अपने ग्राहकों और उपभोक्ताओं से शुरू कर देगा। सिर्फ सेवा देने वाले मजदूरों की मजदूरी बढ़ाने का दौर शुरू हो गया है और दस-बारह साल से रुका पड़ा यह काम आंदोलनों के सहारे चला है और बढ़ता गया है पर मजदूरों में बेचैनी कीमतों में सामान्य वृद्धि और गैस की किल्लत और कालाबाजारी से ज्यादा बढ़ी। काफी सारे प्रवासी मजदूर तो इस चक्कर में अपने देस लौट गए। और उनके ही नहीं आम आदमी के जीवन में ईंधन के महत्व को समझकर सरकारों के स्तर पर सक्रिय हुई हैं। पेट्रोल और गैस के दाम न बढ़ाना भी उसी तरह की सक्रियता है और इसके पीछे आम लोगों को राहत देना कितना बड़ा कारण है और पांच राज्यों की विधान सभाओं का चुनाव कितना बड़ा कारण यह समझना मुश्किल नहीं है। मोदीजी की राजनीति के लिहाज से चुनाव का मतलब सबसे ऊपर है और इसी आधार पर चुनाव बीतते ही कीमतों में बढ़ोतरी की बात कही जा रही है।
यह संकेत भले मोदी जी की राजनीति को जानने वाले समझ जाएं, पर अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों से जो सूचनाएं आने लगी हैं वे बताती हैं कि चुनावी शोर की चीजों को नजरों से ओझल कर दे लेकिन आर्थिक सच्चाई पर परदा नहीं डाला जा सकता। सबसे पहले तो यही गणना बिगड़ गई है कि भारत दुनिया की पांचवी बड़ी अर्थव्यवस्था की जगह छठे नंबर पर खिसक गया है। अभी तक प्रधानमंत्री तीसरी अर्थव्यवस्था बनने बनाने की बातें खूब कहा करते थे, अब उनकी तरफ से कोई बयान इस बारे में नहीं आया है। विकास दर दो फीसदी कम हो जाने का अनुमान लगभग सारे प्रमुख अर्थशास्त्री कर रहे हैं। फिर यह सूचना भी आने लगी है कि बुनियादी उद्योगों के उत्पादन में गिरावट दर्ज की गई है और यह खाड़ी युद्ध का असर है। यह सूचना भी आई है कि खाड़ी के देशों में भारतीय उपभोक्ता वस्तुओं की मांग में आई गिरावट से उपभोक्ता सामान बनाने वाली कंपनियां परेशान हैं। खाड़ी देशों में एक करोड़ के आसपास हिन्दुस्तानी कामगार रहते हैं और जाहिर तौर पर अच्छी कमाई वाले ये लोग अपनी पसंद की भारतीय चीजें भी बड़े पैमाने पर खरीदते हैं। देसी मांग भी गिरी है। और कुछ चीजों की मांग तो ऐसे गिरी है कि सारा बाजार भौचक्का है। इस अक्षय तृतीया को सोने की खरीद का रिकार्ड ऐसा ही है जबकि सोना और चांदी दोनों के भाव इधर काफी कम हुए थे।
मामला फिर उपभोक्ता वस्तुओं की मांग घटने का नहीं है। उसकी कमी महंगाई के चलते भी होगी और संयोग से खाड़ी युद्ध छिड़ने के पहले हमने उपभोक्ता और थोक मूल्य सूचकांक में जो बदलाव किए वे अब नित नए रिकार्ड की सूचना दे रहे हैं। इससे ज्यादा चिंता कोर सेक्टर में उत्पादन के गिरावट की है और खास तौर से रासायनिक खादों के उत्पादन और खपत में गिरावट का। यह गिरावट नए रिकार्ड बना रही है पर उससे भी ज्यादा भविष्य के लिए चिंता पैदा कर रही है। कोरोना वाली मंदी में भी कृषि ही हमारे लिए सबसे बड़ी सहायक बनी थी। लगता है इस बार वह भी साथ छोड़ने जा रही है और यह लेखक जिस नोएडा-गाजियाबाद के इलाके में बैठकर यह लेख लिख रहा है वहां की और आसपास के पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सारी औद्योगिक गतिविधियां गैस की तंगी से परेशान है। काफी बंद पड़ी हैं। ऐसा अन्य औद्योगिक इलाकों की रिपोर्ट भी है और इससे भी बढ़कर हुआ है कि इनके निर्यात का आर्डर आना बंद हो गया है। जाहिर है यह संकट को लंबा खिचेगा।
यह सब गिनवाने का मतलब कोई आतंक पैदा करना नहीं है और न ही यह बताना ही है कि हमारी अर्थव्यवस्था चौपट हो गई है। निश्चित रूप से युद्ध शुरू होने के पहले हमारी अर्थव्यवस्था के ज्यादातर संकेतक हरा रंग ही दिखा रहे थे। और हम दुनिया में सबसे तेज विकास दर का दावा भी कर रहे थे। लेकिन उस युद्ध ने जिसका हमसे न कोई सीधा वास्ता है और न ही हमने खुद को उलझने दिया, उसका प्रभाव इतना ज्यादा आ जाए, यह हमारे प्रबंधन की गड़बड़ी है। रुपए का टूटना हो या सोने-चांदी में तेजी का, विदेश व्यापार में परेशानी हो या विकास दर की, आप सिर्फ और सिर्फ सस्ते श्रम के मत्थे अपना तेज विकास चाहते हैं और दुनिया को पीछे छोड़ना चाहते हैं तो यह भ्रम है। इसे जल्दी छोड़िए। लेकिन इससे भी बड़ा भ्रम चुनावी जीत का है। सारा कुछ छोड़कर दिन-रात और हर कर्म करके चुनाव जीतने पर लगे रहने का जनादेश आपको क्या किसी को नहीं होता। इसलिए 29 अप्रैल और चार मई के इंतजार को दूसरा मतलब दीजिए। अभी से भी अपने असली काम में जुटिये। इसकी बहुत जरूरत है।


