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दतिया से शुरू कांग्रेस एकता की नई कहानी

एकता और आत्मविश्वास के साथ वापसी की यह कहानी अब दतिया से शुरू हो सकती है। कांग्रेस ने अच्छा केंडिडेट दिया है।

दतिया से शुरू कांग्रेस एकता की नई कहानी
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एकता और आत्मविश्वास के साथ वापसी की यह कहानी अब दतिया से शुरू हो सकती है। कांग्रेस ने अच्छा केंडिडेट दिया है। बीजेपी में असंतोष है। और एक नई चीज जो सामान्यत: बीजेपी में नहीं दिखती गुटबाजी वह ऐसी दिख रही है कि पुलिस और प्रशासन को लाठियां, आंसूगैस के गोले, गिरफ्तारियां करनी पड़ी हैं। यहां अगर कांग्रेस एक होकर लड़ी तो प्रदेश की एकता देश के लिए सबक बन जाएगी।

दतिया से मध्य प्रदेश कांग्रेस की एकता की नई कहानी शुरू हो सकती है और अगर मध्यप्रदेश के नेताओं ने यह कर दिखाया तो इसका असर उन राज्यों पर भी पड़ेगा जहां कांग्रेस भारी गुटबाजी से ग्रस्त है।

फिलहाल पंजाब गुटबाजी का सबसे बड़ा केन्द्र बना हुआ है। चुनाव में छह महीने से कम का समय बचा है। कांग्रेस की संभावित जीत वाला राज्य है। मगर वहां के नेता विधानसभा जीत से ज्यादा आपस में एक दूसरे पर जीत में लगे हैं। उत्तराखंड का भी यही हाल है। वहां भी अगले साल के शुरू में चुनाव हैं। यहां भी कांग्रेस की स्थिति अच्छी बताई जा रही है। मगर गुटबाजी यहां भी खत्म होने का नाम नहीं ले रही।

राजनीति में जीत जरूरी है। और जरूरी क्या सबसे अहम चीज वही है। मध्यप्रदेश के कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने यह समझा है। दतिया उपचुनाव में वह पूरी ताकत लगाए हुए हैं। पहला पड़ाव बेहतर उम्मीदवार को टिकट देकर उन्होंने पार कर लिया है। अच्छी छवि, पार्टी के प्रति वफादारी और सबसे अधिक जीत की संभावना वाले घनश्याम सिंह को उपचुनाव के लिए तैयार कर के जीतू पटवारी ने अपने राजनीतिक कौशल का बेहतरीन परिचय दिया है।

दतिया राजघराने के वारिस कुंवर घनश्याम सिंह वैसे तो दो बार दतिया से विधायक रह चुके हैं। लेकिन फिर वे जिले की ही दूसरी जनरल सीट सेंवढ़ा पर चले गए थे। वहां 2018 का विधानसभा चुनाव जीते और अब भी वहीं तैयारी में लगे हुए थे। मगर अचनाक दतिया से 2023 में जीते कांग्रेस विधायक राजेन्द्र भारती की सदस्यता रद्द होने से यह उप चुनाव कांग्रेस के लिए प्रतिष्ठा का सवाल बन गया। राजेन्द्र को एक कोर्ट ने तीन साल की सज़ा सुनाई थी। जिसके बाद उनकी विधायकी रद्द कर दी गई और उपचुनाव की घोषणा हो गई। दिल्ली हाई कोर्ट से भी राजेन्द्र को कोई राहत नहीं मिली।

इस घटनाक्रम में एक बड़ा मोड़ तब आया जब दतिया से तीन बार से जीत रहे भाजपा के नरोत्तम मिश्रा का टिकट पार्टी ने काट दिया। नरोत्तम के लिए यह एक बड़ा झटका था। अप्रत्याशित। उनके समर्थकों ने रात भर हंगामा किया। नेशनल हाईवे जाम से लेकर गाड़ियों और पुलिस पर पथराव, भाजपा दफ्तर पर कब्जा वहां से पथराव और जिला अध्यक्ष सहित पूरी कार्यकारिणी का इस्तीफा-सब कर लिया। मगर दिल्ली और भोपाल दोनों जगह से नरोत्तम को साफ बता दिया गया कि इस तरह की अनुशासनहीनता और हिंसा के बाद टिकट पर पुनर्विचार संभव ही नहीं है।

कांग्रेस के लिए यह सुनहरा मौका बन गया। अगर यहां से कांग्रेस जीत जाती है तो मुख्यमंत्री मोहन यादव की उपचुनाव में यह लगातार दूसरी हार होगी। इससे पहले इसी ग्वालियर चंबल संभाग के विजयपुर विधानसभा उपचुनाव में मोहन यादव के मंत्री रामनिवास रावत को कांग्रेस हरा चुकी है।

कांग्रेस मध्यप्रदेश में हमेशा से जनता की पहली पसंद रही है। लेकिन पूरे दिल से चुनाव नहीं लड़ना और गुटबाजी के कारण पिछले 23 साल से सत्ता से बाहर है। 2018 के चुनाव में जीत कर सरकार बनाई थी। मगर एक साल बीतते बीतते मुख्यमंत्री कमलनाथ अपने ही नेता को चैलेंज करने लगे कि सड़क पर उतर कर बताओ। ज्योतिरादित्य सिंधिया उतर गए और सरकार गिरा दी। फिर बीजेपी की सरकार आ गई। और 2023 में भी।

लेकिन उस समय की एक घटना कांग्रेस के लिए बहुत प्रेरणादाई रही। जब ग्वालियर चंबल संभाग के अधिकांश कांग्रेस विधायक ज्योतिरादित्य के साथ बीजेपी में चले गए। तब घनश्याम सिंह राजपरिवारों के आपसी कनेक्शन और सिंधिया गुट के माने जाने के बाद भी उनके साथ नहीं गए। उस समय सेंवढ़ा से विधायक थे। पार्टी के प्रति उनकी वह वफादारी इस समय कांग्रेस में बहुत सम्मान और अभिमान के साथ याद की जा रही है।

दतिया के टिकट के दावेदार कई थे और नरोत्तम का टिकट कट जाने के बाद तो कई लोगों को लग रहा था कि उनकी जीत पक्की है। क्योंकि सब यह संभावना व्यक्त कर रहे थे कि टिकट कटने के बाद उनके लोगों का समर्थन उन्हें मिलेगा। और नरोत्तम भी नहीं चाहेंगे कि भाजपा के जिस नए प्रत्याशी आशुतोष तिवारी को टिकट दिया गया है, वह जीते। क्योंकि उसकी जीत के साथ यह सीट हमेशा के लिए उनके हाथ से निकल जाएगी।

नरोत्तम पहले दतिया के पड़ोस की विधानसभा सीट डबरा जिला ग्वालियर से लड़ते थे। वहां से तीन बार विधायक रहे। मगर 2008 के परिसीमन में वह सीट रिजर्व घोषित कर दी गई। ज्योतिरादित्य के साथ जाने वाली इमरती देवी जो अपने सिंधिया समर्थक बयानों के लिए काफी चर्चित रहीं कि उनके कहने से कुएं में कूद जाऊंगी वहीं से विधायक थीं।

बहरहाल जिक्र दतिया का हो रहा है जिसके बारे में मशहूर है कि अगर उर्दू में लिखा जाए तो दुनिया से एक नुक्ता (लेटर) ज्यादा आएगा। इसे रियासत टाइम में ऐसे कहा जाता था कि दुनिया से ऊपर है और अपनी स्वतंत्रता स्वाभिमान के मामले में थी भी। ग्वालियर की इतनी बड़ी सिंधिया रियासत कभी अपने प्रभाव में नहीं ले पाई। बगल की झांसी रियासत भी।

तो खैर नरोत्तम 2018 में दतिया आ गए। यहां की जनता की तरह नेताओं में भी एक खासियत अतिरिक्त उदारता और मदद करने की भावना रही है। खुद अपना नुकसान उठाने की सीमा तक। भाजपा के उस समय के दतिया के नेताओं ने अपने टिकट की बलि देकर नरोत्तम को यहां जगह दी। मगर समय सारे समीकरण बदल देता है। एक बार पांव जमने के बाद नरोत्तम ने फिर दतिया जिले की वह पूरी भाजपा अपने नियंत्रण में ले ली जिसने उन्हें यहां जगह दी थी। अभी केवल पूरी जिला कार्यकारिणी ही नहीं, चुने हुए नगरपालिका, पंचायत सभी भाजपा के पदाधिकारियों ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया था।

भाजपा या इससे पहले जनसंघ के इतिहास में भी ऐसा कभी नहीं हुआ। अब भाजपा को यह साबित करना पड़ रहा है पार्टी से बड़ा कोई नहीं है। दतिया चुनाव मोहन यादव के लिए अस्तित्व का सवाल बन गया है। सोमवार को वे अपने प्रदेश अध्यक्ष और तमाम बड़े नेताओं के साथ नए प्रत्याशी आशुतोष का नामांकन भरवाने दतिया आ रहे हैं।

इसी तरह प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी भी सोमवार को ही जो नामांकन की आखिरी तारीख है अपने प्रत्याशी के नामांकन में मौजूद रहेंगे। एक सप्ताह पहले भी वे उस समय दिग्विजय सिंह के साथ दतिया आए थे जब उनके आपस में तनाव की खबरें चल रही थीं। इसे एकता की कोशिशों के रूप में देखा गया था। दोनों एक ही ट्रेन से साथ बैठकर आए थे।

कांग्रेस ने एक ऐतिहासिक वापसी पहले ऐसे ही की थी। पचमढ़ी से।

मध्यप्रदेश के पचमढ़ी का 1998 का कांग्रेस सम्मेलन उसकी एकता और आत्मविश्वास का वाहक बना था। सोनिया गांधी को अध्यक्ष बने केवल चार महीने ही हुए थे। पार्टी आन्तरिक झगड़ों से टूट रही थी। नेता कार्यकर्ताओं का आत्मविश्वास खत्म हो रहा था। ऐसे में पचमढ़ी सम्मेलन ने कांग्रेस को नई ऊर्जा और विश्वास से भर दिया था।

एकता और आत्मविश्वास के साथ वापसी की यह कहानी अब दतिया से शुरू हो सकती है। कांग्रेस ने अच्छा केंडिडेट दिया है। बीजेपी में असंतोष है। और एक नई चीज जो सामान्यत: बीजेपी में नहीं दिखती गुटबाजी वह ऐसी दिख रही है कि पुलिस और प्रशासन को लाठियां, आंसूगैस के गोले, गिरफ्तारियां करनी पड़ी हैं।

यहां अगर कांग्रेस एक होकर लड़ी तो प्रदेश की एकता देश के लिए सबक बन जाएगी। राज्यों में सबसे बड़ी समस्या गुटबाजी की है। हरियाणा, राजस्थान इसी वजह से हारे हैं। अब पंजाब और उत्तराखंड जहां चुनाव हैं वहां इस पर कंट्रोल नहीं हो रहा है।

राहुल को दतिया आकर यहां से एकता का नया संदेश देना चाहिए। एकता कांग्रेस को वापस मजबूत और जीत के आत्मविश्वास से भर देगी।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार है)


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