नया तेल संकट ज्यादा दूर नहीं
ईरान और सऊदी अरब सचमुच दुश्मन की तरह लड़ रहे हैं और अगर वे शांति की घोषणा के पक्ष में आते हैं तो यह ब्रिक्स की बड़ी सफलता थी।

- अरविन्द मोहन
ईरान और सऊदी अरब सचमुच दुश्मन की तरह लड़ रहे हैं और अगर वे शांति की घोषणा के पक्ष में आते हैं तो यह ब्रिक्स की बड़ी सफलता थी। लेकिन दिल्ली की बैठक शुरू होने के पहले ही ईरान और अमेरिका फिर से उलझ कर पश्चिम एशिया के संकट के साथ तेल की कीमतों में नई आग लगा चुके थे। होर्मुज एक बार फिर तेलवाहक जहाजों के लिए संकट का मार्ग बन गया है।
यह कहना तो सरासर गलत होगा कि नई दिल्ली में हुए ब्रिक्स सम्मेलन और उसमें जुटे दिग्गजों को दुनिया की खबर न होगी और यमन के हुती विद्रोहियों की जीत का पता न होगा। या फिर खाड़ी में फिर से जंग की स्थिति और सऊदी तेल ठिकानों पर बमबारी से कीमतों में उछाल का पता न होगा। दुनिया की खबर में तो ईरान, रूस और चीन ही नहीं सऊदी अरब भी बड़ा साझीदार हैं और दिल्ली सम्मेलन ने दूसरे देश पर हमला जैसे भारी विवादास्पद मामले में ईरान और सऊदी अरब के बीच एक घोषणापत्र पर सहमति बनाकर दुनिया को चौंकाया भी।
ईरान और सऊदी अरब सचमुच दुश्मन की तरह लड़ रहे हैं और अगर वे शांति की घोषणा के पक्ष में आते हैं तो यह ब्रिक्स की बड़ी सफलता थी। लेकिन दिल्ली की बैठक शुरू होने के पहले ही ईरान और अमेरिका फिर से उलझ कर पश्चिम एशिया के संकट के साथ तेल की कीमतों में नई आग लगा चुके थे। होर्मुज एक बार फिर तेलवाहक जहाजों के लिए संकट का मार्ग बन गया है और वहां आ जा रहे जहाजों के साथ ईरान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात समेत खाड़ी के अनेक निशाने बमबारी का ठिकाना बने। इसमें अमेरिका अगुआ रहा जबकि उसके जहाजों को भी निशाना बनाए जाने की खबर आई। और हम लोग अतिथियों के सत्कार और सुरक्षा के लिए शानदार आयोजन में लगे रहे तब तक दुनिया में कच्चे तेल की कीमत करीब बीस फीसदी ऊपर पहुंच गई।
अब सरकारी आयोजन से और तैयारियों को हम किस मुंह से गलत बताएंगे लेकिन जिस तरह से हमारी मीडिया भी पश्चिम एशिया के इस विवाद के बढ़ने के साथ तेल की कीमतों वाले सवाल को भूली हुई थी वह हैरान करने वाला है। जबकि यह भी हुआ कि इस संकट की परछाई हमारे शेयर बाजारों और अर्थव्यवस्था के अन्य पक्षों पर पड़ी और उससे स्थिति की गंभीरता का अंदाजा लग जाता है। हम यह तो बताते रहे कि ब्रिक्स देशों में दुनिया की कितनी आबादी है और दुनिया के जीडीपी में उनका हिस्सा किताना है। हम यह भी बताते रहे कि अमेरिका और यूरोप ही नहीं हमारे पड़ोसी पाकिस्तान में इस आयोजन और इसकी सफलता को लेकर जितना जलन है। अमेरिकी राष्ट्रपति नए सचमुच में ऐसे बयान दिए भी। उनके इन बयानों और ईरान पर हमले के पीछे उनकी अपनी नीति भी है और एक किस्म की अनिवार्यता भी।
लेकिन हुती विद्रोहियों ने इसी बीच जिस आसानी से बाब एल मांदेब द्वीप समेत कई नए द्वीपों और इलाकों पर अपना कब्जा जमा लिया वह दुनिया में तेल की आपूर्ति के रास्ते में नई बाधा बनकर सामने आया। और कोढ़ में खाज की तरह ट्रम्प का यह बयान भी इसी के साथ आ गया कि अमेरिका की हुती विद्रोहियों के साथ बातचीत हुई है और वे अमेरिका द्वारा कार्रवाई न करने की मांग कर रहे हैं। इस मांग पर हमें कोई आपत्ति नहीं है।
पिछली बार तीन साल पहले जब इन विद्रोहियों का इस द्वीप पर कब्जा हुआ था तो लाल सागर से तेल की आपूर्ति आधी रह गई और स्वेज नहर होकर आने वाला परिवहन भी प्रभावित हुआ। इस कब्जे के पहले रोज 93 लाख बैरल तेल वहां से गुजरता था जो घटकर 46 लाख बैरल रह गया। इस बार उनकी जीत ज्यादा बड़े इलाके में हुई है और माना जा रहा है कि वे तेल आपूर्ति वाले जहाजों को ज्यादा परेशान करेंगे, ज्यादा वसूली करेंगे। और अगर अमेरिका उनके खिलाफ कार्रवाई में चूका तो बाकी दुनिया के लिए खतरा बढ़ेगा।
ट्रम्प की इस बात पर यकीन करने वाले कम लोग नहीं हैं क्योंकि होर्मुज और तेल के धंधे में नई दिलचस्पी लेने के बावजूद अमेरिका पहली बार सऊदी अरब समेत खादी के अपने मित्र देशों को ईरानी हमले के मामले में अकेला जैसा बना दिया है जबकि इन देशों से उसने सुरक्षा संधि कर रखी है। अभी पिछले नवंबर में ही ट्रम्प और सऊदी सुल्तान मोहम्मद बिन सलमान के बीच रक्षा समझौता हुआ था। असल में ट्रम्प अमेरिका में अपनी कमजोर राजनैतिक स्थिति के मद्देनजर ऐसी सारी गारंटियों को भूल रहे हैं क्योंकि अमेरिकी लोग बाहर सैन्य दखल का नाम सुनते ही और भड़क जाते हैं। दूसरी ओर वे तेल की कमाई से अमेरिकी खजाना भरकर अपनी राजनीति चमकाना भी चाहते हैं। वेनेजुएला का तेल वे अपना मानकर बेच ही रहे हैं और होर्मुज पर नियंत्रण के माध्यम से वे मध्य पूर्व के तेल बाजार से मलाई खाना चाहते हैं। अब उनकी जो भी राजनैतिक और आर्थिक मजबूरियां हों दुनिया उनकी योजना से ही चले यह जरूरी नहीं है। दिल्ली में सऊदी अरब और ईरान का एक घोषणापत्र पर सहमत होना उनको पसंद नहीं आ सकता। इसी तरह मक्का संधि के जरिए सऊदी अरब ने अपनी सुरक्षा का वैकल्पिक रास्ता भी बनाया है।
लेकिन अमेरिका अगर हुती विद्रोहियों के खिलाफ कार्रवाई से हिचकता है या शांत बैठ जाता है तो दुनिया का तेल संकट और बढ़ेगा और अभी अगर कच्चा तेल 110 डालर प्रति बैरल पहुंचा है तो कल कहां तक जाएगा यह कहना मुश्किल है। अभी ईरान पर अमेरिका और इजरायल के हमले के बाद छिड़ी जंग के समय होर्मुज से आवाजाही बंद हुई या बहुत कम हो गई थी। उस पूरे ब्यौरे में जाने की जरूरत नहीं है लेकिन तब यह हुआ कि चीन ने तेल का आयात काफी कम कर दिया और तेल के जहाज होर्मुज की जगह लाल सागर से आने जाने लगे। कीमतें बढ़ीं लेकिन वैसी नहीं जितनी इस बार लगा रही हैं।
इस बार का खतरा बड़ा होने की वजह सिर्फ हुती जमात की कारस्तानी नहीं है। उससे कच्चे तेल के साथ रिफाइंड तेल अर्थात डीजल और पेट्रोल की आवाजाही भी प्रभावित होगी। भारत जैसे देश नए पिछले संकट के समय चुप्पी सी साधी और रूस से काफी कच्चा तेल लाकर रिफायनिंग करके निर्यात किया और अच्छी कमाई करके अर्थव्यवस्था को अच्छी स्थिति में कर लिया। इस बार रिफाइन्स तेल की आवाजाही रुकेगी या प्रभावित होगी तो भारत समेत काफी देश तो प्रभावित होंगे ही डीजल -पेट्रोल के ग्राहक पिट जाएंगे।
अमेरिका में अभी ही जिस रफ्तार में डीजल की कीमतें साल भर में दो गुना तक हो गईं हैं उससे साफ है कि वहां ज्यादा कोहराम होगा। दूसरे यूक्रेन-रूस लड़ाई में, जिसका ब्रिक्स घोषणापत्र में जिक्र भी नहीं हुआ, रूस की तेल उत्पादन क्षमता प्रभावित हुई है। उनकी रिफायनिंग क्षमता तो नष्ट हुई ही है तेल निकालना भी कम हुआ है। ऐसे में अगर मौजूदा संकट के प्रति ब्रिक समेत दुनिया के सभी सक्रिय राष्ट्र समूह पहल नहीं करेंगे तो तेल का नया वैश्विक संकट आएगा ही।


