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संविधान की शपथ फिर याद करने की जरूरत

केरल हाई कोर्ट ने तिरुवनंतपुरम नगर निगम के 20 भाजपा पार्षदों और एक कांग्रेस पार्षद की शपथ को रद्द कर दिया है, क्योंकि इन लोगों ने देवताओं, शहीदों के नाम पर शपथ ली थी।

संविधान की शपथ फिर याद करने की जरूरत
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हाईकोर्ट ने एक अहम टिप्पणी में कहा कि, 'शपथ लोकतंत्र में बेहद अहम होती है। यह वादा होता है कि चुना हुआ प्रतिनिधि ईमानदारी से काम करेगा, संविधान का पालन करेगा और लोगों की सेवा करेगा। इसलिए शपथ बिल्कुल कानून के अनुसार ही लेनी चाहिए।' केरल हाईकोर्ट की इस बात को संसद और प्रधानमंत्री कार्यालय से लेकर हरेक राज्य, हरेक सरकारी दफ्तर, हरेक मंत्रालय में सुनाए और पढ़ाए जाने की जरूरत है।

केरल हाई कोर्ट ने तिरुवनंतपुरम नगर निगम के 20 भाजपा पार्षदों और एक कांग्रेस पार्षद की शपथ को रद्द कर दिया है, क्योंकि इन लोगों ने देवताओं, शहीदों के नाम पर शपथ ली थी। 21 दिसंबर 2025 को तिरुवनंतपुरम नगर निगम चुनाव के बाद शपथ ग्रहण समारोह में भाजपा के कई पार्षदों ने जहां 'गुरुदेव', 'भारतमाता', 'काविलम्मा', 'अट्टुकल अम्मा', 'श्री पद्मनाभस्वामी', 'अयप्पा' जैसे देवी-देवताओं के नाम पर शपथ ली तो कुछ ने अपने राजनीतिक संगठन के शहीदों के नाम पर भी शपथ ली। जबकि कांग्रेस पार्षद सुनील चुवत्तुपडम ने तो शपथ में 'भगवान की कृपा और ओमेन चांडी के नाम पर' कहा था। इस तरह शपथ लेने के खिलाफ हाईकोर्ट में याचिकाएं दायर हुईं, जिन पर सुनवाई करते हुए जस्टिस पी.वी. कुन्हिकृष्णन ने अपने फै़सले में कहा कि 'कानून में साफ-साफ लिखा है कि पार्षद शपथ 'भगवान के नाम पर' या बिना किसी नाम के केरल म्यूनिसिपल एक्ट 1994 के तहत तय फॉर्मेट में 'सत्यनिष्ठा से प्रतिज्ञा' ले सकते हैं। कोर्ट ने यह फ़ै सला सुनाते हुए श्री नारायण गुरु के प्रसिद्ध संदेश का भी ज़िक्र किया कि, 'एक जाति, एक मत, एक दैवं मनुष्यनु'। अर्थात समस्त मानवों के लिए एक ही जाति, एक ही धर्म, और एक ही ईश्वर है। केरल हाई कोर्ट ने कहा कि सभी धर्मों के भगवान को सिर्फ 'ईश्वर' कहकर बुलाया जाए तो सारी समस्या ख़त्म हो जाएगी।

इसके साथ हाईकोर्ट ने एक अहम टिप्पणी में कहा कि, 'शपथ लोकतंत्र में बेहद अहम होती है। यह वादा होता है कि चुना हुआ प्रतिनिधि ईमानदारी से काम करेगा, संविधान का पालन करेगा और लोगों की सेवा करेगा। इसलिए शपथ बिल्कुल कानून के अनुसार ही लेनी चाहिए।'

केरल हाईकोर्ट की इस बात को संसद और प्रधानमंत्री कार्यालय से लेकर हरेक राज्य, हरेक सरकारी दफ्तर, हरेक मंत्रालय में सुनाए और पढ़ाए जाने की जरूरत है। प्रधानमंत्री मोदी जब मन की बात करते हैं तब भाजपा के अध्यक्ष से लेकर सारे मुख्यमंत्रियों और मंत्रियों को विद्यार्थियों की तरह सुनने बिठा दिया जाता है। वैसे ही इस शपथ को भी सभी को फिर से सुनाने की जरूरत है। रेडियो प्रसारण के बारे में हमेशा यही कहा जाता रहा है कि चलते-फिरते अपना काम करते हुए आप रेडियो सुन सकते हैं, इसमें टीवी की तरह बंधन नहीं है कि एक ही जगह पर बैठ कर सुना जाए। लेकिन मन की बात को नरेन्द्र मोदी ने रेडियो का बंधनकारी प्रसारण बना दिया है। बहरहाल, मूल विषय पर आया जाए कि शपथ की लोकतंत्र में जो अहमियत है, उसे केरल हाईकोर्ट ने याद दिलाया है और इसमें निर्वाचित प्रतिनिधियों की जिम्मेदारी भी बताई है कि उन्हें ईमानदारी से काम करते हुए संविधान का पालन करना होता है। अगर सरकारें बढ़-चढ़ कर बातें किए बिना केवल इसी शपथ पर काम करें तो देश की सारी व्यवस्था सुचारू चलेगी। और तरक्की भी अपने आप दिखाई देगी। तब हजारों करोड़ के विज्ञापन देकर जनता को यह बताना नहीं पड़ेगा कि देश आगे बढ़ रहा है।

अभी तो आलम ऐसा है कि जो हो रहा है उसे छिपाया जा रहा है और जो नहीं हो रहा है उसका आभासी माहौल बनाया जा रहा है। अभी एक टीवी चैनल के कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पहुंचे थे, जहां उन्होंने राष्ट्र प्रथम, राष्ट्र सर्वोपरि जैसे शब्दों के इर्द-गिर्द अपना पूरा भाषण समेटा और उसमें अर्थव्यवस्था, कनेक्टिविटी, किसानों की बेहतरी, अच्छी स्वास्थ्य सुविधाएं, मध्यवर्ग और गरीबों के आर्थिक लाभ के लिए किए गए उपाय जैसे विषयों पर अपनी सरकार की उपलब्धियों को गिनाया। इसमें विपक्ष पर तंज भी कसा कि कुछ लोग विकास की पहलों का विरोध करते हैं। जाहिर है उनके निशाने पर राहुल गांधी ही थे, जिन्होंने ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट को लेकर मुहिम छेड़ी हुई है कि हजारों सालों में बने जंगलों और समुद्र के नीचे की अद्भुत प्राकृ तिक संपत्ति को निजी हाथों में न दिया जाए, क्योंकि इस नुकसान की भरपाई कभी नहीं हो पाएगी। मोदी को अगर विपक्ष के विरोध से आपत्ति है, तो वे अपने सही तर्कों से उसे खारिज करें, लेकिन इसकी जगह वे केवल आरोप लगाना जानते हैं। टीवी चैनल के मंच से दिया गया उनका भाषण या संसद में दिए उनके भाषण या संसद में राष्ट्रपति के अभिभाषणों में कोई फर्क ही अब नजर नहीं आता है। हमेशा केवल अपनी सरकार की वाहवाही की जाती है। जब इतना ही अच्छा काम हो रहा है और अपने पद की शपथ को ईमानदारी से निभाया जा रहा है, तो बार-बार जनता को सड़कों पर क्यों उतरना पड़ता है।

अभी 22 जून को ही लखनऊ में कोचिंग सेंटर अग्निकांड में 15 बच्चे मारे गए, जिसके एक चश्मदीद युवक ने कहा कि हम लोग तो मरने के लिए ही बने हैं। इस एक वाक्य में कितनी गहरी निराशा छिपी हुई है, यह जाहिर है, बस सत्ता पर बैठे लोग इसे अनदेखा कर रहे हैं। देश का आम आदमी जब यह समझने लगे कि बुनियादी सुविधाओं से लेकर शिक्षा, नौकरी, इलाज, यात्रा, सुरक्षित माहौल हर बात के लिए कदम-कदम पर जूझना ही उसकी नियति है, तो यह असल में उस सरकार की असफलता का सबसे बड़ा प्रमाणपत्र है, जो सब चंगा सी का दावा लगातार कर रही है। भारत की जनता तो अब धर्म के नाम पर हो रही लूटपाट को भी शायद नियति मान चुकी है। इसलिए जिन लोगों ने अयोध्या में एक धक्का और देकर बाबरी मस्जिद को तोड़ा, कारसेवा को अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया, बाबरी मस्जिद को तोड़कर कंधों पर चढ़कर खुशियां मनाईं और फिर राम मंदिर बन जाने को देश की अहम उपलब्धि माना, उन लोगों में राम मंदिर में हो रही चोरी को लेकर कोई उद्वेलन या पीड़ा या आक्रोश नहीं दिख रहा है।

पाठक जानते हैं कि राम मंदिर बनने के वक्त से ही कहीं जमीनों की खरीद-फरोख्त में हेरा-फेरी के मामले आए, तो कहीं सड़क सौंदर्यीकरण के नाम पर घोटाला हुआ। राम मंदिर निर्माण के लिए जो ट्रस्ट फरवरी 2020 में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद बना, उसमें भी गड़बड़ी की खबरें आई थीं। द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार ट्रस्ट गठन के कुछ महीने बाद ही नवंबर 2020 में एक प्राइवेट ऑडिट फर्म ने ट्रस्ट के फंड मैनेजमेंट और डेटा मैनेजमेंट की जांच की। रिपोर्ट में साफ़ चेतावनी दी गई थी कि चंदे का कोई व्यवस्थित रिकॉर्ड नहीं है। उस ऑडिट रिपोर्ट में सुधार के लिए कई सिफारिशें भी की गई थीं। जैसे हर लेन-देन, डेटा एंट्री और स्टाफ के लिए सिस्टेमैटिक ऑपरेटिंग प्रोसेस यानी एसओपी बनाना ज़रूरी है। लेकिन ऐसी कोई पहल नहीं की गई। खबर है कि ट्रस्ट को अब तक क़रीब 3500 करोड़ रुपये नकद चंदे के रूप में मिले हैं, इसके अलावा सोने-चांदी के आभूषण भी चढ़ावे में आए हैं। मगर अब चांदी सोने के आभूषण, चांदी की ईंटे, चांदी के काग भुषुंडी जैसे दान में दी गई कई बहुमूल्य वस्तुएं गायब हैं और साथ ही करोड़ों का नकद चंदा भी गायब है या उसका हिसाब-किताब ठीक से नहीं रखा गया। आरोप हैं कि दानपात्रों से रोजाना आने वाले लाखों रुपये की गिनती से पहले या गिनती के दौरान हेराफेरी की गई। खबरें ये भी हैं कि चढ़ावा गिनती वाले क्षेत्र का 7-8 महीने का सीसीटीवी फुटेज गायब किया गया है।

7 जून को जब अखिलेश यादव ने आरोप लगाया तो इस पर राजनीतिक विवाद भी बढ़ा। अब योगी सरकार ने एसआईटी गठित की है, जिसकी शुरुआती रिपोर्ट में कई स्तरों पर लापरवाही पाए जाने की बात सामने आ रही है। अभी तक रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं हुई है। मगर कहा जा रहा है कि यदि 2020 में ही ऑडिट रिपोर्ट की सिफारिशों पर अमल किया गया होता तो आज की यह गड़बड़ी टाली जा सकती थी। लेकिन इसे महज गड़बड़ी कहना एक गंभीर अपराध को कमतर करना होगा। अखिलेश यादव के आरोपों के बाद इसमें राजनीतिक विवाद बढ़ा क्योंकि भाजपा की राजनीति राम मंदिर से ही परवान चढ़ी। अगर लोगों की धार्मिक भावनाओं को भुनाने के लिए लालकृष्ण आडवानी रथयात्रा न निकालते, तो आज देश का माहौल एकदम अलग होता। भ्रष्टाचार तो हर सरकार में रहा है, लेकिन सांप्रदायिक नफरत में देश को जकड़ने का काम जितना भाजपा ने किया है, किसी और दल ने नहीं किया। रथयात्रा से लेकर गोधरा तक देश ने इस नफरत को खूब सहा। लोग धर्म के नाम पर उन्मादी बना दिए गए। और अब उन्हीं लोगों को ठेंगा दिखाकर सत्ता पर बैठे लोग बता रहे हैं कि तुम धर्म के नाम पर लड़ो-मरो हम तो भगवान के सामने से चोरी करके चले जाएंगे। अयोध्या की चोरी की खबर तो अब खुल रही है, इससे पहले केदारनाथ में भी चोरी की खबर आई, लेकिन उस पर भी धार्मिक समाज खामोश ही रहा।

श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर से लेकर तिरुपति देवस्थानम और जगन्नाथ पुरी तक कई बड़े मंदिरों के पास करोड़ों की संपत्ति है, जिनसे बहुत से जनहित और समाजहित के कार्य होते हैं। लेकिन दशकों से इन मंदिरों का कामकाज, हिसाब-किताब सब ठीक से चल रहा है, कम से कम अयोध्या के राम मंदिर जैसी चोरी की खबरें तो नहीं आई हैं। अब क्या सभी देवालयों को सावधान होने की जरूरत है। और क्या उनसे पहले जनता को जागने की जरूरत है कि आपके संवैधानिक अधिकारों के साथ-साथ धार्मिक आस्था भी चुराई जा रही है।


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