हर देश के लिए जरूरी है 'शांति मंत्रालय'
बीसवीं सदी के दो विश्वयुद्धों और हिरोशिमा-नागासाकी की त्रासदी ने मानवता को विश्वास दिलाया था कि शायद अब 'युद्ध' इतिहास की बात बन जाएंगे, किंतु इक्कीसवीं सदी में ऐसा नहीं हुआ।

- कुमार सिद्धार्थ
बीसवीं सदी के दो विश्वयुद्धों और हिरोशिमा-नागासाकी की त्रासदी ने मानवता को विश्वास दिलाया था कि शायद अब 'युद्ध' इतिहास की बात बन जाएंगे, किंतु इक्कीसवीं सदी में ऐसा नहीं हुआ। रूस-यूक्रेन युद्ध तीसरे वर्ष में है। गाज़ा में मानवीय संकट गहराता जा रहा है। पश्चिम एशिया, अफ्रीका के अनेक गृहयुद्ध और एशिया में बढ़ते सामरिक तनाव बताते हैं कि आधुनिक विश्व अभी भी हथियारों के भरोसे सुरक्षा खोज रहा है।
हर वर्ष 21 सितंबर को दुनिया 'अंतरराष्ट्रीय शांति दिवस' मनाती है। 'संयुक्त राष्ट्र संघ' (यूएन) ने 1981 में इसकी शुरुआत इस उद्देश्य से की थी कि विश्व समुदाय युद्ध और हिंसा से ऊपर उठकर शांति, संवाद और सह-अस्तित्व की संस्कृति को मजबूत करे। वर्ष 2001 में 'यूएन' ने सर्वसम्मति से इस दिन को 'वैश्विक संघर्ष-विराम' और 'अहिंसा दिवस' के रूप में भी मान्यता दी, लेकिन दुर्भाग्या से जिस दुनिया में शांति के नाम पर एक दिन समर्पित है, उसी दुनिया में वर्ष के शेष दिनों में युद्धों की तैयारी अधिक व्यवस्थित ढंग से होती दिखती है।
बीसवीं सदी के दो विश्वयुद्धों और हिरोशिमा-नागासाकी की त्रासदी ने मानवता को विश्वास दिलाया था कि शायद अब 'युद्ध' इतिहास की बात बन जाएंगे, किंतु इक्कीसवीं सदी में ऐसा नहीं हुआ। रूस-यूक्रेन युद्ध तीसरे वर्ष में है। गाज़ा में मानवीय संकट गहराता जा रहा है। पश्चिम एशिया, अफ्रीका के अनेक गृहयुद्ध और एशिया में बढ़ते सामरिक तनाव बताते हैं कि आधुनिक विश्व अभी भी हथियारों के भरोसे सुरक्षा खोज रहा है। परमाणु हथियारों का जखीरा आज भी हजारों की संख्या में मौजूद है और वैश्विक सैन्य बजट लगातार बढ़ रहे हैं। तो क्या हथियारों की बढ़ती संख्या दुनिया को अधिक सुरक्षित बना रही है?
गांधीवादी चिंतक और लेखक सतीश कुमार ने इसी प्रश्न को नए दृष्टिकोण से उठाया है। अपने एक लेख में उन्होंने कहा है कि जिस प्रकार लगभग हर देश में रक्षा मंत्रालय हैं, उसी प्रकार प्रत्येक देश में 'शांति मंत्रालय' भी होना चाहिए। ऐसा मंत्रालय समाज में संवाद, मध्यस्थता, शांति शिक्षा, अहिंसक प्रतिरोध, सामुदायिक मेल-मिलाप और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देने का काम कर सकता है। यदि सरकारें युद्ध की तैयारी के लिए विशाल संस्थागत ढांचे विकसित कर सकती हैं, तो शांति की तैयारी के लिए भी संस्थागत व्यवस्था बनाई जानी चाहिए।
पहली दृष्टि में यह विचार आदर्शवादी लग सकता है, लेकिन वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में इसकी प्रासंगिकता को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। दुनिया के लगभग सभी देशों के पास रक्षा मंत्रालय, सेनाएं, युद्ध रणनीतियां और हथियारों के आधुनिकीकरण की योजनाएं हैं, किंतु शायद ही कोई ऐसा देश हो जहां संवाद, मेल-मिलाप, संघर्ष-निवारण और शांति शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए अलग मंत्रालय हो। 'स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट' के अनुसार वर्ष 2024 में दुनिया का सैन्य व्यय लगभग 2.7 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गया था, जो अब तक का सर्वाधिक है। यह लगातार दसवां वर्ष था, जब वैश्विक रक्षा व्यय में वृद्धि दर्ज की गई। अमेरिका, चीन, रूस, जर्मनी और भारत सबसे अधिक रक्षा व्यय करने वाले देशों में शामिल हैं। इसके विपरीत 'यूएन' की अनेक मानवीय और शांति-स्थापना एजेंसियां संसाधनों की कमी से जूझती रहती हैं। यह विरोधाभास बताता है कि विश्व राजनीति की प्राथमिकताएं किस दिशा में झुकी हुई हैं।
युद्ध की सबसे बड़ी कीमत सैनिकों से अधिक राष्ट्र के आम नागरिक चुकाते हैं। 'संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायुक्त' (यूएनएचसीआर) के अनुसार दुनिया में 12 करोड़ से अधिक लोग युद्ध, हिंसा और उत्पीड़न के कारण अपने घर छोड़ने को विवश हैं। गाज़ा, यूक्रेन और सूडान जैसे क्षेत्रों में स्कूल, अस्पताल और नागरिक बस्तियां नष्ट हुई हैं। लाखों बच्चे शिक्षा से वंचित हुए हैं और असंख्य परिवार विस्थापन का जीवन जी रहे हैं। आधुनिक युद्ध केवल सीमाओं को नहीं, बल्कि समाजों के विश्वास, मानवीय गरिमा और भविष्य को भी समाप्त करते हैं। युद्ध का एक और गंभीर पक्ष पर्यावरणीय विनाश है। आधुनिक सेनाएं भारी मात्रा में जीवाश्म ईंधन का उपयोग करती हैं। बमबारी से जंगल, कृषि भूमि और जलस्रोत नष्ट होते हैं। औद्योगिक प्रतिष्ठानों के ध्वस्त होने से विषैले रसायन वातावरण में फैलते हैं और 'ग्रीनहाउस गैसों' का उत्सर्जन बढ़ता है। सतीश कुमार का प्रस्ताव है कि रक्षा बजट का एक हिस्सा शांति निर्माण के लिए निर्धारित किया जाना चाहिए। शांति मंत्रालय का कार्य केवल युद्ध रोकना नहीं, बल्कि शांति शिक्षा, संवाद, मध्यस्थता, सामुदायिक मेल-मिलाप, अहिंसक प्रतिरोध, संघर्ष-निवारण और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देना होगा।
दरअसल, शांति को संस्थागत रूप देने का विचार नया नहीं है। महात्मा गांधी का मानना था कि हिंसा अंतत: प्रतिहिंसा को जन्म देती है। स्वतंत्रता आंदोलन इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जहां करोड़ों लोगों ने बिना हथियार एक साम्राज्य को चुनौती दी। गांधी का स्वराज केवल राजनीतिक स्वतंत्रता नहीं था; वह ऐसे समाज की परिकल्पना थी जहां संघर्षों का समाधान संवाद और नैतिक शक्ति से हो।
गांधी की इसी परंपरा को विनोबा भावे, दादा धर्माधिकारी, जयप्रकाश नारायण और नारायण देसाई जैसे अनेक विचारकों ने आगे बढ़ाया और समाज में संवाद, रचनात्मक कार्यक्रमों और अहिंसक संघर्षों को लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति माना। इन सभी का विश्वास था कि स्थायी सुरक्षा हथियारों से नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण समाज, लोकतांत्रिक भागीदारी और अहिंसक संस्कृति से आती है। इस दृष्टि से 'शांति मंत्रालय' का प्रस्ताव गांधीवादी चिंतन का समकालीन संस्थागत विस्तार प्रतीत होता है। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन और दार्शनिक बट्रेंड रसेल ने भी मानवता को यही चेतावनी दी थी। 1955 के प्रसिद्ध 'रसेल-आइंस्टीन घोषणापत्र' में उन्होंने विश्व नेताओं से आग्रह किया था कि वे युद्ध की बजाय मानव अस्तित्व को प्राथमिकता दें। घोषणापत्र का सबसे प्रसिद्ध वाक्य आज भी प्रासंगिक है- 'अपनी मनुष्यता को याद रखिए और बाकी सब भूल जाइए।' यही विचार आगे चलकर परमाणु निरस्त्रीकरण और वैश्विक शांति आंदोलनों की प्रेरणा बना।
'यूएन' की स्थापना इसी विश्वास के साथ हुई थी कि आने वाली पीढ़ियों को युद्ध की विभीषिका से बचाया जाए। 'यूएन चार्टर' की प्रस्तावना में इसका स्पष्ट उल्लेख है। शांति स्थापना अभियानों, संघर्ष-निवारण, मध्यस्थता और 'अंतरराष्ट्रीय शांति दिवस' जैसी पहलों के माध्यम से 'यूएन' लगातार प्रयास करता रहा है। हालांकि महाशक्तियों के राजनीतिक हित और 'वीटो व्यवस्था' अक्सर इन प्रयासों को सीमित कर देते हैं।
भारत के लिए यह विमर्श विशेष महत्व का है। 'अहिंसा परमो धर्म:,' 'वसुधैव कुटुम्बकम्' और गांधी का सत्याग्रह केवल आदर्श नहीं, बल्कि वैश्विक राजनीति के वैकल्पिक मूल्य भी हैं। भारत अपनी सुरक्षा जरूरतों से समझौता किए बिना भी शांति शिक्षा, संघर्ष-समाधान, मानवीय कूटनीति और अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता के क्षेत्रों में नई पहल कर सकता है। यदि भारत 'एक पृथ्वी, एक परिवार, एक भविष्य' का संदेश विश्व समुदाय को दे सकता है, तो शांति को सार्वजनिक नीति का विषय बनाने की बहस का नेतृत्व भी कर सकता है।
केवल एक नया मंत्रालय बना देने से युद्ध समाप्त नहीं होंगे। युद्धों के पीछे भू-राजनीतिक हित, संसाधनों की प्रतिस्पर्धा और वैचारिक टकराव जैसे अनेक कारण होते हैं। फिर भी संस्थाएं समाज की प्राथमिकताओं का प्रतीक होती हैं। जिस प्रकार पर्यावरण संरक्षण के लिए अलग मंत्रालय बनने के बाद पर्यावरण नीति को नई पहचान मिली और आपदा प्रबंधन के लिए अलग संस्थागत व्यवस्था विकसित हुई, उसी प्रकार शांति के लिए समर्पित संस्थान भी यह संदेश देंगे कि राष्ट्र केवल युद्ध जीतने की नहीं, बल्कि शांति स्थापित करने की तैयारी कर रहे हैं। यदि मानवता ने युद्ध के लिए मंत्रालय बनाए हैं, तो क्या अब समय नहीं आ गया कि वह शांति के लिए भी एक मंत्रालय बनाने का साहस दिखाए?
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार एवं सामाजिक कार्यों से संबद्ध हैं।)


