मोदीजी की बड़ी हार लेकिन नरेटिव की लड़ाई में कांग्रेस को मेहनत करना होगी
काकरोच जनता पार्टी ने अपना आन्दोलन खत्म कर दिया मगर राहुल की लड़ाई लंबी है। जो लोग कहते थे कि राहुल जंतर मंतर पर क्यों नहीं जाते उसका जवाब यही है।

काकरोच जनता पार्टी ने अपना आन्दोलन खत्म कर दिया मगर राहुल की लड़ाई लंबी है। जो लोग कहते थे कि राहुल जंतर मंतर पर क्यों नहीं जाते उसका जवाब यही है। राहुल अमित शाह और मोदी से सवाल कर रहे हैं। धर्मेंन्द्र प्रधान के इस्तीफे के बाद शनिवार को उन्होंने कहा कि वह तो होना ही था मगर सवाल पूरी शिक्षा व्यवस्था का है।
अब खेल नरेटिव का है। प्रधानमंत्री मोदी की पुरानी फेक इमेज अब नहीं बन सकती। बीजेपी आरएसएस को उसमें रूचि भी नहीं है। लेकिन हां, राहुल की छवि खराब करने का काम और तेज होगा।
भाजपा संघ की राजनीति ही यही है। दूसरे की लकीर छोटी करना। और यहीं कांग्रेस को बहुत होशियारी से काम करने की जरूरत है। मोदी की 12 साल में यह सबसे बड़ी हार है। उनके भक्त, गोदी मीडिया खुद पार्टी के लोग और आरएसएस सब सोचते थे कि मोदी कोई जादू मारेंगे और जंतर मंतर खाली हो जाएगा। मास्टर स्ट्रोक। मोदी का चौंकाने वाला फैसला। इसी तरह यह लोग मोदी की फेक इमेज बनाते थे। गुजरात के झूठे विकास माडल से लेकर, छप्पन इंच की छाती और मोदी नहीं तो कौन जैसी झूठी धारणाएं बनाकर वे मोदीजी की महिमा मंडन करते थे।
लेकिन जानते थे यह सच नहीं है। इसलिए दूसरी तरफ राहुल की छवि खराब करने का काम भी मोदी की छवि बनाने जैसी मेहनत से करते थे। खुद राहुल ने कहा कि- मेरी छवि खराब करने के लिए हजारों-करोड़ रुपया खर्च किया। लेकिन सच्चाई हमेशा के लिए छुपाई नहीं जा सकती।
अब धर्मेंन्द्र प्रधान के इस्तीफे के साथ मोदी की सारी इमेजें एक साथ टूट गईं। हमारी सरकार में इस्तीफे नहीं होते एक बड़ा दावा था। और यह भी यूपीए सरकार को कमजोर दिखाने के लिए कि वहां मंत्री हटा दिए जाते थे।
यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह अच्छा करते थे कि किसी पर आरोप होने के बाद उसका मंत्री पद छीन लेते थे। लेकिन यहां तो दबंगी में कहा जाता था कि यह यूपीए सरकार नहीं है भैया! यह एनडीए है यहां इस्तीफे नहीं होते।
फिर क्या हुआ? •ोन-जेड ने बता दिया कि सत्य और अहिंसा की ताकत क्या होती है। इस नई पीढ़ी के लिए बहुत सारी बातें कही जा रही हैं। समय के अनुसार इसकी वैल्यू•ा नई हैं। लेकिन कुछ यूनिवर्सल ट्रूथ होते हैं। गांधी जी का सत्य, अहिंसा उनमें सबसे ऊपर है। भारत से दुनिया में जाकर सार्वभौमिक सिद्धांत बना। ज़ेन-जेड भी इस पर कायम रहा। गांधीजी की प्रासंगिकता जिसे यही लोग चैलेंज करते रहते थे फिर प्रतिपादित हुई। भारत के तीनों बड़े नायक जंतर मंतर पर लगातार छाए रहे।
गांधी, भगत सिंह और डा. आम्बेडकर। भाजपा संघ का कोई नायक वहां नहीं था। उल्टा मोदी को इन करीब 36-37 दिनों में वहां सबसे ज्यादा आलोचना का शिकार होना पड़ा। उनके सारे आवरण वहां उतर गए। कहां अपनी ही पार्टी में सबसे बड़ा कद होने की धारणा बनाने के लिए वाजपेयी, आडवानी और मुरली मनोहर जोशी का नाम लेना भी गुनाह बना दिया गया था। और बाहर तो सीधा नेहरू से मुकाबला किया जाता था।
मगर 12 साल की सारी मेहनत सवा महीने में धुल गई। सच के सामने। छात्रों का आन्दोलन सच के मुद्दे पर था। बहुत लंबे समय तक शिक्षा जिसमें पेपर लीक सीबीएसई की बारहवीं की परीक्षाएं ठीक से न करा पाने, बेरोजगारी जैसे छात्र और युवाओं के भविष्य से जुड़े जरूरी मुद्दे थे दबे रहे। मगर जैसा कि कहते हैं कि हर चीज का समय आता है तो वह आया।
ब्लेम सारा सुप्रीम कोर्ट की चीफ जस्टिस सूर्यकांत पर आया। फंस गए। उन्होंने तो जैसा सब बोल रहे थे बिना किसी जवाबदेही के ऐसे ही बोल दिया था। बेरोजगार युवाओं को काकरोच।
और युवा एवं छात्रों को बात लग गई। काकरोच जनता पार्टी बन गई। और दिल्ली के जंतर मंतर से जो आन्दोलन शुरू हुआ वह ऐसा फैला कि देश भर से होता हुआ विदेशों तक फैल गया। पहले तो किसान, मजदूर या नोटबंदी जीएसटी के समय छोटे व्यापारियों के विरोध पर जैसी गालियां उन्हें दिलवाईं गईं थी वैसी ही छात्रों को दिलवाई गईं।
मगर यह ज़ेन-जेड था। 25 साल से कम उम्र। सुबह के हवा के झोंके की तरह ताजगी से भरा हुआ। उस पर इन पुराने हरबों का कोई असर नहीं होता है। उसकी भाषा नई, विचार नए और साहस से भरपूर।
मोदी जी ने सोचा उनके प्लेटफार्म से जाकर बात करूं। दो दिन इंस्टाग्राम पर गए। मगर उल्टा मजाक बन गया। ज़ेन-जेड में तमाशे नहीं चलते। दिल के सच्चे हैं तो सच को फौरन पहचान लेते हैं। मोदी की हिम्पोक्रेसी मित्रों नफरत और विभाजन के नशे में डूबो दिए गए लोगों तक तो चल गई मगर डियर फ्रेन्ड्स छात्रों और युवाओं पर नहीं चला।
यहां तो हिन्दू-मुसलमान, जात-पात, स्त्री- पुरुष कोई भेद था ही नहीं। पूरे देश ने देखा कि लड़कियां यहां सबसे सहज और निर्भय दिखीं। तो यह नई पीढ़ी की नई दुनिया थी। मोदी जी के पुराने बांटो, डराओ के तरीकों का इन पर कोई असर नहीं हुआ। मोदी जी इस पीढ़ी को समझ ही नहीं पाए। लेकिन यह छात्र और नौजवान मोदीजी को अच्छी तरह समझ गए। उनका मजाक उड़ाने के अलावा उनके बारे में कुछ और सोचा ही नहीं।
दूसरी ओर राहुल की तरफ अपने आप खींचे चले गए। जंतर मंतर पर सबसे लंबी 23 दिन की भूख हड़ताल करने वाली जेएनयू की छात्रा नेहा बोरा अपने साथियों के साथ राहुल गांधी के यहां 10 जनपथ पहुंच गईं।
नेहा जंतर मंतर की सबसे बड़ी स्टार बन कर उभरी हैं। और कारण स्पष्ट है। वे विचारों के साथ आंदोलन कर रही थीं। शिक्षा व्यवस्था कैसी होनी चाहिए। 12 साल पहले तक कैसे स्टूडेंट फ्रेंडली थी और अब कैसे उसे निजी और आरएसएस के हाथ में सौंप दिया गया है? इस पर उनका गहन अध्ययन था। और उन्होंने 10 जनपथ पर राहुल के साथ प्रेस कान्फ्रेंस में कहा कि शिक्षा के बारे में हमारी सबसे अच्छी बातचीत राहुल जी के साथ हुई। मतलब राहुल की जो शिक्षा की समझ है वह आज की युवा पीढ़ी की तरह है। उससे मेल खाती है।
राहुल इस पूरे आंदोलन में छात्रों के साथ खड़े रहे। जबकि पेपर लीक और सीबीएसई की परीक्षा में गड़बड़ी के खिलाफ उनका आंदोलन पहले से चल रहा था। छात्रों की गूंज के नाम से वे 17 जून को कोटा में बड़ा छात्र सम्मेलन कर चुके थे।
उसके बाद देहरादून में भी। मगर 20 जुलाई को छात्रों के ऊपर बेरहम लाठी चार्ज, आंसू गैस और पैलेट गन के इस्तेमाल के बाद राहुल ने छात्रों के समर्थन में प्रधानमंत्री निवास जाकर धरना दे दिया। संसद में तो रोज आवाज गूंज ही रही थी। 30 जनवरी मार्ग गांधी स्मृति भी गए। बापू की जहां हत्या हुई थी। छात्रों को संबल देने की उस जगह जाकर प्रार्थना की। यहां भी पुलिस ने रोका।
प्रधानमंत्री निवास के बाहर से तो नेता प्रतिपक्ष को घसीटा ही गया था। उनकी नाक से खून आया था। मगर उसके अगले दिन ही प्रेस कान्फ्रेंस में कहा कि मुझ पर और चोट मार लें मगर सवाल छात्रों का है कि उन्हें क्यों मारा? रविवार को उन्होंने सीधे गृह मंत्री अमित शाह से पूछा छात्रों को मारने का आदेश किसने दिया?
काकरोच जनता पार्टी ने अपना आन्दोलन खत्म कर दिया मगर राहुल की लड़ाई लंबी है। जो लोग कहते थे कि राहुल जंतर मंतर पर क्यों नहीं जाते उसका जवाब यही है। राहुल अमित शाह और मोदी से सवाल कर रहे हैं। धर्मेंन्द्र प्रधान के इस्तीफे के बाद शनिवार को उन्होंने कहा कि वह तो होना ही था।
मगर सवाल पूरी शिक्षा व्यवस्था का है। उसमें घुसकर आरएसएस ने उसे दीमक की तरह खोखला कर दिया है। देश की बिगड़ती आर्थिक स्थिति का भी सवाल है। अमेरिका के सामने सरेंडर करने का भी।
छात्रों के दायरे से फिलहाल यह चीजें बाहर की थीं। इसलिए राहुल ने बिना वहां जाए छात्रों का पूरा समर्थन और सहयोग किया। कांग्रेस के लोग तो वहां रोज पहुंचते थे खाना-पीना दवाइयां लेकर।
राहुल गांधी कहते हैं देश को अगर बचाना है तो मोदी को हटाना है। उनकी इस लड़ाई में छात्र युवा बड़ी संख्या में पहले से शामिल हैं। और जो बाकी थे वे भी अब समझ गए हैं कि धर्मेंन्द्र प्रधान का इस्तीफा ठीक है। मगर अब देश को बचाने का सवाल है और उसके लिए भविष्य को सामने आना पड़ेगा। और अतीत को जाना पड़ेगा।
राहुल ने खुद ही इसे डि कोड भी किया है। भविष्य मतलब युवा और अतीत मतलब मोदी और आरएसएस। साथ ही यह भी कह दिया कि अतीत कभी भविष्य से जीत नहीं सकता।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार है)


