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जबर्दस्त का ठेंगा, जबर मारे रोबन न दे!

सच्चाई और पानी की खासियत एक जैसी मानी गयी है। उन्हें दबाने की जितनी कोशिश की जाती है, वे उतने ही वेग से निकल कर सामने आते हैं

जबर्दस्त का ठेंगा, जबर मारे रोबन न दे!
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भारतीय शासन का खासतौर पर पड़ोसी देशों के प्रति, जिनमें पाकिस्तान भी शामिल है, जो व्यवहार है उसे देखते हुए, खुद भारत का भी 'अंदरूनी मामलों' की दलील देने का कोई नैतिक अधिकार नहीं बनता है। इसके अलावा, इससे कैसे इंकार किया जा सकता है कि मानवता ने अब तक जो सार्वभौम मानव अधिकार स्वीकार किए हैं, जिसका एक रूप संयुक्त राष्ट्र संघ की मानवाधिकार घोषणाएं हैं और जो सर्वस्वीकृत मानव मूल्य हैं।

सच्चाई और पानी की खासियत एक जैसी मानी गयी है। उन्हें दबाने की जितनी कोशिश की जाती है, वे उतने ही वेग से निकल कर सामने आते हैं। कुछ ऐसा ही किस्सा मोदीशाही के भारत में अल्पसंख्यकों और खासतौर पर मुसलमानों के खिलाफ बढ़ते भेदभाव, अन्याय और अत्याचारों का और इनमें शासन की बढ़ती हिस्सेदारी का है। और यह सिलसिला अगर डबल इंजन सरकारों के रूप में, कानून-व्यवस्था पर मोदीशाही के प्रत्यक्ष नियंत्रण का दायरा लगातार बढ़ने के साथ, मस्जिदों-मजारों पर हमलों तक नहीं पहुंच रहा होता, तो ही आश्चर्य की बात होती। और अब जबकि यह सिलसिला तेजी पकड़ रहा है, इस सच्चाई को दबाने की सारी कोशिशों के बावजूद, न सिर्फ इस अन्याय का सच सामने आ रहा है बल्कि प्रसंगवश यह सच भी सामने आ रहा है कि मोदीशाही में मुख्यधारा की राजनीति में, जिसमें सत्तापक्ष ही नहीं विपक्ष भी शामिल है, अल्पसंख्यकों और खासतौर पर मुसलमानों की चिंताओं के लिए, कितनी कम जगह बची है।

वैसे तो ताजा संदर्भ बंगाल की फतेह से बढ़े हुए जोश के साथ, मुस्लिम मिरर की रिपोर्ट के अनुसार छ: भाजपा-शासित राज्यों में पिछले करीब डेढ़ महीने में 23 से ज्यादा मस्जिदों, मदरसों, ईदगाहों तथा दरगाहों के ध्वस्त किए जाने का है। फिर भी इस क्रम में प्रधानमंत्री मोदी के चुनाव क्षेत्र, वाराणसी की गंज शहीदां मस्जिद के प्रकरण ने, अपने प्रकट अन्याय के लिए खासतौर पर देश में ही नहीं, देश के बाहर भी लोगों का ध्यान खींचा है। स्थानीय लोगों की मान्यता के अनुसार, इस मस्जिद के एक हजार वर्ष पुरानी होने को बहुत गंभीरता से नहीं भी लिया जाए तब भी, मस्जिद की इंतजामिया कमेटी के इसके दावों को अनदेखा नहीं किया जा सकता है कि 1883-84 के बंदोबस्ती नक्शों में और उससे पहले के राजस्व रिकार्डों में, इस जगह पर मस्जिद की मौजूदगी दर्ज है। संक्षेप में यह कि जिस काशी रेलवे स्टेशन के निकट स्थित होने के आधार पर, स्टेशन के पुनर्विकास तथा विस्तार के लिए, इस मस्जिद की जमीन की जरूरत का दावा किया जा रहा है और मस्जिद को रेलवे की जमीन पर काबिज बताया जा रहा है, मस्जिद उससे पुरानी ही ठहरेगी।

इसके बावजूद, जैसा कि अब भाजपा-शासित राज्यों में नियम ही हो गया है, इस मामले में रेलवे अधिकारियों द्वारा 17 जून को नोटिस चस्पां कर, 20 जून तक यानी तीन दिन में मस्जिद को हटाने का आदेश दे दिया। दिलचस्प है कि रेल प्रशासन के उसी नोटिस में यह दलील दी गयी है कि इस संबंध में मस्जिद इंतजामिया कमेटी का दावा स्थानीय सिविल अदालत में, अगस्त 2024 में खारिज कर दिया गया था। दो साल पहले के फैसले को रेलवे प्रशासन तीन दिन के नोटिस पर लागू कराने के लिए उतावला था! इससे पहले, वाराणसी में ही इसी रेलवे स्टेशन के परिसर में स्थित, अज़गैब शहीद मस्जिद को भारी पुलिस बल तैनात कर, 2 जून की रात को बुलडोजरों से ध्वस्त कर दिया गया। स्थानीय लोगों के अनुसार यह मस्जिद भी दो सौ साल पुरानी थी, जिसकी काफी धार्मिक मान्यता थी। याद रहे कि योगी राज में उत्तर प्रदेश, मस्जिदों तथा अन्य मुस्लिम धार्मिक स्थलों पर बुलडोजर चलवाने के मामले में भाजपा-शासित राज्यों में भी सबसे आगे रहा है। इन 45 दिनों में ही उत्तर प्रदेश में अकेले संभल में एक मस्जिद, एक ईदगाह तथा एक दरगाह को और इटावा में एक मजार, सैयद शाहबाबा दरगाह को ध्वस्त किया जा चुका था।

इस पृष्ठïभूमि में गंज शहीदां मस्जिद के ढहाए जाने के नोटिस पर व्यापक और तीखी प्रतिक्रिया होना स्वाभाविक था। यहां तक कि यह खबर पाकिस्तान तक पहुंची और स्वाभाविक रूप से पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने इसे भारत में मुस्लिम अल्पसंख्यकों के साथ ज्यादती का उदाहरण बनाते हुए, एक सार्वजनिक बयान जारी कर दिया। बयान में पाकिस्तान के राष्ट्रपति ने न सिर्फ ऐतिहासिक मुस्लिम स्थलों के खिलाफ ऐसी कार्रवाइयां रोके जाने और अल्पसंख्यकों के अधिकारों तथा साझा सांस्कृतिक विरासत की रक्षा करने की मांग की बल्कि यह चेतावनी भी कि मौजूदा रास्ता बिखराव तथा चिर अशांति की ओर ले जाएगा।

हैरानी की बात नहीं है कि भारत सरकार की ओर से अपनी तीखी प्रतिक्रिया में विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने पाकिस्तान को अपने गरेबां में झांकने की नसीहत दे डाली। किसी से छुपा हुआ नहीं है कि अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा के मामले में अपने खराब रिकार्ड को देखते हुए, पाकिस्तान को किसी दूसरे देश को अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा करने का उपदेश देने का नैतिक अधिकार तो नहीं ही है। और उसके अपने ऐसे रिकार्ड को इसके बावजूद माफ नहीं किया जा सकता है कि वह एक इस्लामी राज्य है, न कि भारत की तरह एक धर्मनिरपेक्ष राज्य। लेकिन, भारतीय विदेश मंत्रालय की प्रतिक्रिया अल्पसंख्यकों के अधिकार के प्रश्न पर बोलने के पाकिस्तान के नैतिक अधिकार पर सवाल उठाने पर ही रुक नहीं गयी। उसमें न सिर्फ जरदारी की टिप्पणियों को दो-टूक तरीके से खारिज किया गया बल्कि यह दलील भी दी गयी कि 'ये भारत के अंदरूनी मामले हैं, जिन पर बोलने का उनको कोई अधिकार नहीं है।'

जाहिर है कि भारत-पाकिस्तान के रिश्तों के संदर्भ में हमारे 'अंदरूनी मामले' की यह दलील सामान्य से ज्यादा आक्रामक हो जाती है। लेकिन, एक यही मामला नहीं है जिसमें हमें 'अंदरूनी मामलों' की यह दलील सुनाई दे रही है। बात इससे उलट है। अल्पसंख्यकों के अधिकारों के संबंध में मोदी राज की हरेक अंतरराष्ट्रीय आलोचना को ठीक इसी दलील से खारिज किया जाता रहा है। यहां तक कि अमेरिका के साथ मातहती के अपने सारे रिश्तों के बावजूद, मोदी राज की 'अंदरूनी मामलों' की इस झाडू ने कभी भी अमेरिकी अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग (यूएससीआईआरएफ) तक की आलोचनाओं को नहीं बख्शा है। 'अंदरूनी मामलों' की इस दुहाई को मोदी राज में तमाम अंतरराष्ट्रीय संगठनों तथा अध्ययनों को नकारे जाने की बेतुकी हद तक पहुंचा दिया गया है।

लेकिन, यहां एक विडंबना की ओर ध्यान खींचे बिना नहीं रहा जा सकता है। ऐसा लगता है कि मोदी राज की नजरों में,'अंदरूनी मामलों' के लिए यह सुरक्षा, भारत का ही विशेष अधिकार है। दूसरे देशों और खासतौर पर पड़ोसी देशों के ऐसे ही 'अंदरूनी मामलों' में आए दिन टिप्पणी करना, यही सरकार अपना विशेषाधिकार ही नहीं बल्कि कर्तव्य भी समझती है। यह सिर्फ पाकिस्तान तथा बांग्लादेश में (अफगानिस्तान के साथ अब रिश्ते सुधारे जा रहे हैं इसलिए वह अब इससे बाहर है) अल्पसंख्यकों के अधिकारों के सवाल उठाने तक ही सीमित नहीं है बल्कि नेपाल, भूटान आदि अन्य पड़ोसी देशों की अन्य अंदरूनी नीतियों में दादागीरी के अंदाज में दखलंदाजी की कोशिशों तक जाता है, जिसके चक्कर में ही मोदी राज में अधिकांश पड़ोसी देशों से भारत के रिश्ते ठंडे से ठंडे होते गए हैं।

फिर भी बात सिर्फ इतनी नहीं है कि वर्तमान भारतीय शासन का खासतौर पर पड़ोसी देशों के प्रति, जिनमें पाकिस्तान भी शामिल है, जो व्यवहार है उसे देखते हुए, खुद भारत का भी 'अंदरूनी मामलों' की दलील देने का कोई नैतिक अधिकार नहीं बनता है। इसके अलावा, इससे कैसे इंकार किया जा सकता है कि मानवता ने अब तक जो सार्वभौम मानव अधिकार स्वीकार किए हैं, जिसका एक रूप संयुक्त राष्ट्र संघ की मानवाधिकार घोषणाएं हैं और जो सर्वस्वीकृत मानव मूल्य हैं, उनके हिसाब से समाजों तथा देशों की जांच-परख और उससे निकली आलोचनाओं को, समुदायों और देशों की सीमाओं में बंद नहीं किया जा सकता है। इस विमर्श को ऐसी तंग सीमाओं में बंद करना तो मानवता के विकास के ही रास्ते बंद करना होगा। बेशक, राष्टï्रों तथा समुदायों की संप्रभुता का सम्मान किया जाना भी जरूरी है, लेकिन इसके नाम पर सार्वभौम मानव अधिकारों तथा मूल्यों की अविभाज्यता की ओर से नजरें नहीं फेरी जा सकती हैं।

इस लिहाज से देखें तो धर्मनिरपेक्षता के हमारे अमल की पाकिस्तान की या बांग्लादेश की भी आलोचनाओं को सिर्फ इस आधार पर हमारा खारिज करना उचित नहीं होगा कि वे एक धार्मिक राज्य से आती हंै और अल्पसंख्यकों के अधिकारों के मामले में उनका अपना रिकार्ड उदाहरणीय नहीं है। आलोचनाओं को इस तरह नकारना आसान तो है, लेकिन उससे सच्चाई तो बदल नहीं जाएगी। इसके विपरीत, अगर हम अपने धर्मनिरपेक्षता तथा जनतंत्र के दावों को सच होते देखने के प्रति गंभीर हैं, तो हमारे अपने हित में है कि हरेक आलोचना को टटोलकर देखें, उसमें कहीं सच्चाई का कोई अंश तो नहीं है। जरदारी के बयान का हमारा खंडन मौजूदा निजाम के रुख का शास्त्रीय उदाहरण है। बयान का खंडन तो कर दिया, पर उसमें जिस हजार साल पुरानी मस्जिद के ध्वस्त किए जाने के खतरे का जिक्र है, क्या विदेश मंत्रालय का बयान उसका भी खंडन करता है या कर सकता है? खंडन जरदारी के बयान का है, अल्पसंख्यकों के साथ ज्यादती की सच्चाई का नहीं।

इस ज्यादती की सच्चाई का एक और महत्वपूर्ण पहलू है, जो इसी विवाद के क्रम में सामने आया है। एक प्रतिष्ठिïत दैनिक ने इसी संबंध में तीन मुस्लिम सांसदों की टिप्पणियों का जिक्र किया है, जो इस अर्थ में बहुत ही विंडबनापूर्ण हैं कि उनमें इतना भर कहने के लिए कि 'प्रशासन को ऐतिहासिक तथा विरासती निर्माणों के भेदभावपूर्ण ध्वस्तीकरण से बाज आना चाहिए क्योंकि उससे धार्मिक व सांस्कृतिक अधिकारों का उल्लंघन होता है', साथ में यह जोड़ना जरूरी समझा गया है कि इससे हमारे बाहरी विरोधियों को भारत के अंदरूनी मामलों में बोलने का मौका मिलता है! वास्तव में तीनों मुस्लिम सांसदों को यह कहना बहुत जरूरी लगा है कि, 'दूसरे देशों को या शासनाध्यक्षों को भारत के अंदरूनी मामलों पर टिप्पणी करने कोई अधिकार नहीं है।' उन्होंने यह भी कहा कि उत्तर प्रदेश में अल्पसंख्यक समुदाय को पाकिस्तान के नेता से सीखने की जरूरत नहीं है। इन सांसदों ने न सिर्फ यह मुद्दा उठाने के लिए जरदारी की बाकायदा निंदा की बल्कि रिपोर्ट से पता चलता है कि कम से कम एक सांसद ने आगे बढ़कर उत्तर प्रदेश में एक प्रकार से 'सब चंगा सी' का सार्टिफिकेट देना भी जरूरी समझा!

सीधे-सरल शब्दों में कहें तो यह अन्याय के उस मुकाम पर पहुंच जाने का मामला है, जहां अन्याय के विरोध की आवाजें तक घुटकर रह जाती हैं। यह और भी दुर्भाग्यपूर्ण होगा कि ऐसेे अन्याय के खिलाफ विरोध की आवाजें, संबंधित अल्पसंख्यक समुदाय तक ही सीमित होकर रह जाएं। इसे देखते हुए यह तसल्ली देने वाली बात है कि राजस्थान में, जहां केंद्रीय गृहमंत्री के हाल के दौरे के बाद, पाकिस्तान से लगते हुए सीमावर्ती इलाकों में मुस्लिम धार्मिक स्थलों के ध्वस्तीकरण की इकतरफा मुहिम छेड़ी गयी है, राज्य के पूर्व-मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने, न केवल इस ध्वस्तीकरण का खुलकर विरोध किया है बल्कि इसे सीमावर्ती क्षेत्र की साझा धार्मिक परंपराओं व संस्कृति पर और हिंदू-मुस्लिम एकता पर हमला करार दिया है। याद रहे कि साझा धार्मिक परंपराएं व संस्कृति ही सबसे बढ़कर मौजूदा विभाजनकारी संघ-भाजपा निजाम के निशाने पर हैं।

(लेखक साप्ताहिक पत्रिका लोक लहर के संपादक हैं।)


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