बारिश में सब्जी-बाड़ी की अच्छी परंपरा
एक समय हमारे गांव में बाड़ियों में घरों के पीछे कई तरह की हरी सब्जियां और मौसमी फल और मोटे अनाज लगाए जाते थे

एक समय हमारे गांव में बाड़ियों में घरों के पीछे कई तरह की हरी सब्जियां और मौसमी फल और मोटे अनाज लगाए जाते थे। जैसे भटा, टमाटर, हरी मिर्च, अदरक, भिंडी, सेमी (बल्लर), मक्का, ज्वार आदि होते थे। मुनगा, नींबू, बेर, अमरूद आदि बच्चों के पोषण के स्रोत होते थे। इसमें न अलग से पानी देने की जरूरत थी और न ही खाद। जो पानी रोजाना इस्तेमाल होता था उससे ही बाड़ी की सब्जियों की सिंचाई हो जाती थी। इसमें अदरक, हल्दी जैसे औषधीय पौधे भी होते थे।
बारिश का मौसम आ गया है। खेती-बाड़ी की तैयारी चल रही है। मिट्टी की सौंधी खुशबू आ रही है। सूखे पेड़ों में हरे पत्ते आने लगे हैं। धरती पर हरी चादर फैलने लगी है। सूखी नदियों में पानी बढ़ गया है। ऐसे समय मुझे याद आ रही है, बारिश के मौसम में लगने वाली सब्जियों की, जिससे ताजी हरी घर की सब्जियां मिलती हैं। हालांकि सब्जी बाड़ी की परंपरा कुछ कमजोर हुई है, पर अब भी देश के कई कोनों में यह परंपरा कायम है। आज के कॉलम में इसी पर बात करना चाहूंगा, जिससे हम हमारी पुरानी अच्छी परंपराओं को समझ सकें, कायम रख सकें।
मुझे याद आ रही है मेरे गांव की, जहां लोग इस मौसम में घरों की मरम्मत करते थे, जिससे बारिश का पानी घर के अंदर न आए। रास्तों की मरम्मत करते थे, जिससे आने-जाने में असुविधा न हो। ईंधन के लिए लकड़ियों का इंतजाम कर लिया जाता था। मवेशियों के लिए भूसा, चारा का इंतजाम कर लिया जाता था।
इसी प्रकार, बारिश के पहले बाड़ियों में देसी सब्जियां उगाई जाती थीं। हर साल सब्जियों के बीज बचाकर रख लिए जाते थे, और बारिश आते ही उन्हें बाड़ियों में बोया जाता था। कुछ ही दिनों में हरी सब्जियां आने लगती थीं। घरों की छतों पर, बागुड़ में सब्जियों की बेल फैल जाती थीं। फल आने लगते थे। उनके वजन के भार से बागुड़ भी टेढ़ी-मेढ़ी हो जाती थीं।
एक समय हमारे गांव में बाड़ियों में घरों के पीछे कई तरह की हरी सब्जियां और मौसमी फल और मोटे अनाज लगाए जाते थे। जैसे भटा, टमाटर, हरी मिर्च, अदरक, भिंडी, सेमी (बल्लर), मक्का, ज्वार आदि होते थे। मुनगा, नींबू, बेर, अमरूद आदि बच्चों के पोषण के स्रोत होते थे। इसमें न अलग से पानी देने की जरूरत थी और न ही खाद। जो पानी रोजाना इस्तेमाल होता था उससे ही बाड़ी की सब्जियों की सिंचाई हो जाती थी। इसमें अदरक, हल्दी जैसे औषधीय पौधे भी होते थे।
देशी बीजों को बचाने में लगे नरेश विश्वास तो बीजों की रिश्तेदारी नामक एक कार्यक्रम ही चला रहे हैं। इसका अर्थ है कि देसी बीजों को बचाना, और एक दूसरे को आदान-प्रदान करना। साथ ही इन अनाजों व सब्जियों से अलग अलग व्यंजन बनाना और उनकी प्रदर्शनी लगाना है, जिससे इस परंपरा को बढ़ावा मिले। और फिर से चलन में आए।
नरेश विश्वास मंडला- डिंडौरी के बैगाचक के बैगा व पातालकोट के भारिया आदिवासियों के बीच जो देसी बीज लुप्त हो चुके थे, उन्हें खोजकर आदिवासियों को उपलब्ध कराते हैं। इसके तहत कई तरह के देसी सब्जियों की बीज शामिल है। बाड़ियों में सब्जियों के साथ देसी अनाज भी लगाते हैं। सिकिया ऐसा ही अनाज था, जिसे लोग भूल चुके थे। मंडला में फिर से लोग इसे बोने लगे हैं। इसी प्रकार, बाजरा, जिसे चिड़िया बहुत खाती हैं, लेकिन उनके पास ऐसी देसी किस्म है जिसमें रोएं होते हैं, जिससे चिड़िया नहीं खा पाती। जिससे फसल का नुकसान नहीं होता है।
बिलासपुर जिले में जनस्वास्थ्य सहयोग नामक संस्था ने भी सब्जी बाड़ी को काफी बढ़ावा दिया है। संस्था द्वारा छोटे बच्चों के लिए फुलवारी ( झूलाघर) संचालित की जाती है। उसमें बच्चों को ताजा, गरम, पतला खाना दिया जाता है।
इन फुलवारियों में सब्जी बाड़ी हैं, जिससे बच्चों को हरी सब्जियों भी मिलती हैं। फुलवारी में सब्जी बाड़ी में पालक, मैथी, लाल भाजी, धनिया पत्ती लगाई है। इन हरी भाजियों की पत्तियों को दाल-चावल की खिचड़ी में डालकर पकाया जाता है और बच्चों को खिलाया जाता है। इसे पोषण आहार में शामिल किया जाता है। सब्जी बाड़ी में अलग से पानी की जरूरत नहीं होती। फुलवारी में बच्चों को जो हाथ धुलाने के लिए पानी इस्तेमाल होता है, उसी से सब्जी बाड़ी की सब्जियों की सिंचाई हो जाती है। यह संस्था जेवनार मेले आयोजित करती है,जिसमें महिलाएं देसी व्यंजनों के तौर-तरीके बताती हैं।
छत्तीसगढ़ के गांवों, कस्बों से लेकर शहरों के आसपास भी सब्जी बाड़ी देखने को मिलती है। सब्जी बाजार में भी महिलाएं सब्जियों बेचती हैं। फुटपाथ पर हरी ताजी सब्जियों की ढेरियों के साथ सजी दुकानें देखते ही बनती हैं।
हरी पत्तीदार सब्जियों की खान है छत्तीसगढ़, यहां सबसे ज्यादा विविधता पाई जाती है। इस जैव विविधता के साथ संस्कृति जुड़ी है। कई सब्जियों पर आधारित लोकगीत गाए जाते हैं। इससे जुड़ी कई कहानियां भी हैं। यानी जैव विविधता के साथ संस्कृति व परंपरागत ज्ञान का सीधा जुड़ाव है।
दक्षिण भारत के राज्यों में जैविक खेती व जैविक सब्जियों का चलन काफी है। मैंने इस पर तमिलनाडु, केरल, तेलंगाना जैसे राज्यों में कई किसानों से बात की है और उनके खेतों व बाड़ियों को देखा है।
कर्नाटक के उत्तर कन्नड़ जिले में वनस्री संस्था ने देसी बीजों की सब्जियों को काफी बढ़ावा दिया है। वनस्री की शुरूआत 2001 में हुई। सुनीता राव ने इसकी पहल की थी, जो अपनी पढ़ाई के दौरान ही जापान के मशहूर कृषि वैज्ञानिक मोसानोबू फुकूओका से मिली थीं और प्रभावित हुई थीं। तब वह पांडिचेरी में पढ़ रही थीं, उस दौरान फु कूओका वहां आए थे। फुकूओका ने खुद जापान में उनके खेत में प्राकृतिक खेती के प्रयोग किए थे, जो बाद में दुनिया भर में चर्चित हुए।
वनस्री से जुड़कर महिला किसान जंगल घरेलू कृषि बागवानी का अनूठा काम कर रही हैं। इससे खाद्य, चारा, ईंधन, रेशा, औषधियां मिलती हैं। यह बेहतर स्वास्थ्य के साथ टिकाऊ जीवनशैली का आधार है। प्रकृति से जुड़ने का एक माध्यम भी है।
सुनीता राव बताती हैं कि 'इसकी शुरूआत अनौपचारिक रूप से हुई। जब भी हम किसी के घर जाते थे तब वे सबसे पहले उनका सब्जी का बगीचा दिखाते थे, बाद में घर के अंदर ले जाते थे। उनके लिए सब्जी का बगीचा बहुत महत्वपूर्ण होता था। यह बगीचा घर के बाहर छोटे हिस्से में होता है। एक एकड़ से कम या ज्यादा भूमि के टुकड़े में हो सकता है। जिसमें मिश्रित फसलें होती हैं। विविध तरह की सब्जियां, फल-फूल, जंगली कंद-मूल व औषधिपूर्ण पौधे होते हैं।'
वे आगे बताती हैं कि 'ये महिलाएं पूरी तरह आत्मनिर्भर व स्वावलंबी हैं। वे अपने बगीचे में सब्जियां व फल उगाती हैं। फसल कटाई के बाद बीजों को चुनती हैं, उन्हें संभालती हैं, और उनका आदान-प्रदान करती हैं। परंपरागत बीजों की धरोहर व उससे जुड़े पारंपरिक ज्ञान को सहेजती हैं।
कुल मिलाकर, सब्जी बाड़ी की परंपरा कई मायनों में महत्वपूर्ण है। इससे हरी ताजी सब्जियां मिलती हैं। जहरमुक्त और घर की ताजी सब्जियां भोजन में शामिल होती हैं। घर की जैविक खाद का अच्छा इस्तेमाल होता है। घर में काम करने से थोड़ी शारीरिक श्रम भी होता है, जो स्वास्थ्य के लिए जरूरी है। इन देसी बीजों के साथ पारंपरिक ज्ञान का संरक्षण भी होता है। सब्जियों में खर्च होने वाली राशि की बचत भी होती है। यानी यह बहुत ही उपयोगी और अच्छी परंपरा है, जिसका अनुकरण जरूरी है। क्या हम इस दिशा में आगे बढ़ना चाहेंगे?


