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खेती और बैल के अटूट रिश्ते का त्योहार

पोला त्योहार में बैलों की पूजा की जाती है। उन्हें नहलाया-धुलाया जाता है। उन्हें सजाया जाता है।

खेती और बैल के अटूट रिश्ते का त्योहार
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  • बाबा मायाराम

बैलों की जुताई के साथ पशुओं की गोबर खाद खेतों को मिलती थी। स्वस्थ खेती के लिए फसलों और पशुओं का एक साथ होना अत्यंत जरूरी है। यह एक चक्र है जिसमें पशुओं के माध्यम से जमीन को उसका पोषण गोबर खाद के रूप में मिलता है। एक दूसरे के पूरक होने का यह एक अच्छा उदाहरण है। मवेशियों के प्रति किसानों का प्रेम बहुत गहरा हुआ करता था। कुछ समय पहले तक गाय-बैल को नहलाने-धुलाने से लेकर चराने, पानी पिलाने का हर काम जिम्मेदारी से किया जाता था।

हाल ही में पोला त्योहार मनाया गया। यह पशुपालन से जुड़ा है, इसमें किसान बैलों के प्रति आभार प्रकट करते हैं। इस दिन खेतों में बैलों से किसी भी प्रकार का काम नहीं लिया जाता। आज खेती से जुड़े इस त्योहार के बहाने हम पारंपरिक खेती को याद करना चाहेंगे, जिसमें खेती, पशुपालन और किसान एक दूसरे से जुड़े थे।

पोला त्योहार में बैलों की पूजा की जाती है। उन्हें नहलाया-धुलाया जाता है। उन्हें सजाया जाता है। रंग-बिरंगे फीते बांधे जाते हैं। उनके सींगों को रंगा जाता है। उन्हें बांधने के लिए नई रस्सी का इस्तेमाल होता है। इस मौके पर लकड़ी के बैल, मिट्टी के बैल बनाए जाते हैं। घर में पारंपरिक पकवान व व्यंजन बनते हैं। गेंहू के आटे से खुरमा, बेसन से ठेठरी जैसे व्यंजन बनाए जाते हैं। घरों में तोरण से दरवाजे सजाए जाते हैं। रंगोली बनाई जाती है। मध्यप्रदेश में बच्चे लकड़ी के बैल से खेलते हैं। उन्हें स्थानीय भाषा में घुल्ला कहते हैं।

आम तौर पर गाय-बैल और मनुष्य के आपसी स्नेह और प्यार की कई कहानियां अब भी प्रचलन में हैं। उनके प्रति गहरी संवेदनशीलता भी देखने में आती थी। उन्हें बड़े लाड़-प्यार से पाला पोसा जाता बैलों के प्रति विशेष प्रेम तब दिखाई देता है जब उन्हें दीपावली के समय रंग-बिरंगी फीते, गेंठा, मुछेड़ी, नाथ और पट्टों से सजाया जाता है। अक्ति त्योहार भी खेती से जुड़ा है।

लेकिन अब इनकी संख्या बहुत कम हो गई है या नहीं के बराबर है। अब जो डेयरी उद्योग के रूप में पशुपालन हो रहा है, वह बहुत महंगा और पूंजी प्रधान है। पशुधन कम होने का एक कारण मवेशियों के लिए चारे और भूसा की कमी है। गांव में पहले चरोखर की जमीन, नदी-नालों व गांव के आसपास की जमीन पर पशु चरा करते थे। अब यह जमीनें कई कारणों से उपलब्ध नहीं हैं।

जबकि पशुपालन के बिना खेती अधूरी है। जब से खेतों में पशुओं को हटाकर एकल फसलों को बढ़ावा दिया जा रहा है, तब से खेती की मूल आत्मा खो सी गई लगती है। उसमें एक ठहराव आ गया है, खेती, जो एक जीवन पद्धति थी, एक व्यवसाय जैसी बन गई है।

पहले खेती में बैलों का काफी महत्व माना जाता था। उनकी जतन से परवरिश की जाती थी। मुझे याद है हमारे घर में भी गाय-बैल थी। पिताजी का ज्यादातर समय उन्हें हरा चारा काटने, उन्हें खिलाने-पिलाने और उनकी देखभाल करने में लगता था। जब भी कहीं जाते थे, उनकी देखभाल के लिए वैकल्पिक व्यवस्था की जाती थी। अगर मेले में बैलगाड़ी से जाते थे, तो बैलों के लिए घास भी रखी जाती थी। उन्हें परिवार के सदस्यों की तरह लाड़ प्यार मिलता था।

बैलों की जुताई के साथ पशुओं की गोबर खाद खेतों को मिलती थी। स्वस्थ खेती के लिए फसलों और पशुओं का एक साथ होना अत्यंत जरूरी है। यह एक चक्र है जिसमें पशुओं के माध्यम से जमीन को उसका पोषण गोबर खाद के रूप में मिलता है। एक दूसरे के पूरक होने का यह एक अच्छा उदाहरण है। मवेशियों के प्रति किसानों का प्रेम बहुत गहरा हुआ करता था।

कुछ समय पहले तक गाय-बैल को नहलाने-धुलाने से लेकर चराने, पानी पिलाने का हर काम जिम्मेदारी से किया जाता था। खासकर महिलाएं और बच्चे मवेशियों की देखभाल में मदद करते थे। महिलाएं मवेशियों को बांधने के कोठा या सार की साफ-सफाई, भूसा-चारा डालने आदि का काम करती थीं। जबकि बच्चे उन्हें घास या भूसा डालने से लेकर पानी पिलाने का काम करते थे। अब भी असिंचित, जंगलपट्टी व मिश्रित खेती वाले क्षेत्रों में पशुपालन होता है। वहां आज भी बैलों से जुताई की जाती है। अब पशुओं की देखभाल नहीं की जा रही है, उन्हें छोड़ दिया गया है।

खेती और पशुपालन एक दूसरे के पूरक हैं। इसका उदाहरण राजस्थान से आने वाले घुमंतू पशुपालकों की भेड़-बकरियों, ऊंटों को किसान अपने खेतों में चरने की इजाजत देते हैं जिससे खेत उर्वर बने और उनका पेट भी भरे। यही घुमंतू पशुपालक पशुओं की अच्छी नस्ल उपलब्ध कराने में विशेष भूमिका निभाते थे।

पहले हम देखते थे कि, गांव में सभी घरों के मवेशियों को चराने के लिए एक व्यक्ति को नियुक्त कर दिया जाता था। एक साथ जो पशु चरने जाते थे उसे नार कहते थे। बदले में उस व्यक्ति को हर घर से अनाज मिलता था, जो मवेशी चराता था। हल-बैल की जगह ट्रैक्टर की जुताई से मिट्टी भी सख्त (भट्टल) हो रही है। इससे उत्पादन भी प्रभावित होता है।

लेकिन अब रासायनिक खेती से सबसे बड़ा नुकसान पारंपरिक पशुपालन का हुआ है। पशुओं की संख्या घट गई है। अब पशु सड़कों पर घूम रहे हैं, अधिकांश किसान अब ट्रेक्टर, हारवेस्टर व यंत्रीकरण की ओर बढ़ गए हैं। पशुपालन पीछे छूट गया है।

महाराष्ट्र के एक किसान ने मुझे बताया था कि पोला त्योहार पर बैलों को रंगने के लिए कृत्रिम रंगों का इस्तेमाल किया जाता है। इसी प्रकार, रंगोली भी कृत्रिम रंगों से बनाई जाती है, जो कि हानिकारक है। स्वास्थ्य व पर्यावरण के लिए इसके नुकसान हैं। इसके बदले उन्होंने बैलों को रंगने और सजावट में गेरू मिट्टी का इस्तेमाल किया है। रंगोली में रंग-बिरंगे फूल व पत्तों से बनाई है।

इसी प्रकार, पारंपरिक खेती, जहां सिंचाई नहीं है, वहां तो अब भी बैलों से जुताई होती है। मध्यप्रदेश व छत्तीसगढ़ में भी बैलों की खेती होती है। इसके साथ, अब सरकार व गैर सरकारी संस्थाएं भी बैलों की खेती को प्रोत्साहित कर रही हैं। राजस्थान जैसे राज्य में बैलों के लिए विशेष योजनाएं देखने में आईं हैं।

हमारी ग्रामीण अर्थव्यवस्था केवल खेती-किसानी से ही नहीं, पशुपालन और छोटे-छोटे लघु-कुटीर उद्योग व लघु व्यवसायों से संचालित होती रही है। मवेशी एक तरह से लोगों के फिक्स्ड डिपॉजिट हुआ करते थे, जिन्हें बहुत जरूरत पड़ने पर वे बेच देते थे।

कुल मिलाकर, खेती और पशुपालन का रिश्ता आज टूट रहा है। लेकिन अगर इसको बरकरार रखा जाए तो न केवल हमें भूमि को उर्वर बनाने के लिए गोबर खाद मिलेगी, बल्कि बड़ी आबादी को रोजगार भी मिलेगा। पोला, अक्ति, दीपावली जैसे त्योहार खेती की उस परंपरा की याद दिलाते हैं, जिसमें सब कुछ साझा था, हम एक-दूसरे की सहायता से आगे बढ़ रहे थे। हमारी खेती में जीव-जगत के पालन का विचार था। वह जीवन पद्धति थी। क्या हम इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए तैयार हैं?


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