तमाशों का देश, देश का तमाशा
देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी प्रचारपसंद, परिधानपसंद, प्रशस्तिपसंद इंसान तो हैं ही, वे तमाशापसंद नेता भी हैं

- सर्वमित्रा सुरजन
पहले गणतंत्र दिवस पर संविधान की बात होती थी। संविधान निर्माताओं के जज्बे और भावनाओं को लोगों तक पहुंचाया जाता था। बच्चों को संविधान का महत्व बताकर उन्हें भावी नागरिक बनने के लिए तैयार किया जाता था। लेकिन अब गणतंत्र दिवस भी मोदी सरकार की राजनीति की भेंट चढ़ गया। इस बार के गणतंत्र दिवस पर राहुल गांधी से जुड़े सवाल ही चर्चा में छाए रहे।
देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी प्रचारपसंद, परिधानपसंद, प्रशस्तिपसंद इंसान तो हैं ही, वे तमाशापसंद नेता भी हैं। गौर कीजिए पिछले 12 सालों में कितनी बार, कितने नए-नए तरीकों के तमाशे उन्होंने दिखाए हैं या उनके कारण देश का तमाशा बना है। कभी मोदी साफ समुद्री किनारे पर कचरा उठाकर सफाई का तमाशा दिखाते हैं। कभी अंतरिक्ष अभियान सफल होने पर छोटा सा तिरंगा हाथ में पकड़कर कैमरे के सामने लहराते हैं और देशभक्ति का तमाशा दिखाते हैं। दो हफ्ते पहले जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज जब भारत दौरे पर आए थे, तब गुजरात में उन्हें पतंगबाजी दिखाते हुए नरेन्द्र मोदी का एक वीडियो काफी वायरल हुआ था, जिसमें मर्ज की अनिच्छा के बावजूद मोदी उन्हें हाथ खींच-खींच कर आसमान की तरफ इशारा कर दिखा रहे थे। अपने विदेशी समकक्षों के साथ नरेन्द्र मोदी कई बार इस तरह की हरकतें कर चुके हैं, जिनसे भारत की कूटनीति और विदेश नीति का तमाशा बना है। खैर, जब देश का मुखिया ही ऐसा हो जो कैमरे के सामने दिखने और सबका ध्यान आकृष्ट करने के लिए अभिनय करे तो भला उनके अनुयायी पीछे क्यों रहेंगे।
अभी उत्तरप्रदेश में माघ मेले में भाजपा ने सनातन धर्म का ही तमाशा बना दिया। शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद महाराज से नोटिस देकर पूछा गया कि वे साबित करें कि वे शंकराचार्य हैं। आज तक आदित्यनाथ योगी को तो ऐसा कोई नोटिस नहीं दिया गया कि वे खुद को योगी साबित करें, न ही अपने नाम के आगे जगदगुरु लिखने वाले रामभद्रचार्य को ऐसा कोई नोटिस मिला। गांधीजी मोदी युग में जिंदा बच पाते तो उनसे भी पूछा जाता कि वे खुद को महात्मा साबित करें। वल्लभ भाई पटेल से सियासी मकसद नहीं सधता तो उन्हें भी नोटिस मिलता कि उनके नाम के आगे सरदार कैसे लिखा है। बहरहाल, मंदिर और धर्म की राजनीति करने वाली भाजपा ने शंकराचार्य का जी भर के अपमान किया, क्योंकि उन्होंने कभी भाजपा या नरेन्द्र मोदी का अंधा समर्थन नहीं किया। अपने साथ हुई बदसलूकी पर शंकराचार्य ने योगी सरकार पर सवाल उठाए तो इससे आहत होकर अयोध्या में जीएसटी के डिप्टी कमिश्नर प्रशांत कुमार ने मंगलवार 27 जनवरी को अपना इस्तीफा दिया। यह इस्तीफा किसी कागज पर साधारण तरीके से नहीं बल्कि कैमरे के सामने पूरे तमाशे के साथ रोते-धोते दिया गया। प्रशांत कुमार ने बताया कि वो मोदी और योगी के अपमान से आहत थे इसलिए उन्होंने इस्तीफा दिया। उन्होंने कहा कि उन्होंने सीएम योगी का नमक खाया है। बहरहाल, इस इस्तीफे वाले तमाशे का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, तो लोगों ने प्रशांत कुमार को याद दिला दिया कि आप भले सरकारी नौकरी में हैं, लेकिन उसका वेतन भाजपा नहीं आम लोगों के दिए टैक्स के पैसे से दिया जाता है। यानी नमकहलाली करनी हो तो जनता की करो। प्रशांत कुमार के इस्तीफे पर आई प्रतिक्रियाओं को देखकर लगा कि जनता भी अब रोज़-रोज़ के इन तमाशों से ऊब चुकी है। हालांकि अब इस इस्तीफे की कथा में नया अध्याय जुड़ गया है। प्रशांत कुमार सिंह के सगे भाई ने ही आरोप लगाया है कि उन्हें नेत्र विकलांगता का फर्जी सर्टिफिकेट दिखाने से नौकरी मिली है। प्रशांत कुमार पर आरोप है कि दो बार मेडिकल बोर्ड के आगे वह हाजिर नहीं हुए हैं। अब इस मामले में मुख्य चिकित्सा अधिकारी मऊ की ओर से जांच शुरू कर दी गई है। तो संदेह है कि जांच से बचने के लिए प्रशांत कुमार ने बड़े तरीके से अपने इस्तीफे को इस तरह पेश किया कि उन्हें योगी वफादारी का ईनाम दे देते। हालांकि इस पूरे प्रकरण से सवाल खड़े हो गए हैं कि जब बड़े पदों पर बैठे अधिकारी खुलकर नेताओं के प्रति अपनी वफादारी का इजहार करने लगें तो संविधान के साथ वफादारी किस तरह निभाई जाएगी। क्या ऐसे चाटुकार अधिकारियों के कारण जनता के बड़े हिस्से के साथ अन्याय नहीं होगा। और मान लें कि यह चाटुकारिता केवल जांच से बचने के लिए है, तब भी मामला संगीन ही रहेगा, क्योंकि फर्जी तरीकों से डिप्टी कमिश्नर जैसा पद हासिल करने वाले लोगों से देश के लिए भी घातक ही हैं।
तीन साल पहले जम्मू-कश्मीर में एक फर्जी अधिकारी पकड़ में आया था। किरण पटेल नाम का यह शख्स खुद को पीएमओ में अस्सिटेंट बताकर भारी सुरक्षा के साथ आराम से घूमता था। अभी दिल्ली में इसी तरह एक मोहतरमा खुद को विदेशी दूतावास का प्रतिनिधि बताकर नकली नंबरप्लेट के साथ संवेदनशील इलाकों में घूमती रही, हालांकि गणतंत्र दिवस के पहले उसे गिरफ्तार कर लिया गया। इस महिला के साथ भाजपा के कई बड़े नेताओं की तस्वीरें भी हैं। अगर ऐसे किसी फर्जी शख्स की तस्वीरें कांग्रेस नेताओं के साथ होती तो मीडिया अब तक बड़ा तमाशा खड़ा कर चुका होता। लेकिन इन मुद्दों पर लगभग सन्नाटा पसरा है। भाजपा की रक्षा में जुटी मीडिया को न राष्ट्र की सुरक्षा का ख्याल है, न राष्ट्रवाद की फिक्र है।
मोदी को खुश करने के चक्कर में भाजपा ने तो अब गणतंत्र दिवस का भी तमाशा बना दिया है। पहले गणतंत्र दिवस पर संविधान की बात होती थी। संविधान निर्माताओं के जज्बे और भावनाओं को लोगों तक पहुंचाया जाता था। बच्चों को संविधान का महत्व बताकर उन्हें भावी नागरिक बनने के लिए तैयार किया जाता था। लेकिन अब गणतंत्र दिवस भी मोदी सरकार की राजनीति की भेंट चढ़ गया। इस बार के गणतंत्र दिवस पर राहुल गांधी से जुड़े सवाल ही चर्चा में छाए रहे। पहले तो गणतंत्र दिवस समारोह में राहुल गांधी को तीसरी पंक्ति में बिठाया गया, उनके सामने कम ओहदे वाले लोग बैठे रहे। नेता प्रतिपक्ष होने के नाते राहुल गांधी को भी कैबिनेट रैंक मिली है, यानी उन्हें कायदे से सामने की पंक्ति में जगह मिलनी चाहिए थी, लेकिन गांधी परिवार से नफरत के इजहार का मौका भाजपा कभी नहीं छोड़ती। वैसे भाजपा को यह समझना चाहिए कि राहुल गांधी के सियासी कद पर पहली या तीसरी पंक्ति में बैठने से कोई असर नहीं पड़ेगा, लेकिन उसकी असलियत जनता के सामने आ जाएगी। खैर राहुल गांधी का विरोध राष्ट्रपति भवन में एट होम रिसेप्शन में भी चलता रहा। जहां इस बार असमिया संस्कृति का सम्मान करने के लिए सभी को असमिया गमछा या पटका पहनाया गया। जो तस्वीरें सामने आईं उनमें राहुल गांधी ने उस पटके को पहनने की जगह हाथ में रख लिया। बस भाजपा के नेताओं ने इसी पर राहुल गांधी को भला-बुरा कहना शुरु कर दिया कि उन्होंने पूर्वोत्तर का अपमान किया है। हालांकि ये भाजपा नेता कभी मोदी से ये पूछने की हिम्मत नहीं कर सके कि मणिपुर जलता रहा तो पूरे ढाई साल बाद प्रधानमंत्री वहां क्यों गए, पहले क्यों नहीं गए। हालांकि मल्लिकार्जुन खड़गे ने बताया है कि राहुल गांधी ने पटका पहना था और भोजन के वक्त उसे हाथ में रख लिया। वैसे तस्वीरें तो राजनाथ सिंह की भी आई हैं, जिसमें उन्होंने असमिया पटका नहीं पहना है। मगर उन पर किसी ने सवाल नहीं उठाए। क्योंकि उद्देश्य तो राहुल गांधी की छवि खराब करने का है। वैसे भाजपा को इस बात पर भी आपत्ति नहीं हुई कि गणतंत्र दिवस समारोह हो या राष्ट्रपति भवन में मेहमानों का स्वागत, वहां चुनावी माहौल नहीं बनना चाहिए। लेकिन चुनावी राज्य असम में अपनी पकड़ बनाने के लिए भाजपा ने असमिया गमछे को साधन बनाया और राष्ट्रपति पद को भी इसमें शामिल कर लिया। जो सरासर संविधान और गणतंत्र दिवस दोनों का अपमान है। लेकिन अब तो लगता है कि चुनावी प्रचार के तमाशे में इतनी ही कसर रह गई है कि नरेन्द्र मोदी अपने साथ राष्ट्रपति मुर्मू को चुनावी मंच पर चढ़ाएं और अबकी बार मोदी सरकार का नारा लगवाएं। राष्ट्रपति महोदया जब प्रधानमंत्री को घर की बूढ़ी अम्मा की तरह दही-चीनी खिलाने से परहेज नहीं कर सकीं, तो चुनाव प्रचार के लिए कैसे मना करेंगी ये देखना होगा।
बहरहाल, मोदी सरकार में तमाशों की एक लंबी फेहरिस्त बनी हुई है। अभी यूजीसी के नए नियमों पर देश में जाति का तमाशा खड़ा हो गया है। भाजपा का सवर्ण समर्थक ही अब मोदी-शाह के पोस्टर्स पर अपना गुस्सा उतार रहा है। लेकिन आखिर में वो वोट भाजपा को ही देगा। इधर एस सी, एस टी और ओबीसी के लोग खुश हो जाएंगे कि उच्च शिक्षा संस्थानों में उनके साथ हो रहे भेदभाव को दूर करने के लिए मोदी सरकार ने कितने कड़े नियम बनाए हैं। मगर अभी तो देखना बाकी है कि ये नियम वाकई लागू होते हैं या फिर किसी बहाने से इन्हें हटाया जाएगा। क्या पांच राज्यों के नतीजे आने के बाद मोदी सरकार कोई यू टर्न ले लेगी ये भी देखना होगा।


