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पिंजरे का तोता और रबर स्टैंप, सीबीआई को लेकर कई सवाल

सीबीआई की निष्पक्षता और दबाव मुक्त होकर काम करने का सवाल पहली बार राहुल गांधी ने ही उठाया है, ऐसा नहीं है।

पिंजरे का तोता और रबर स्टैंप, सीबीआई को लेकर कई सवाल
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सीबीआई की निष्पक्षता और दबाव मुक्त होकर काम करने का सवाल पहली बार राहुल गांधी ने ही उठाया है, ऐसा नहीं है। बल्कि सीबीआई निदेशक की नियुक्ति हमेशा से संवेदनशील और महत्वपूर्ण मानी जाती रही है। ऐसे में नेता प्रतिपक्ष की ओर से चयन प्रक्रिया पर सवाल उठाना आने वाले दिनों में राजनीतिक और संवैधानिक बहस को और तेज कर सकता है और ऐसी बहस शायद अब देश के लिए जरूरी भी हो गई है।

कांग्रेस सांसद और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी की प्रधानमंत्री मोदी को लिखी एक चिठ्ठी से नयी सियासी हलचल खड़ी हो गई है। इस चिठ्ठी में राहुल गांधी ने साफ कह दिया है कि नेता प्रतिपक्ष रबर की मुहर नहीं हो सकता। मतलब सरकार के हर फैसले को चुपचाप मान लें और उस पर कोई सवाल न उठाएं, यह संभव नहीं है। याद दिला दूं कि जब राहुल गांधी को नेता प्रतिपक्ष चुना गया था, तब उन्होंने कहा था कि वे संसद में जनता की आवाज़ उठाएंगे और इस समय राहुल गांधी ठीक वही कर भी रहे हैं।

दरअसल मंगलवार को प्रधानमंत्री और प्रधान न्यायाधीश की मौजूदगी में सीबीआई के नए निदेशक के चयन के लिए एक बैठक हुई। जिसमें राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि 'सरकार ने चयन प्रक्रिया को महज एक औपचारिकता बना दिया है। उन्होंने सीबीआई निदेशक के लिए 69 उम्मीदवारों के रिकॉर्ड समय पर न मिलने और पारदर्शिता की कमी पर सवाल उठाए हैं और फिर एक पत्र लिखकर विस्तार से अपना विरोध दर्ज किया। पत्र में राहुल गांधी ने लिखा, ' सीबीआई के अगले निदेशक की सिफारिश करने के लिए गठित समिति के अध्यक्ष के तौर पर लिख रहा हूं, ताकि मैं इसकी कार्यवाही को लेकर अपना विरोध दर्ज करा सकूं। आपकी सरकार ने भारत की प्रमुख जांच एजेंसी सीबीआई का राजनीतिक विरोधियों, पत्रकारों और आलोचकों को निशाना बनाने के लिए बार-बार दुरुपयोग किया है। संस्था पर ऐसे कब्जे रोकने के लिए ही चयन समिति में विपक्ष के नेता को शामिल किया जाता है। अफसोस की बात है कि आपने इस प्रक्रिया में मुझे कोई भी सार्थक भूमिका देने से लगातार इनकार किया है। बार-बार अनुरोध करने के बावजूद मुझे योग्य उम्मीदवारों की सेल्फ-अप्रेजल (स्व-मूल्यांकन) और 360-डिग्री रिपोर्ट देखने की अनुमति नहीं दी गई। मुझसे यह उम्मीद की जा रही थी कि मैं समिति की असल बैठक के दौरान ही पहली बार 69 उम्मीदवारों के मूल्यांकन रिकॉर्ड की समीक्षा कर लूं। प्रत्येक उम्मीदवार के इतिहास और प्रदर्शन का आकलन करने के लिए इन रिकॉर्ड की विस्तृत समीक्षा करना बेहद जरूरी है।'

राहुल गांधी ने अपने पत्र में दावा किया कि जानकारी से जान-बूझकर वंचित रखने का यह काम यह सुनिश्चित करता है कि केवल सरकार का पहले से तय उम्मीदवार ही चुना जाए, जिससे पूरी कानूनी प्रक्रिया का मजाक उड़ता है। राहुल गांधी ने याद दिलाया कि यह कोई अकेली घटना नहीं है। उन्होंने पांच मई 2025 को अपनी असहमति दर्ज कराई थी, और उसके बाद 21 अक्टूबर, 2025 को एक निष्पक्ष प्रक्रिया के लिए सुझाव दिए थे, जिस पर उन्हें कोई जवाब नहीं मिला। राहुल गांधी ने आगे कहा कि चयन समिति को जरूरी जानकारी न देकर, सरकार ने इसे महज एक औपचारिकता बना दिया है। विपक्ष का नेता कोई रबर स्टैंप नहीं होता। इसलिए मैं इस पक्षपातपूर्ण प्रक्रिया में हिस्सा लेकर अपने संवैधानिक कर्तव्य से पीछे नहीं हट सकता। मैं कड़े शब्दों में अपनी असहमति जता रहे हैं।

राहुल गांधी की चिठ्ठी पर भाजपा की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। लेकिन जब भी जांच एजेंसियों का राजनैतिक इस्तेमाल करने का आरोप विपक्ष लगाता है, भाजपा 2013 में सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति आर एम लोढ़ा की टिप्पणी याद दिलाती है कि तब कोयला घोटाले की जांच में उन्होंने सीबीआई को पिंजरे का तोता कहा था। हालांकि भाजपा को याद रखना चाहिए कि सितंबर 2024 में दिल्ली शराब नीति घोटाले के आरोप में सीबीआई द्वारा दायर मामले में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को को जमानत देते हुए न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुयान ने अपने फैसले में लिखा: 'कुछ समय पहले ही इस न्यायालय ने सीबीआई की कड़ी आलोचना करते हुए उसकी तुलना पिंजरे में बंद तोते से की थी। यह आवश्यक है कि सीबीआई इस धारणा को दूर करे कि वह पिंजरे में बंद तोता है। बल्कि, यह धारणा बननी चाहिए कि वह एक खुले तोते की तरह है।'

तो सीबीआई की निष्पक्षता और दबाव मुक्त होकर काम करने का सवाल पहली बार राहुल गांधी ने ही उठाया है, ऐसा नहीं है। बल्कि सीबीआई निदेशक की नियुक्ति हमेशा से संवेदनशील और महत्वपूर्ण मानी जाती रही है। ऐसे में नेता प्रतिपक्ष की ओर से चयन प्रक्रिया पर सवाल उठाना आने वाले दिनों में राजनीतिक और संवैधानिक बहस को और तेज कर सकता है और ऐसी बहस शायद अब देश के लिए जरूरी भी हो गई है। क्योंकि उसके बाद शायद ईडी या सीबीआई जैसी संस्थाओं की पुरानी साख वापस लौट सके।

ध्यान रहे कि मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में विपक्षी दलों ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को 26 जुलाई 2022 को एक पत्र लिखा था, जिसमें आरोप लगाया था कि मोदी सरकार जांच एजेंसियों का 'निरंतर और तीव्र दुरुपयोग' कर रही है। इस पत्र में लिखा गया था कि 'कानून को बिना किसी डर या उत्साह के लागू किया जाना चाहिए। लेकिन इसका इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। मौजूदा समय में मनमाने ढंग से, चुनिंदा और बिना किसी औचित्य के कई विपक्षी दलों के प्रमुख नेताओं के खिलाफ इसका इस्तेमाल किया जा रहा है। इस अभियान का एकमात्र उद्देश्य प्रतिष्ठा को नष्ट करना और भाजपा से वैचारिक व राजनीतिक रूप से लड़ने वाली ताकतों को कमजोर करना है। यह हमारे देश के लोगों का ध्यान आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि, बढ़ती बेरोजगारी और आजीविका के नुकसान और जीवन, स्वतंत्रता और संपत्ति की बढ़ती असुरक्षा की उनकी सबसे जरूरी दैनिक चिंताओं से ध्यान हटाने के लिए भी किया जा रहा है।'

इस साझा पत्र पर दस्तखत करने वालों में आरजेडी, शिवसेना, डीएमके, एमडीएमके, टीआरएस, नेशनल कॉन्फ्रेंस, सीपीआई, सीपीएम, आरएसपी समेत कई विपक्षी दलों के नेता शामिल थे। दरअसल देश को विपक्ष मुक्त करने की नीयत से भाजपा ने कई दलों में फूट डलवाई, कई राज्यों में सत्ता हथियाई थी। उसके बाद भी जिन लोगों ने दबाव में आने से इंकार किया, तो उन्हें केंद्रीय एजेंसियों के रडार लिया गया। ऐसे नेताओं की सूची काफी लंबी है। फारुख अब्दुल्ला, सोनिया गांधी, राहुल गांधी, शरद पवार, संजय राउत, अनिल परब, ममता बनर्जी, अभिषेक बनर्जी सब पर अलग-अलग मामलों में ईडी या सीबीआई की जांच चली। आम आदमी पार्टी में तो पहली पंक्ति के लगभग सभी नेताओं को जेल भेजा गया या मुकदमा दर्ज किया गया। हेमंत सोरेन पर पूछताछ चली। अभिषेक बनर्जी ने तब कहा भी था कि, 'ईडी और सीबीआई बीजेपी की सबसे बड़ी सहयोगी बन गई हैं। राजनीतिक रूप से हमारा मुकाबला करने में नाकाम रहने के कारण पार्टी राजनीतिक हथियार के तौर पर इन एजेंसियों का इस्तेमाल कर रही है।'

इस बयान में कुछ गलत भी नहीं लगता क्योंकि केवल विपक्षी दल ही नहीं सुप्रीम कोर्ट भी इस बारे में टिप्पणी कर चुका है। नवंबर 2025 में झारखंड विधानसभा में नियुक्तियों और पदोन्नतियों में अनियमितताओं के मामले में सुप्रीम कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई और जस्टिस के विनोद चंद्रन की पीठ में सुनवाई के दौरान जस्टिस गवई ने कहा था कि, 'आप अपनी राजनीतिक लड़ाइयों के लिए एजेंसी का इस्तेमाल क्यों करते हैं? कई मामलों में हमने कहा है कि जांच एजेंसियों के दुरुपयोग पर रोक लगनी चाहिए।' इससे पहले अप्रैल 2022 में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश रमना ने सीबीआई के संस्थापक निदेशक की स्मृति में आयोजित व्याख्यान में कहा था कि, 'समय के साथ राजनीतिक कार्यकारिणी बदलेगी। लेकिन आप यानी सीबीआई एक संस्था के रूप में स्थायी हैं। अभेद्य बनें और स्वतंत्र रहें। अपनी सेवा के लिए एकजुटता की शपथ लें। आपकी बिरादरी ही आपकी ताक़त है।' उन्होंने कहा था कि शुरुआती दौर में सीबीआई के पास जनता का अपार विश्वास था, लेकिन हाल के वर्षों में इसकी विश्वसनीयता सवालों के घेरे में आ गई है।

तो इस तरह समझा जा सकता है कि राहुल गांधी ने जो सवाल उठाया है वो कई बरसों से अनुत्तरित ही चला आ रहा है। सीबीआई की विश्वसनीयता पर अगर देश के प्रधान न्यायाधीशों से लेकर विपक्षी दलों के नेता सब सवाल उठा रहे हैं, तब तो केंद्र सरकार को ज्यादा सावधानी के साथ इसके निदेशक की चयन प्रक्रिया पूरी करनी चाहिए। लेकिन यहां भी मोदी सरकार का रवैया विपक्ष के लिए तिरस्कार भरा दिख रहा है। अगर विपक्ष की बातों का मान रखना होता तो राहुल गांधी के पास उन 69 उम्मीदवारों की विस्तृत जानकारी पहुंचनी चाहिए थी, जिनमें से किसी एक को सीबीआई का निदेशक बनाया जाएगा। लेकिन जब सरकार की ही मर्जी से सब तय होगा तो फिर वाकई मान लेना चाहिए कि मोदी विपक्ष को रबर स्टैंप की तरह की इस्तेमाल करना चाहते हैं। अच्छी बात ये है कि राहुल गांधी ने अपनी कड़ी असहमति जता दी है। लेकिन क्या इसके बाद मोदी सरकार का रवैया बदलेगा, यह संशय बना हुआ है। क्योंकि इससे पहले मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति के वक्त भी राहुल गांधी ने ऐसे ही चिठ्ठी लिखकर अपना विरोध दर्ज कराया था। लोकतंत्र और संविधान का वास्ता सरकार को दिया था। लेकिन मोदी-शाह ने अपनी मर्जी से ज्ञानेश कुमार को मुख्य चुनाव आयुक्त बनाया, इसमें राहुल गांधी की असहमति पर ध्यान नहीं दिया। अब महाराष्ट्र से लेकर हरियाणा तक बिहार से लेकर बंगाल तक जिस तरीके से चुनाव हुए हैं, उस पर सवाल उठ रहे हैं। तो बात चाहे निष्पक्ष चुनावों की हो या जांच एजेंसियों को बिना दबाव के काम करने देने की, मोदी सरकार का रवैया काफी संदिग्ध दिख रहा है। लेकिन विडंबना यही है कि इस संदेह को दूर करने की परवाह या जनता के प्रति जिम्मेदाराना व्यवहार भी नरेन्द्र मोदी नहीं दिखा रहे हैं।


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