कौड़ियों में उलझा भाषायी चरित्र
आज गांधी के अहिंसा के दर्शन पर बात करने की जरूरत इसलिए पड़ी क्योंकि पिछले कई सालों से हिंसा को सामान्य भाव की तरह लिया जाने लगा है।

- सर्वमित्रा सुरजन
आज गांधी के अहिंसा के दर्शन पर बात करने की जरूरत इसलिए पड़ी क्योंकि पिछले कई सालों से हिंसा को सामान्य भाव की तरह लिया जाने लगा है। अपने सामने लोगों पर अत्याचार होते देखने के बावजूद उसे रोकने की पहल कम ही होती है, बल्कि कई बार तो पीड़ित के हक में खड़े होने की जगह उस घटना को कैमरे में कैद करने की हड़बड़ी दिखाई देती है।
मध्यप्रदेश के कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने हाल ही में मुख्यमंत्री मोहन यादव को एक पत्र में कहा है कि वह जनता के सवाल पूछते रहेंगे, जो उनका कर्तव्य है और वह पूरी विनम्रता के साथ अपनी इस लोकतांत्रिक जिम्मेदारी को निभाते रहेंगे। पत्र में पटवारी ने लिखा है कि यदि गाली देना आपका अधिकार है, तो उसका पालन आप करते रहिए, मैं यह स्पष्ट करना चाहता हूं कि मैं जो भी मुद्दे उठाता हूं, वे किसी व्यक्तिगत राजनीति का हिस्सा नहीं होते, बल्कि मध्यप्रदेश की जनता की पीड़ा और जनभावनाओं की अभिव्यक्ति होते हैं। इससे पहले एक वीडियो संदेश में उन्होंने कांग्रेस कार्यकर्ताओं से अपील की है कि वे मुख्यमंत्री का पुतला दहन नहीं करें, क्योंकि इसमें हिंसा का भाव जुड़ा है। गांधीवादी और गोडसेवादी का अंतर स्पष्ट करते हुए जीतू पटवारी ने कांग्रेस कार्यकर्ताओं से कहा कि वे भाजपा के लोगों को फूल देकर उनके सामने प्यार से अपना विरोध दर्ज कराएं।
जीतू पटवारी को यह अपील उस समय करनी पड़ी जब मुख्यमंत्री ने उनके लिए 'टपोरी लाल', 'ढपोरशंख' और 'दो कौड़ी का प्रदेश अध्यक्ष' जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया। मोहन यादव ने कहा कि जीतू पटवारी को चुनाव न जीतने के कारण नाकाम बताते हुए कहा कि जब देश में संकट आए तो नेता प्रतिपक्ष भाग जाये। जब प्रदेश में विकास की बयार चले तो इनका 'दो कौड़ी का प्रदेश अध्यक्ष' हाय रे, हाय रे करे।' मोहन यादव ने यहां तक कहा कि आजादी के बाद से उन्होंने कांग्रेस का 'इतना रद्दी अध्यक्ष' नहीं देखा है।
आज से कुछ साल पहले तक राजनैतिक विरोधियों के लिए दो कौड़ी, रद्दी जैसे शब्द कम बोले-सुने जाते थे। लेकिन आज की भाजपा के दौर में यही राजनैतिक संस्कृति विकसित हो चुकी है। कुछ समय पहले असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वासरमा ने कांग्रेस नेता पवन खेड़ा के लिए कहा था कि मैं उनका पेड़ा बना दूंगा। खेड़ा और पेड़ा की ऐसी तुकबंदी स्कूल-कॉलेज के बच्चे आपसी लड़ाई में तो कर सकते हैं, लेकिन राज्य के मुख्यमंत्री भी इसी स्तर की बात करेंगे, ऐसा किसने सोचा था। उत्तरप्रदेश में भी भाजपा के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी ने गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मौलवियों की मांग पर कहा कि गाय हमारे लिए कोई पशु नहीं है, बल्कि वह हमारे लिए माता के समान है। जो लोग गाय को सिर्फ एक पशु मानते हैं, उनकी बुद्धि पशु जैसी है, उनकी सोच पशुवत है। माना कि योगी को गौमाता के लिए अपनी अटूट श्रद्धा दिखानी थी, लेकिन क्या यह केवल तभी जाहिर होगी, जब आप मुसलमानों की सोच को पशुवत बताएं। सनातन धर्म तो प्राणिमात्र के लिए दया का भाव दिखाने की सीख देता है, हर जीव के लिए करुणा की बात करता है।
इन राजनेताओं से पहले हमारे मुख्य न्यायाधीश ने एक सुनवाई में कॉकरोच और परजीवी शब्द का इस्तेमाल किया तो उसकी ऐसी प्रतिक्रिया हुई कि कॉकरोच जनता पार्टी नाम से आंदोलन ही खड़ा हो गया। हालांकि मुख्य न्यायाधीश ने बता दिया कि उनका इरादा वह नहीं था, जो समझा गया। लेकिन फिर भी कॉकरोच शब्द राजनैतिक विमर्श में ऐसा आ गया कि अब उपराष्ट्रपति ने भी उसका इस्तेमाल किया। पिछले दिनों एक कार्यक्रम में उपराष्ट्रपति सी पी राधाकृष्णन ने कहा कि, सकारात्मक कामों की अच्छी तरह से रिपोर्टिंग की जानी चाहिए। तभी युवाओं को सही जानकारी मिलेगी वरना वे रुचि खो देंगे और 'कॉकरोच' की राह पर चल पड़ेंगे।
यहां जिस तरीके से कॉकरोच शब्द का इस्तेमाल किया गया है, उससे जाहिर है कि उपराष्ट्रपति भी मुख्य न्यायाधीश के विचारों से इत्तेफाक रखते हैं। विडंबना है कि लोकतंत्र में विरोध करने, आंदोलन करने को अब इतना निकृष्ट मान लिया गया है कि कोसने के लिए कीड़े-मकोड़ों की उपमाएं दी जा रही हैं। भाजपा और उसके समर्थकों में विरोधियों के लिए कॉकरोच शब्द को लेकर एक अघोषित सहमति बनी हुई दिख रही है। क्योंकि खुद को कवि कहने वाले कुमार विश्वास ने भी कहा है कि कॉकरोच बने हैं तो देश में हिट भी बने हैं। कॉकरोचों का इलाज हो जाएगा। ध्यान रहे कि ये वही कुमार विश्वास हैं जो खुद अन्ना आंदोलन के वक्त सुर्खियों में आए और उस मंच का लाभ उठाकर उन्होंने खुद को कवि और रामकथा वाचक के तौर पर स्थापित कर लिया। कायदा तो यही कहता है कि मर्यादा पुरुषोत्तम राम की बात करने वाले व्यवहार और भाषा दोनों में मर्यादा का पालन करेंगे, लेकिन इन उदाहरणों में ऐसा कोई पालन होते दिख नहीं रहा है।
भाषा की मर्यादा को पूरी तरह ताक पर रखने के इस दौर में जब जीतू पटवारी विनम्रता से कहते हैं कि जवाब देने में हिंसा का भाव नहीं आना चाहिए, तो ऐसी बातें आज की नफरत भरी राजनीति के दौर में अजीब लग सकती हैं। उस वक्त भी लगा करती थीं जब गांधीजी ने अहिंसा को हथियार बनाकर अंग्रेजों से लड़ाई लड़ने की शुरुआत की थी। लोगों को लगता था कि कोई हमें मारे तो हमें भी पलट कर मारना चाहिए, तभी अपमान का बदला लिया जा सकेगा। लेकिन गांधीजी ने बताया कि अगर आप पलट कर न मारें और हिंसा करने वाले को एहसास कराएं कि उसने गलत किया है, तो यह जवाब देने का सही तरीका होगा। गांधी के इस तरीके से आज भी बहुत से लोग असहमत ही हैं, लेकिन इसका बेहतर विकल्प भी कोई बता नहीं पाया है। क्योंकि नफरत के जवाब में नफरत से बात बिगड़ेगी ही। इतिहास गवाह है कि बड़े से बड़ा युद्ध भी आखिरकार तभी थमा जब एक पक्ष पूरी तरह नेस्तनाबूद हुआ या फिर आपसी वार्ता से रोका गया। वार्ता होती है तो समाधान के रास्ते खुले रहते हैं, जबकि एक पक्ष को पूरी तरह बर्बाद करने के बाद भी समस्या खत्म नहीं होती है।
बहरहाल, आज गांधी के अहिंसा के दर्शन पर बात करने की जरूरत इसलिए पड़ी क्योंकि पिछले कई सालों से हिंसा को सामान्य भाव की तरह लिया जाने लगा है। अपने सामने लोगों पर अत्याचार होते देखने के बावजूद उसे रोकने की पहल कम ही होती है, बल्कि कई बार तो पीड़ित के हक में खड़े होने की जगह उस घटना को कैमरे में कैद करने की हड़बड़ी दिखाई देती है। कमजोर, असहायों, शोषितों के लिए संवेदनाएं समाज में कम हो रही हैं। शारीरिक हिंसा के साथ-साथ शाब्दिक हिंसा भी बेलगाम बढ़ चुकी है। पहले घर, समाज और सार्वजनिक जीवन में लोग बातचीत में लहजे और शब्दों का लिहाज करते थे। हमउम्र लोग आपसी बेतकल्लुफी में अगर अपशब्द कहें तो उसमें भी इतनी सावधानी तो बरतते ही थे कि कोई बड़ा आसपास तो नहीं है। परिवार के बड़ों और शिक्षकों के अलावा अखबारों-पत्रिकाओं से भी भाषा परिष्कृत होती थी। उनसे भी भाषायी संस्कार विकसित होते थे। इसी देशबन्धु अखबार में लंबे वक्त तक एक शेर और दो शब्द जैसे साप्ताहिक स्तंभ आते थे, जो साहित्य के साथ अच्छी भाषा की तमीज़ सिखा देते थे। राजनीति में पुराने दौर में भी बाहुबल, धनबल चलता था, लेकिन राजनेताओं को भी यह ख्याल रहता था कि उनकी भाषा पर कोई उंगली न उठाए।
लेकिन अब घरों में ओटीटी के कारण निम्नस्तरीय भाषा को सहज स्वीकृति मिल चुकी है। वहीं राजनेताओं और पत्रकारों से भी अच्छी भाषा की उम्मीद टूटती जा रही है। राजनेताओं में आ चुकी भाषायी गिरावट के कुछ उदाहरण ऊपर दिए जा चुके हैं। इस बीच पत्रकारिता में भी सस्ती लोकप्रियता हासिल करने के लिए भाषा के स्तर को बेझिझक नीचे गिराया जा रहा है। अखबारों में व्याकरण की अशुद्धियां तो अब मामूली लगने लगी हैं, अब असली चिंता उस भाव को लेकर होनी चाहिए जिसके तहत खबरें परोसी जा रही हैं। टीवी चैनलों के कारण यह चिंता और विकराल हो जाती है, क्योंकि वहां समाज जो सुनता और देखता है, वही सीखता है। कार्यक्रमों के शीर्षक जब दंगल, अखाड़ा, महाबहस, ताल ठोक के जैसे रखे गए तो आश्चर्य हुआ कि इनमें खबरें दी जाएंगी या लड़ाइयां होंगी। नजर तो यही आया कि इनमें शीर्षक को सार्थक करते हुए धीर-गंभीर बहसों की जगह लड़ाइयां ही ज्यादा होती हैं। जिनमें बेधड़क अपशब्दों का प्रयोग होता है। इधर पत्रकार सोशल मीडिया पर भी ऐसी ही भाषा लिखने लगे हैं। इस समय एक मशहूर एंकर का दो कौड़ी वाला बयान काफी चर्चा में आया है, जिसमें उन्होंने कोचिंग सेंटर चलाने वाले शिक्षकों को दो कौड़ी का बता दिया, छिछले यूट्यूबर जैसे शब्द का इस्तेमाल किया। ध्यान नहीं पड़ता है कि इन पत्रकार महोदया ने कभी ऐसी खबर बनाई हो कि सरकारी स्कूलों की कितनी बदहाली है। अगर शिक्षा के व्यवसायीकरण पर कोई भी खबर बनानी हो तो सबसे पहला सवाल तो यही होना चाहिए कि सरकारी स्कूल बुरी हालत में क्यों हैं। खैर शिक्षा का व्यवसायीकरण और कोचिंग सेंटर्स का बढ़ता व्यापार एक अलग गंभीर चर्चा का विषय है, जो फिलहाल दो कौड़ी वाले बयान में उलझ चुका है। और यह जनहित व देशहित से जुड़ा अकेला मुद्दा नहीं है, वरन ऐसे तमाम जरूरी मुद्दे इस समय फिजूल बातों में ही हाशिए पर डाल दिए गए हैं।
सत्ता में शीर्ष पर बैठे लोगों, अधिकारियों, राजनेताओं, शिक्षकों, कलाकारों, साहित्यकारों और पत्रकारों सभी से अपेक्षा रहती है कि वे समाज को सही राह दिखाएंगे भी और उस पर ले जाएंगे भी। लेकिन इस राह पर अपशब्दों और भाषायी गिरावट के कांटे बिछे रहेंगे तो माहौल लहूलुहान होगा ही।


