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न जाने किस गली में जिंदगी की....

सैयद मोहम्मद बशीर जो बाद में बशीर बद्र के नाम से मशहूर हुए तो कह उठे कि

न जाने किस गली में जिंदगी की....
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कृष्ण कुमार निर्माण

सैयद मोहम्मद बशीर जो बाद में बशीर बद्र के नाम से मशहूर हुए तो कह उठे कि---

उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दों,

न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए।।

और गत 28 मई को भोपाल में तमाम यादों,अनुभवों के संग शाम हो गई।क्योंकि बशीर ने जिंदगी के तमाम उतार चढ़ाव देखे,संघर्ष किए और दंगों को भी भुगता,न केवल भुगता बल्कि कहा कि:--

लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में,

तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में।।

और यकीन मानिए आज भी वैसा ही हो रहा है पर किसे फकि्र हैं क्योंकि जब इंसान बंट जाता है तब वह इंसान नहीं रहता बल्कि जहरीला सांप हो जाता है बस खोल ही इंसान का होता है?पन्द्रह फरवरी 1930 में जन्मे बशीर ने पीएचडी तक शकि्षा प्राप्त की और मेरठ कालेज में लंबे समय तक प्रोफेसर रहे पर 1987 में मेरठ छोड़ना पड़ा और भोपाल आकर बस गए और रचनाधर्मिता में ऐसे तल्लीन हुए कि उन्होंने गज़ल को 'मीर' और 'गालिब' के पारंपरकि ढर्रे से न केवल नकिाला बल्कि वर्तमान दौर के शायरों के लिए नई ताबीर भी लिखी,तभी तो उन्हें 'पदम श्री' और 'साहित्य अकादमी पुरस्कार' से नवाजा गया क्योंकि बशीर की शाइरी का मिजाज आम आदमी की हालातों से गुजरता है कि:--

कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से,

ये नए मिजाज का शहर है जरा फासले से मिला करो।

और यकीन मानिए ऐसा ही हो रहा है आजकल पूरी दुनिया में,,यही एक शाइर की खूबी होती है कि वो समय की नब्ज पकड़कर लिखता है और ऐसा लिखता है कि जब भी पढ़ो,वो नया लगता है।उनकी शाइरी में सादगी,तल्खी और मुहब्बत का जो संगम था,वो विरल है। उनकी शाइरी की एक खास बात यह भी रही कि बशीर साहब ने कठिन लफ्जों के जाल से मुक्त होकर आम बोलचाल की भाषा को उर्दू जुबान दी और शायद यही वजह है कि उनके कलाम हर खास-ओ-आम की जुबान पर आ जाते हैं कि:-

आखिर कुछ तो मजबूरियाँ ही होंगी,

वरना यों ही कोई बेवफा नहीं होता।

यह शेर न जाने कितने आयाम खोलता है।आम बात से लेकर महबूब तक और तमाम चीजों को खोल देता है।उनका एक शेर जो आज के हालातों पर भी खरा उतरता है कि:--

जी बहुत चाहता है सच बोलें,

क्या करें हौसला नहीं होता।

है ना गजब कितनी सरलता से कितनी बड़ी बात कहने में सफल हो गए बशीर साहब।यही कमाल था बशीर बद्र जी का।बशीर के अवसान के बाद जो वर्तमान दौर है कि सोशल मीडिया का,डिजिटल दुनिया का,जिसमें आए दिन हजारों कवि/शायर जन्म ले रहे हैं,उस दौर में यह बात हर शायर/कवि को अपने जेहन में बिठा लेनी चाहिए कि एक सच्चे रचनाकार का काम सिर्फ मुहब्बत की बातें करना नहीं होता बल्कि अपने समय की राजनीति और समाज के दोगलेपन पर सवाल उठाना भी होता है और अगर ऐसा नहीं कर रहे तो फिर शाइरी छोड़ दीजिए,कुछ और काम करिए।क्योंकि यह बशीर ही कहने की हिमाकत मर सकते हैं कि:--

जीभ पर सूखी हुई गालियाँ अच्छी नहीं।

कुर्सियों पर बैठकर गालियाँ अच्छी नहीं।

और आज यही तो हो रहा है। एक और शेर देखिएगा कि:--

दुश्मनी जमकर करो लेकिन यह गुंजाइश रहे।

जब कभी हम दोस्त हो जाएं तो शर्मिंदा न हों।।

बकौल बशीर बद्र एक शायर/कवि को सदा अपनी रीढ़ मजबूत रखनी चाहिए,उसे सत्ता के सामने झुकने की बजाय अपनी कलम की खुद्दारी को जिंदा रखना चाहिए।तभी तो बशीर यह कह पाए कि:--

मुसाफिर के रास्ते बदलते रहे,

मगर हम तो अपनी डगर चलते रहे।।

इतना ही नहीं:---

शोहरत की धूप आते ही साये सिमट गए।

हम ढलती शाम तक इसी दीवार के रहे।

बेशक बशीर साहब का फिल्मी सफर बहुत लंबा नहीं रहा क्योंकि बशीर अपनी शर्तों पर लिखने वाले शायर थे मगर फिर भी बॉलीवुड उनका मुरीद रहा और जगजीत सिंह,पंकज उधास और गुलाम अली जैसे गज़ल गायकों ने उनकी गज़लों को आवाज दी।आज बशीर नहीं रहे पर उनकी यह शाइरी सदियों तक गूंजती रहेगी कि:---

सात संदूकों में भरकर दफ्न कर दो नफरतें।

आज इंसाँ को मुहब्बत की जरूरत बहुत है।।

बशीर बद्र के रोचक किस्से

आज़मगढ़ के सामईन, बेकल, वसीम और बशीर की परेशानी

आज़मगढ़ के एक कस्बा में सामईन का ये मूड हो गया कि पुरानी गज़ल और पुराना कलाम नहीं सुनेंगे। बेकल उत्साही और वसीम बरेलवी जितनी गज़लें उन्हें याद थीं सब का पहला मिसरा सुनाने लगे और मजमे से आवाज़ आती रही कि सुनी हुई है। आख़िरकार उन लोगों ने मोहलत मांगी कि जा-ए-​कियाम से अपनी-अपनी बयाज़ें ले आएं। बशीर बद्र भी सरासीमा कि कौन सी गज़ल पढ़ें। उनके पास एक और शायर बैठे थे। वो बशीर बद्र को एक मिसरा सुनाते और पूछते कि ये गज़ल पढ़ लूं फिर वो ख़ुद ही कहते, ये गज़ल मैं वहाँ पढ़ चुका हूँ। देखिए ये गज़ल पढ़ लूं। फिर वो कहते कि ये मैं फुलां कस्बे में पढ़ चुका हूँ। आख़िर बशीर बद्र ने तंग आकर कहा,

'भाई तुम सब ख़ुशनसीब शायर हो। तुम्हारा कोई शेर किसी को याद ही नहीं रह सकता। न यकीन आए तो तुम वही गज़ल पढ़के देख लो जो गुज़श्ता बरस यहाँ पढ़ चुके हो। '

शायरी के तारा मसीह और अमरोहा के भुट्टो

अमरोहा में मुशायरा बहुत सुकून से चल रहा था। शायर भी मुतमइन और सुनने वाले भी ख़ुश कि बीच मजमे से एक बहुत माकूल शख़्सियत वाले साहब उठे और खड़े हो कर आदिल लखनवी की तरफ इशारा करके बोले,

'डाक्टर साहब, वो शायर जिनकी सूरत तारा मसीह (जिस जल्लाद ने वज़ीर-ए-आज़म पाकिस्तान ज़ुल्फकार अली भुट्टो को फांसी दी थी) के हू-ब-हू है, उन्हें पढ़वा दीजिए। '

बशीर बद्र ने अपनी मख़सूस मुस्कुराहट के साथ आदिल लखनवी को दावत-ए-सुख़न देते हुए कहा,

'मैं शायरी के तारा मसीह से दरख़्वास्त करता हूँ कि तशरीफ लाएं और अमरोहा के ज़ुल्फ​किार अली भुट्टो का काम तमाम कर दें। '


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