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प्रकृति, पर्यावरण और मानव समाज की व्यथा कथा है 'टनल'

भविष्य की चिन्ताओं के प्रति जागरूकता के साथ वर्तमान पीढ़ी को आगाह करने की एक बहुत ज़रूरी आवाज़ सुनाई देती है

प्रकृति, पर्यावरण और मानव समाज की व्यथा कथा है टनल
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  • राजेश सक्सेना

नील चतुर्वेदी अपने उपन्यासों में ऐसे विषयों को चुनते है जिनमें भविष्य की चिन्ताओं के प्रति जागरूकता के साथ वर्तमान पीढ़ी को आगाह करने की एक बहुत ज़रूरी आवाज़ सुनाई देती है, अपने पांचवे उपन्यास 'टनल' तक आते हुए इस बार उन्होंने ऐसे विषय को अपनी कथावस्तु के लिए चुना है जो विकास नाम के अत्यधिक पर्यावरणीय विरोध का एक बहुत चर्चित और राजनैतिक लोकप्रियता का शब्द बन चुका है।

इस उपन्यास में कथा तो 2023 की सिल्कयारा टनल हादसे की है लेकिन कथा के बहाने समूची पहाड़ी विरासत, संस्कृति, नदियों, पेड़ पौधों और तमाम तरह की प्राकृतिक वन सम्पदा, खनिज सम्पदा, औषधि सम्पदा के प्रति बेहद सूक्ष्म और तर्क के आधार पर चिंता ज़ाहिर की गई है!

इस कथा के कहन में कथाकार ने नायकत्व के लिये पहाड़ को चुना है, बल्कि प्रकृति को नायक के रूप में चुना है,इसलिए ये कहा जा सकता है कि यह उपन्यास पहाड़ की कहानी कहता है !

लेखक एक भू वैज्ञानिक हैं, लिहाजा वे पहाड़ के मिजाज़ को भलीभांति जानते है, उसकी हर परत की कठोरता, कोमलता, आघातिक क्षमता,की अनुपातिक शक्ति के जानकार हैं, इसी के साथ वे पर्यावरणविद भी हैं। इसलिए इस उपन्यास में उन्होंने घटना के मुख्य पात्र को पहाड़ के रूप में चुना, और पहाड़ अपने ऊपर हो रहे तथाकथित विकास के मॉडल प्रयोगो से क्षुब्ध और क्रूद्ध होकर वह अपना रौद्र रूप दिखाकर 41 मज़दूरों को कैद कर देता है।

ूँ टीवी चैनलों पर इन मज़दूरों को बचाने के समाचार लगातार चलते थे लेकिन एक संवेदनशील उपन्यासकार जो संयोगवश भूगर्भ शास्त्री भी है तब उसकी संवेदना केवल घटना की तात्कालिकता को नहीं बल्कि पृथ्वी, प्रकृति, पर्यावरण, पहाड़ से जुड़े प्रश्नों की ऐसी 'टनलÓ में ले जाती है जहाँ से विकास के आधुनिक स्वरूप की बर्बरता, पूँजी और लाभ की लालसा के साथ व्यवस्था के गठजोड़ की प्रतिध्वनियां सुनाई देती हैं। कथाकार ने सूत्रधार के रूप में एक पहाड़ी बुजुर्ग को आकल्पित किया है जो न सिर्फ इस सिल्क्यारा टनल बल्कि पहाड़ों को रोंदेने की कई कहानियां सुनाता है, जिसमें टिहरी बांध, गंगा मन्दाकिनी बैराज, पौड़ी गढ़वाल, सुंदरलाल बहुगुणा, विमलादेवी आदि के योगदान की अकथ गाथा शामिल है।

यह उपन्यास केवल प्रकृति, पहाड़, नदी, पक्षी, पेड़ और पर्यावरण को बचाने के लिये ही आगाह नहीं करता बल्कि लेखक लोक बोली के वे शब्द जो कहीं हाशिये पर छूट रहें हैं उन शब्दों को बचाने की भी कोशिश करते हैं जैसे - भांत भर, (बांह भर),आंटे(थ्रेडर्स), गदेला(मालवी में गादी) लेकिन पहाड़ी में गदेला पानी का पोखर या नाले को भी कहते हैं। लोक जीवन में इन देशज शब्दों का प्रयोग अब घट रहा है लेकिन लेखक इन्हे उपन्यास में प्रयोग कर इन्हें बनाए रखना चाहते हैं, यहाँ गदेला शब्द दो दो लोक बोलियों का शब्द है अस्तु एक लेखक दो जगह के शब्दों को बचा रहा है, चाहे अर्थ भिन्न हों,इस तरह यह प्रकृति के साथ लोक संस्कृति, लोक भाषा को बचाने की गुहार लगाने वाला उपन्यास भी है।

उपन्यास में कुछ रेखाचित्रों का सुन्दर संयोजन प्रसिद्ध चित्रकार अक्षय अमेरिया द्वारा किये गए हैं, इनमें सुरंग के अंदरूनी हिस्से दिखाए गए है जिनमें फंसे मज़दूर हैं। सुरंग में बादल के साथ उजाला दिखाया गया है, यह उजाला एक उम्मीद का प्रकाश है जो चित्रकार की आकांक्षा को भी प्रदर्शित करता है और मुश्किल समय में मनुष्य को उम्मीद किरण दिखाता है, अक्षय के चित्रों ने इस उपन्यास को और अधिक सांकेतिक,अर्थपूर्ण और सशक्त बना कर प्रस्तुत किया है।

यह उपन्यास निर्माणाधीन सुरंग में पहाड़ धंसने एक दुर्घटना के इर्द गिर्द है जिसमें मनुष्य की हिम्मत, परिश्रम और कौशल से 41 मजदूर की जान बचा ली जाती है। दरअसल यह हाथ, हुनर, हिम्मत और हौसले की भी कहानी है जहाँ दुनिया भर की बड़ी बड़ी विकराल मशीनें भी पहाड़ को काटनेया तोड़ने, में दम तोड़ देती हैं वहीं, पहाड़ की प्रकृति को जानने समझने वाले जानकार जब बहुत प्यार से, अपनेपन से, पहाड़ को दुलारते हुए कुदाली से कुरेदते हुए काम करते हैं तो पहाड़ भी उन्हें रास्ता देते हैं

हम असल में यह भूल गए हैं कि बल प्रयोग प्रकृति से प्रकृति क्रूद्ध हो सकती है जिसके परिणाम हम देखते हैं, राम जब समुद्र से रास्ता बनाने के लिये छोटे पत्थर को जोड़कर सेतु बनाते हैं, एक छोटी गिलहरी, वहाँ की कंकड़ मिट्टी सा$फ करती है। इसी तरह महाभारत के प्रसंग में लाक्षागृह से निकलने की सुरंग बनाने के लिये भीम और अर्जुन की गदा और बाणो को बाहुबल का उपयोगी नहीं रहता बल्कि खदान खोदने वाले खनिक श्रमिक - जो विदुर ने भेजा था, वही काम आया।

सिल्कयारा सुरंग भी इसी तरह अंत में रेट माइनर्स ने ही खोदकर फंसे हुए मज़दूरों को निकाला!

हमें रामायण से लेकर महाभारत तक ऐसे उदाहरण मिलते हैं लेकिन प्रकृति के अंधाधुंध दोहन और विकास की नई परिभाषा ने इन्हें भुला दिया है, यह घटना हमारी स्मृति को भी ऊकेरती और हमें आगाह करती है, सुनील के इस उपन्यास की सीख का एक ककहरा यह भी है।

हिमालय की दुदर्शा पर केंद्रित और सुचिंतित कथानक पर लिखा यह उपन्यास लेखक की आत्मा के दर्पण की तरह भी है जिसमें वास्तविक चिंता की लकीरें दिखती हैं और दिलो-दिमा$ग पर जमी हुई धूल साफ कर समाज को धनसत्ता, राजनैतिक सत्ता के कई आवरणों की परत भी हटाती है।

उपन्यास में पात्रों के कहे गए कथनो और वाक्यांशो में बहुत कुछ सूत्रों की व्यंजनात्मक उपस्थिति भी इसे पठनीय और रोचक बनाती है, कुछ की बानगी देखें -

'आज पूरा देश चुप है! जब हम हँकने को तैयार हैं तो वे हमें हाँक रहें हैं, इसमें बुरा क्या है ?

कुछ दार्शनिक कथन भी इसमें आते हैं, 'जिस चट्टान को अभी काट रहे थे, वही अब सहारा बनी हुई है।Ó

Óआग दियसालाई में नहीं सूखी लकड़ी में होती है, मज़दूरों के भीतर भूख की आग होती है लेकिन उसे जिंदगी की मज़बूरीयों ने सोख लिया था'

ये कथन कितने मार्मिक और करुण लगते हैं जिनमें जि़ंदगी की मुश्किलों के बरक्स यथार्थ की घनी पीड़ा दिखती है।

इस तरह के हादसों के व$क्त सरकार और मीडिया किस तरह काम करता है, उस पर भी बहुत निर्भीक, और दो टूक होकर लेखक ने इस उपन्यास के माध्यम से कहने की कोशिश की है जैसे मीडिया कर्मी 'चेहरे पर लाइट सही नहीं आ रही 'एंगल ठीक नहीं आ रहा है Ó $फेस थोड़ा सैड लगना चाहिए। '

'हर काम और विकास उस क्षेत्र के लिये नहीं होता कुछ विकास अपने चहेंतों के लिये किये जाते हैं '

ये कथन और संवाद जिस तरह उपन्यास में आए हैं वह लेखक ने सत्यता के अन्वेष्णो के आधार पर व तथ्यों पर एकदम खरे उतरते हैं।

कुछ लोकगीत इस उपन्यास में रखें गए हैं जो पहाड़ में गाए जाते हैं वे लोकगीत भी इसे उस लोक से जोड़ते हैं।

लब्बो लुआब यह कि उपन्यास में लेखक ने लोक संस्कृति से लेकर लोकभाषा और पर्यावरण के प्रति गहरे, जायज़ और ज़रूरी सवाल समाज, सत्ता और विकास के पुरोधाओं के लिये उठाए हैं और पेड़, पहाड़, प्रकृति और पर्यावरण के लिये जनता को जागरूकता लाने की तरफ इशारा किया है !

संभावना प्रकाशन से छपा यह उपन्यास कम पृष्ठों में समग्रता से अपने शीर्षक की उपादेयता को सिद्ध करता है।


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