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पंडित छन्नूलाल मिश्रा को श्रद्धांजलि

बनारस घराने की ठुमरी परंपरा के स्तंभ, पद्मभूषण पंडित छन्नूलाल मिश्रा का 89 वर्ष की आयु में निधन हो गया

पंडित छन्नूलाल मिश्रा को श्रद्धांजलि
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  • सचिन श्रीवास्तव

बनारस घराने की ठुमरी परंपरा के स्तंभ, पद्मभूषण पंडित छन्नूलाल मिश्रा का 89 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उनके साथ भारतीय शास्त्रीय संगीत ने वह स्वर खो दिया है, जिसने ठुमरी, कजरी, चैती और दादरा को न केवल शास्त्रीय अनुशासन में संवारा बल्कि लोकजीवन की गहराइयों से भी जोड़े रखा। उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर में बेटी के घर पर उन्होंने अंतिम सांस ली। राज्य सरकार ने उन्हें राजकीय सम्मान के साथ अंतिम विदाई देने की घोषणा की है।

2003 की एक शाम याद आती है। उन दिनों ग्रेजुएशन के बाद नौकरी की तलाश में अखबारों के दफ्तरों के चक्कर लगाते थे। दिन की थकान और असमंजस में शाम को मंडी हाउस आश्रय जैसा लगता। वहां नाटक, संगीत और फिल्मों में मन थोड़ी देर के लिए सांस लेता और उम्मीद फिर नींद तक ले जाती थी। इन्हीं शामों में पहली और अंतिम बार पंडित छन्नूलाल मिश्रा को सुना था।

मंच पर जैसे ही उन्होंने आलाप छेड़ा, लगा कि कोई अदृश्य हाथ आत्मा को छू रहा हो। उनकी आवाज में बनारस की गंगा की धीमी लय थी। बहती हुई, ठहरती हुई, और फिर से आगे बढ़ती हुई। कुछ ही देर में उन्होंने कजरी गायी।

"सावन बरसे तिरछी झरियाज्" तो लगा कि सभागार अचानक बनारस की गलियों और घाटों में बदल गया है। हर सुर में सावन की नमी थी, हर बोल में लोकजीवन की छवि। जिसे श्रोताओं की सांसों में और होंठों की बुदबुदाहट में महसूस किया जा सकता था।

इसके बाद उन्होंने अपनी मशहूर ठुमरी का स्वर उठाया। "बाबुल मोरा नैहर छूटो ही जाएज्" तो आंखें भीग उठीं। यह गाना केवल एक राग प्रस्तुति नहीं था, यह विदाई और विरह का वह भाव था जो हर किसी के भीतर छिपा रहता है। पंडित जी के गायन ने उस बांध को तोड़ दिया, जिसने विरह की टीस को रोक रखा था। उस शाम उनकी आवाज ने सिखाया कि संगीत केवल सुना नहीं जाता, जिया भी जाता है। ठुमरी की परंपरा में बेगम अख्तर का दर्दभरा अंदाज, गिरिजा देवी का ठहराव और बनारसी ठुमरी की मिठास, गुलाम अली की गजलों में ठुमरी का स्पर्श- ये सब अपनी-अपनी जगह अमिट छाप छोड़ चुके हैं। लेकिन पंडित छन्नूलाल मिश्रा की ठुमरी और कजरी का रस कुछ अलग ही था। वे शब्दों को सिर्फ गाते नहीं थे, बल्कि उनमें सांस भर देते थे। उनकी कजरी में बनारस का लोकजीवन बहता था। सावन की भीगी गलियां, खेत-खलिहान की मिट्टी, और घाटों पर बजती आरती की गूंज थी। वहीं उनकी चैती में गांव-घर की सुबहें और ऋतु-चक्र का जादू सुनाई देता था। इसीलिए उनकी ठुमरी केवल शास्त्रीय प्रस्तुति नहीं, बल्कि लोक और शास्त्र का अद्भुत संगम थी। जहां सुर शास्त्र से आते थे और भाव लोक से।

पंडित छन्नूलाल मिश्रा का जन्म वाराणसी में हुआ। पिता और गुरु से संगीत की शुरुआती शिक्षा पाई। धीरे-धीरे उन्होंने बनारस घराने की ठुमरी और उससे जुड़ी विधाओं में ऐसी पकड़ बनाई कि वे इस परंपरा के सबसे बड़े वाहक बन गए। ठुमरी, दादरा, कजरी, चैती और होली- हर शैली में उनका गहरा सामर्थ्य था।

उनकी खासियत यह थी कि वे शास्त्रीयता को निभाते हुए भी लोकधुनों की सहजता से दूर नहीं होते थे। इसीलिए उनकी कजरी हो या चैती, उनमें मौसम, लोक और जीवन की पूरी अनुभूति मिलती। उन्होंने ठुमरी को केवल मंचीय कला नहीं रहने दिया, बल्कि उसे जनता की भावनाओं से जोड़े रखा। गुरु-शिष्य परंपरा के वाहक के रूप में उन्होंने अनगिनत शिष्यों को प्रशिक्षण दिया। उनकी गायकी से प्रभावित होकर अनेक नई पीढ़ी के गायक आज भी ठुमरी और दादरा की ओर लौटते हैं।

उनके योगदान को देश ने भी पहचाना। भारत सरकार ने 2010 में उन्हें पद्मश्री और 2016 में पद्मभूषण से सम्मानित किया। वे संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से भी अलंकृत हुए। देश-विदेश के प्रतिष्ठित मंचों पर उन्होंने भारत की ठुमरी परंपरा को नई पहचान दी।

आज जब उनका स्वर सदा के लिए थम गया है, तो लगता है जैसे बनारस की सांगीतिक परंपरा का एक दीप बुझ गया हो। लेकिन उनके गाए सुर अब भी गूंजते हैं। कभी सावन की कजरी में, कभी विदाई की ठुमरी में।

(लेखक संस्कृतिकर्मी और डिजिटल मीडिया विशेषज्ञ हैं।)


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