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'तेरे ख़त आज मैं गंगा में बहा आया हूँ'

दूर तक फैले कीकर और बबूल के पेड़ों के बीच कच्ची पगडंडी पर सीताफल के दो पेड़ थे

तेरे ख़त आज मैं गंगा में बहा आया हूँ
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  • उषा दशोरा

दूर तक फैले कीकर और बबूल के पेड़ों के बीच कच्ची पगडंडी पर सीताफल के दो पेड़ थे। उसी कच्ची पगडंडी पर चलते हुए ज़रा पीछे की ओर गरदन मोड़ लो तो सरकारी स्कूल का फाटक दिखने लगता था। लड़का-लड़की छुट्टी के घंटे के बाद इसी स्कूल से लौट रहे थे। लड़की कुछ आगे चलती थी और लड़का उसके आठ कदम पीछे। उन दोनों के बीच वो आठ कदम की दूरी ख़ाली दिखती थी, पर ख़ाली थी नहीं। क्या था उस ख़ाली जगह में?

और क्या? दो अल्हड़ िफरदौस दिलों में पहले-पहले लिखे प्रेमपत्र में इज़हार की घबराहट और ज़वाब के इंतज़ार की बेचैनी?

प्रेम में थे लड़का-लड़की। प्रेमपत्रों में ख़्वाबों की डोरियाँ गूँथते थे लड़का-लड़की। जब ज़मीन भयंकर बारिश के पानी में डूब रही थी, तब भी प्रेमपत्र के इंतज़ार में थे लड़का-लड़की। जब रेगिस्तान में पीली रेतीली आँधियाँ उड़ रही थी, तब भी प्रेमपत्र लिख रहे थे लड़का-लड़की।

तब दुनिया के सारे प्रेमी ख़ब्ती थे। मासूम ख़ब्ती। अगर तुम भी कभी मासूम प्रेमी थे। तो इंशा जी पर अभरोसे का सवाल ही कहाँ?

—ये बातें झूठी बातें हैं, ये लोगों ने फैलाई हैं।

हाँ बेकल-बेकल रहता है, प्रीत में जिसे दिल हारा पर शाम से लेकर सुबह तलक यूँ कौन खड़े हैं आवारा।

देखा तुमने, देखा? चलते-चलते वह लड़की रुक गई। फिर देखो, वहीं दोनों सीताफलों के पेड़ों के बीच लड़की मिट्टी में बैठ गई। गुम हुई कोई चीज़ ढूँढ़ने का बहाना करती हुई। अचानक उसने बँधी हुई जूते की लेस खोली। फिर से लेस बाँधने लगी। लड़की अब जा चुकी है। जहाँ बैठी थी, वहाँ अब प्रेमपत्र रखा है। धीरे से लड़के ने आठ कदम पूरे किए और टुकुर-सा अपना पैर उस प्रेमपत्र के पास धर दिया। पास उगी जंगली चमेलियों की बेलें क्यों न मुस्काए इस मासूमियत पर? कहो तो? सारे प्रेमियों को लगता दुनिया को मूर्ख बनाना उसका अधिकार है। इधर सारी दुनिया को लगता है प्रेमियों पर नज़र रखना उनका कर्तव्य।

अब लड़का पगडंडी पर अकेला था। लड़की घर जा चुकी थी। स्कूल पीछे छूट चुका था। उस शाम पाँच बजे लड़के ने अपने जीवन का पहला प्रेमपत्र पढ़ा। गवाह थे वो दोनों सीताफल के पेड़। जिसके तने पर लड़के ने नुकीले पत्थर से लड़की के नाम का पहला अक्षर महीनों पहले ही गोद दिया था। उसने प्रेमपत्र को कई बार चूमा। प्रेमपत्र पढ़ते-पढ़ते कई बार आँखें मींची। कई बार वहाँ लिखी लाइनें दोहराते हुए होठ भींचे। नीली स्याही पे उँगुलियाँ फेरते हुए प्रेमपत्र यूँ समेटा जैसे लड़की का नाज़ुक दिल।

उन दिनों लड़का देर रात क्षेत्रफल के सवाल हल करते-करते अचानक रुक जाता। रुककर गणित की कॉपी के आख़िरी पन्ने पर प्रेमपत्र लिखता। उन दिनों ही लड़की पेन का ढक्कन चबाते-चबाते तकिया पेट के नीचे दबा लेती। पाँव हवा में झुलाती और प्रेमपत्र का ज़वाब लिखती।

उन दिनों लड़की किसी शादी में दूल्हा-दुल्हन को देखती तो तमाम रेशमी ख़याल प्रेमपत्र में बिखराकर लड़के तक पहुँचा देती।

उन दिनों ही तो नोहरे में पंगत जिमाने के बाद लड़का किसी टूटी दीवार के पीछे बैठा लड़की का भेजा प्रेमपत्र पढ़ता और पचासों बार चूमता।

ये वो वाले दिन थे—जब मछलियों को उड़ने वाले ख़्वाब देखने पर सख़्त पहरा था और चिड़िया के तैरने वाले ख़्वाब देखने पर कड़ी पाबंदी थी। ये वो वाले दिन थे—जब दुनिया प्रेमपत्रों से भरी पड़ी थी : तकियों के नीचे, किताबों के बीच, अलमारी के भीतर, चावल के डब्बों में, सूखी लड़कियों की ढेर के नीचे, गमले की मिट्टी में गढ़े और कपड़ों के तहों में हर जगह धड़कते हुए प्रेमपत्र धीमी साँस लेते थे। ये वो वाले दिन थे—जब एंटिना घूमाने के बहाने, कपड़े सुखाने के बहाने, पतंग उड़ाने के बहाने, बाल सुखाने के बहाने प्रेम बसंत मुहल्लों में खिलता था। ये वो वाले दिन थे—जब तमाम चुंगी-नाका, तमाम चेकपोस्ट, तमाम बेरिकेट्स के बावजूद छोटा भाई, प्रेमी का कोई दोस्त, माशूका की पक्की सहेली, अभी-अभी आई नई नवेली भाभी की हथेलियों से गुज़रते हुए हज़ारों प्रेमपत्र चुपके से दुनिया के प्रेमियों तक पहुँच रहे थे।

फिर एक दिन दुनिया के तमाम लड़का-लड़की बड़े हो गए। इतने बड़े की प्रेमपत्र छोटे रह गए। दुनिया के वे तमाम लड़का-लड़की जल्दी-जल्दी आगे बढ़ गए। इतने आगे बड़े की प्रेमपत्र पीछे रह गए।

—मैं फरवरी को प्रेम लिख रही हूँ

और तुम प्रेम को फरवरी समझना।

एक मुरझाए फूल ने दूसरे मुरझाए फूल को अभी-अभी एक शाइरी सुनाई। जो प्लास्टिक की पन्नीवाले फ़्लावर बुके में फँसे थे। लेकिन शाइरी सुनने के बाद फरवरी के मुँह से वाह! वाह! की कोई आवाज़ नहीं आई।

कैसे आती? फरवरी के सीने पर दुनियाभर की मुहब्बत का बाज़ार दौड़ रहा था। वज़्न था उसके सीने पर प्रेम को जि़ंदा रखने का। लड़का-लड़की के हाथों में लाल गुलाब थे, चॉकलेट थी, टेडीबियर थे, हाथों में हाथ थे। नाच था, गान था। मोमबत्तियों की रोशनियों में डिनर था, जाम था। उन दोनों के बीच नहीं था तो बस एक प्रेमपत्र।

अब भी ज़मीन भयंकर बारिश में डूब रही थी। अब भी रेगिस्तान में पीली रेतीली आँधियाँ चल रही थी। पर कहाँ चले गए थे प्रेमपत्र को चूमनेवाले लड़के? कहाँ थी प्रेमपत्र के जवाबों का इंतज़ार करती लड़कियाँ?

दुनिया के सारे प्रेमपत्र किताबों में, तकिए के नीचे, चावल के डिब्बों में, इँटों के नीचे, कपड़ों की तहों में अकेले रह गए थे। उन्हें ढूँढ़ने कभी कोई प्रेमी पीछे लौटकर क्यों नहीं जाता? हर साल प्रेमवाली फरवरी आती रहीं, प्रेमवाली फरवरी जाती रहीं। हर साल प्रेमवाली फरवरी कहती रहीं—

तेरे ख़त आज मैं गंगा में बहा आया हूँ।

आग बहते हुए पानी में लगा आया हूँ।

[राजेंद्र नाथ रहबर]

क्या इस वक्त प्रेमपत्र लिखता कोई प्रेमी सुन रहा है फऱवरी को?

(हिन्दवी से साभार)


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