पंडवानी की अमर स्वर-सम्राज्ञी तीजन बाई
बचपन से ही उन्हें अपने नाना बृजलाल पारधी से महाभारत की कथाएं सुनने का अवसर मिला।

- डुमन लाल ध्रुव
बचपन से ही उन्हें अपने नाना बृजलाल पारधी से महाभारत की कथाएं सुनने का अवसर मिला। नाना स्वयं पंडवानी के अच्छे जानकार थे। जब वे महाभारत के प्रसंग सुनाते तब बालिका तीजन उन्हें अत्यंत ध्यान से सुनती और उसी प्रकार दोहराने का प्रयास करती। धीरे-धीरे उन्हें अनेक प्रसंग कंठस्थ हो गए। तीजन बाई की प्रतिभा को देखकर प्रसिद्ध लोकगायक उमेंद सिंह देशमुख ने उन्हें पंडवानी की विधिवत शिक्षा दी।
छत्तीसगढ़ सांस्कृतिक धरोहरों से सम्पन्न प्रदेश है। यहां की लोककलाओं में पंथी, राऊत नाचा, सुवा, करमा, ददरिया, भरथरी और पंडवानी जैसी विधाओं ने जनजीवन को गहराई से प्रभावित किया है। इनमें पंडवानी केवल एक लोकगायन शैली नहीं बल्कि महाभारत की कथाओं को संगीत, अभिनय और भावाभिव्यक्ति के माध्यम से जीवंत कर देने वाली अद्भुत लोकनाट्य परंपरा है।
इस लोककला को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने का श्रेय जिस महान कलाकार को जाता है वह हैं तीजन बाई। उन्होंने अपने अद्भुत स्वर, सशक्त अभिनय, प्रभावशाली संवाद और विलक्षण मंच प्रस्तुति से पंडवानी को विश्वभर में प्रतिष्ठित किया। तीजन बाई का जीवन संघर्ष, साधना, आत्मविश्वास और निरंतर परिश्रम का प्रेरक उदाहरण है। अत्यंत साधारण परिवार में जन्म लेने के बावजूद उन्होंने अपनी प्रतिभा के बल पर विश्व के अनेक देशों में भारतीय लोकसंस्कृति का गौरव बढ़ाया।
''पंडवानी'' शब्द दो शब्दों - 'पांडव 'और' वाणी' से मिलकर बना है अर्थात पांडवों की कथा का गायन। पंडवानी की दो प्रमुख शैली है - वेदमती शैली और कापालिक शैली । छत्तीसगढ़ में लंबे समय तक कापालिक शैली में केवल पुरुष कलाकार ही प्रस्तुति देते थे क्योंकि इसे कठिन, ऊर्जावान और अभिनय प्रधान शैली माना जाता था। किंतु तीजन बाई ने इस परंपरा को बदल दिया। वे पहली महिला बनी जिन्होंने इस शैली को अपनाकर उसे नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया।
बचपन से ही उन्हें अपने नाना बृजलाल पारधी से महाभारत की कथाएं सुनने का अवसर मिला। नाना स्वयं पंडवानी के अच्छे जानकार थे। जब वे महाभारत के प्रसंग सुनाते तब बालिका तीजन उन्हें अत्यंत ध्यान से सुनती और उसी प्रकार दोहराने का प्रयास करती। धीरे-धीरे उन्हें अनेक प्रसंग कंठस्थ हो गए। तीजन बाई की प्रतिभा को देखकर प्रसिद्ध लोकगायक उमेंद सिंह देशमुख ने उन्हें पंडवानी की विधिवत शिक्षा दी। उन्होंने केवल गायन ही नहीं मंच संचालन, संवाद, अभिनय, स्वर, लय और भावाभिव्यक्ति की बारीकियां भी सिखाई। लगभग तेरह वर्ष की आयु में तीजन बाई ने पहली बार सार्वजनिक मंच पर पंडवानी प्रस्तुत की। यह प्रस्तुति उनके जीवन का निर्णायक मोड़ सिद्ध हुई।
तीजन बाई मानती थीं कि कलाकार का सबसे बड़ा धन उसका निरंतर अभ्यास है। वे प्रतिदिन घंटों तक रियाज करती थी। महाभारत के विभिन्न प्रसंगों का अभ्यास, स्वर-साधना, संवादों का अभ्यास और मंच संचालन ये सब उनके दैनिक जीवन का हिस्सा थे।
तीजन बाई के जीवन में सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब प्रसिद्ध रंगकर्मी हबीब तनवीर ने उनकी प्रस्तुति देखी। वे उनकी असाधारण प्रतिभा से अत्यंत प्रभावित हुए। उन्होंने तीजन बाई को बड़े मंचों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। राष्ट्रीय सफलता के बाद तीजन बाई ने अनेक देशों की यात्राएं की। उन्होंने एशिया, यूरोप, अमेरिका और अन्य देशों में भारतीय लोकसंस्कृति का प्रतिनिधित्व किया। भले ही अधिकांश विदेशी दर्शक हिन्दी या छत्तीसगढ़ी भाषा नहीं समझते थे लेकिन उनके अभिनय, भाव-भंगिमा और स्वर की शक्ति भाषा की सीमाओं से कहीं आगे पहुंच जाती थी। दर्शक कथा का भाव सहज ही समझ लेते थे। उनकी प्रस्तुतियों ने यह सिद्ध कर दिया कि सच्ची कला किसी अनुवाद की मोहताज नहीं होती। तीजन बाई केवल महान कलाकार ही नहीं थी महिला सशक्तिकरण की प्रेरक मिसाल भी थी। उन्होंने उस समय सामाजिक रूढ़ियों को चुनौती दी जब महिलाओं के लिए सार्वजनिक मंचों पर अभिनय करना सहज नहीं माना जाता था। उन्होंने अपने जीवन से यह संदेश दिया कि यदि प्रतिभा, परिश्रम और आत्मविश्वास हो तो कोई भी बाधा सफलता के मार्ग में स्थायी नहीं बन सकती। आज अनेक युवा महिला कलाकार पंडवानी और अन्य लोककलाओं में जो सम्मानपूर्वक कार्य कर रही हैं उसमें तीजन बाई के संघर्ष और साहस का महत्वपूर्ण योगदान है।
जीवन भर उन्होंने लोककला को केवल पेशा नहीं माना अपनी साधना समझा। वे कहती थी कि पंडवानी केवल महाभारत की कथा नहीं जीवन के आदर्शों, धर्म, न्याय, साहस और मानवता का संदेश देने वाली परंपरा है।
तीजन बाई की सबसे बड़ी विशेषता उनकी ओजपूर्ण और प्रभावशाली आवाज थी। उनकी वाणी में वीर रस का उत्साह, करुण रस की संवेदना, भक्ति का समर्पण और श्रृंगार की कोमलता सभी भाव सहज रुप से प्रकट होते थे। वे महाभारत के पात्रों के अनुसार अपने स्वर और भाव बदल लेती थी। जब वे भीम का चरित्र प्रस्तुत करती तो उनकी आवाज में शक्ति और गर्जना सुनाई देती थी। अर्जुन के प्रसंगों में वीरता और आत्मविश्वास झलकता था। द्रौपदी के चीरहरण का वर्णन करते समय उनकी करुण पुकार श्रोताओं की आंखें नम कर देती थी जबकि श्रीकृष्ण के संवादों में गंभीरता, करुणा और आध्यात्मिक तेज का अद्भुत समन्वय दिखाई देता था। तीजन बाई का अभिनय उनकी गायकी जितना ही प्रभावशाली था। वे मंच पर किसी अभिनेता की तरह प्रत्येक पात्र को जीवंत कर देती थी।
उनकी प्रस्तुतियों ने अनेक विदेशी विद्वानों, कलाकारों और शोधकर्ताओं को भारतीय लोककला का अध्ययन करने के लिए प्रेरित किया।
तीजन बाई ने अनेक युवा कलाकारों को पंडवानी सीखने और लोककलाओं के संरक्षण के लिए प्रेरित किया। वे हमेशा कहती थी कि कला तभी जीवित रहती है जब नई पीढ़ी उसे अपनाती है। उन्होंने अनेक शिष्यों को प्रशिक्षण दिया और मंच पर अवसर भी उपलब्ध कराए।
तीजन बाई का जीवन हमें यह सिखाता है कि प्रतिभा, परिश्रम, अनुशासन और आत्मविश्वास के बल पर साधारण परिस्थितियों से उठकर भी विश्वभर में सम्मान प्राप्त किया जा सकता है।


