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दहलीज़

चौमासा बीतने को था। सारी धरती भूरी हो चुकी थी। आजकल पूरे दिन ट्रैक्टरों से जुड़े थ्रेशर सड़कों पर दौड़ते फिरते थे।

दहलीज़
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— अर्जुन सिंह राठौर

चौमासा बीतने को था। सारी धरती भूरी हो चुकी थी। आजकल पूरे दिन ट्रैक्टरों से जुड़े थ्रेशर सड़कों पर दौड़ते फिरते थे। हर दिन यहाँ किसी न किसी के धान से भरी ट्राली आती और काशी रेगर बैठा देखता। जिस घर में भी ट्रॉली पहुँचती, उस घर में एकाएक खुशहाली छा जाती। औरतें ट्रॉली को घेर लेतीं, और जब आदमी बाजरे के बोरे अपनी कमर पर लादकर चलते, तो बच्चे भी पिता के पीछे ऐसे चलते मानो आधा भार उन पर हो। आसपास के लोग पूछताछ में लग जाते। भीड़ से आवाज़ आती— 'बाजरा तो पक्का हुआ दिख रहा है पन्ना! कितने क्विंटल हुआ? '

पन्ना, बाजरे के बोरे पर हाथ मारते हुए कहता— 'बीघे का दो क्विंटल हुआ है लंगड़े काका। '

और ऐसा कहते हुए पन्ना बोरा अपनी पीठ पर ऐसे लादता, मानो रुई का हो।

तिल के बोरों को तो वह बड़ी एहतियात से उतारता। तिल की फसल कितनी भी अच्छी क्यों न हो, बोरों में पहुँचते-पहुँचते आधी हो ही जाती थी। काशी ने उधर से नज़र हटाकर पास पड़ा बंडल उठाया।

काशी ने बीड़ी सुलगा ली और जोड़ने लगा— इस बार बारिश अच्छी हुई थी, बीघे का दो क्विंटल बाजरा पक्का था। तीस बीघा खेत था, साठ क्विंटल बाजरा उपजता।

'पर... भगवान करे इनके पूत मरे... .. इनके वंश पर लांछन लगे। '

जब मोहल्ले वालों को कोसता थक गया, तो अपने कमरे में झाड़ू निकालने लगा। थोड़ी देर शांत रहकर उसने फिर बड़बड़ाना शुरू कर दिया— 'क्या महल था, आज कमरा बचा है... ऐसा हरामज़ादा भाई किसी को न दे... हरामखोर को मैंने अपने हाथों से पाला था और आज देखो...... भगवान सब जानता है।'

और ऐसा कहते हुए झाड़ू रखकर वापस दहलीज़ पर बैठ गया। उसकी उम्र कोई अस्सी साल थी। चेहरा बिल्कुल काला, समय की मार और बुढ़ापे से सारी चमड़ी लटक गई थी। आँखें बेशुमार मैली, गोले सफेद हो चले थे। दाँतों के नाम पर तीन दाढ़ रही थीं। कानों में उसकी माँ की पहनाई हुई लोहे की मोटी बालियाँ आज भी थीं। सर पर, कानों के करीब, कुछ सफेद बाल बचे थे। शरीर तो रहा ही नहीं था, छोटे से कद पर अब नामभर मांस था। कपड़े के नाम पर एक फटी, मैली धोती, जो उसके गू-मूत से लथपथ थी।

कभी-कभी तो वह दहलीज़ पर नंगा ही पड़ा रहता। जब किसी मोहल्ले वाले की नज़र उस पर पड़ती, तो कुछ न कुछ ऊपर डाल जाता। सूरज ढलने को था। बीड़ी का आख़िरी कश लेते हुए वो खड़ा हुआ और दीवार के सहारे पन्ना के घर की तर$फ चल दिया।

गेट पर पहुँचकर उसने चिल्लाना शुरू किया—

'ए पन्ना! बाहर निकल! भगवान करे तेरा खानदान खत्म हो जाए, जो मेरा तिल-बाजरा खाए। उसके यहाँ खाने वाले ही न पैदा हों! अगर ऊपर वाले से डरता है, तो मेरा तिल-बाजरा दे दे! '

वह चिल्लाता रहा। उसके तन से बेशुमार बास आती थी, इसीलिए कोई भी उसके पास नहीं आता था। आज भी ऐसा ही हुआ। जब उसका गला सूख गया, तो वह अपने कमरे की तर$फ चल दिया। यह कमरा नहीं, उसकी कब्र थी, जो बंद होने के लिए तत्पर थी।

उसने घड़े से प्लास्टिक की आधी कटी बोतल से पानी निकाला और पानी पीकर बाकी बचा पानी अपने पिछवाड़े पर डाल लिया, और फिर से दहलीज़ पर जाकर बैठ गया। रोते हुए बोला—

'राम करे तेरे माँ-बाप मरे... तूने मेरे साथ अच्छा नहीं किया... तुझे इस दुनिया में कहीं चैन न पड़े..... ला इधर दे मेरा तिल-बाजरा! '

वह थोड़ी देर खामोश रहा और फिर दहलीज़ कुरेदने लगा।

रात हो चली थी। साफ आसमान था, जिसमें तारों की मह$िफल जमी थी। काशी ने दो दिन से खाना नहीं खाया था। दरअसल, पहले तो लोग उसे कुछ न कुछ दे जाते थे, पर पिछले दो दिन से जो उसे गू-मूत का भी होश न रहा, तो कोई उसके पास नहीं आया।

माँगा उसने आज तक नहीं। जाने क्या बीमारी थी — कोई कुछ देता तो खा लेता, नहीं तो खामोश बैठा रहता। पर कभी किसी से नहीं कहा कि 'मुझे खाने को दो। '

आज भी वो बैठा तारों को देख रहा था। गीली धोती ने जब उसे ज़्यादा परेशान किया, तो उसने उसे उतार फेंका। अब निर्मल रात में उसका नंगा बदन सुकून की साँस ले रहा था।

अचानक उसकी चेतना लौट आई। उसे अपनी माँ की गोद की गर्माहट महसूस हुई। उसने अपना सिर दीवार से टिका दिया और आराम से सो गया।

आज वह इंसान था — बिल्कुल पवित्र, नंगा इंसान।




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