स्त्री के दैहिक शोषण की दर्द भरी दास्तान
हिन्दी कथा साहित्य में अनवर सुहैल की शिनाख़्त अपने उपन्यास 'पहचान' की वजह से है।

उपन्यास : मेरे दु:ख की दवा करे कोई, लेखक : अनवर सुहैल, प्रकाशक : न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन, बुद्ध नगर इंद्रपुरी, नई दिल्ली, पेज़ संख्या : 128, मूल्य : 175
- ज़ाहिद ख़ान
हिन्दी कथा साहित्य में अनवर सुहैल की शिनाख़्त अपने उपन्यास 'पहचान' की वजह से है। जबकि वे एक संवेदनशील और वैचारिक कवि, दृष्टिसम्पन्न कथाकार, उपन्यासकार और सम्पादक भी हैं। उनके पॉंच कविता संग्रह एवं पॉंच कहानी संग्रह आ चुके हैं, तो वे साहित्यिक लघु पत्रिका 'संकेत' के सम्पादक हैं। बहरहाल, 'पहचान' साल 2009 में 'राजकमल प्रकाशन' से प्रकाशित हुआ था, जिसकी उस व$क्त ख़ूब चर्चा हुई। तमाम जगह इसकी समीक्षाएं आईं। लेकिन अनवर सुहैल उपन्यास लेखन का वह सिलसिला $कायम नहीं कर पाए। एक लंबे अंतराल के बाद उनका दूसरा उपन्यास 'मेरे दु:ख की दवा करे कोई' आया है। दरअसल, यह उपन्यास इससे पहले 'परिन्दे' पत्रिका में 'सलीमा' नाम से धारावाहिक रूप से प्रकाशित हो चुका है। अनवर सुहैल की कहानियॉं देखें या फिर उपन्यास दोनों ही विधाओं के कथानक और किरदार मध्य, निम्न मध्यवर्गीय मुस्लिम समुदाय से आते हैं। उन्होंने अपने कथा—साहित्य में मुस्लिम समाज में व्याप्त जातिवाद पर निर्ममता से $कलम चलाई है। अपने ही समाज के प्रति वे औरों से कहीं ज़्यादा आलोचनात्मक हैं। और यही एक सही नज़रिया है। साम्प्रदायिकता के सवालों की भी वह लगातार पड़ताल करते रहते हैं। अनवर सुहैल के साहित्य को $गौर से पढ़ें, तो पता चलता है कि मुस्लिम समुदाय को उन्होंने का$फी $करीब से देखा है। कथाकार शानी की तरह वे भी यह महसूस करते हैं कि लेखक को अपनी रचना का कथानक और किरदार अपने ख़ुद के समुदाय या आसपास से ही उठाने चाहिए। तभी उनमें एक प्रमाणिकता आएगी। ज़ाहिर है कि अनवर सुहैल का कथा साहित्य पढ़कर इसी तरह का एहसास होता है। शब्दों के रंगारंग जाल बुनने से इतर वे अपने ही समाज के यथार्थ का गहन चित्रण करते हैं। और आज यही ज़रूरी भी है।
अनवर सुहैल का 'पहचान' जहॉं नायक—प्रधान उपन्यास है, तो वहीं 'मेरे दु:ख की दवा करे कोईÓ नायिका—प्रधान। 'सलीमा' उपन्यास की अहम किरदार है। उपन्यास 'सलीमा' की जि़ंदगी के रंज—ओ—$गम की दर्द भरी दास्तान है। 'मेरे दु:ख की दवा करे कोई' में निम्न मध्यवर्गीय मुस्लिम समाज का तो चित्रण है ही, लेखक ने इसमें स्त्री के दैहिक शोषण को भी केन्द्र में रखा है। 'सलीमाÓ जानते—बूझते उस आग में प्रवेश करती है, जो उसे जलाकर राख कर देती है। पारिवारिक हालात और आर्थिक मजबूरियॉं उसे उस राह पर ले जाकर खड़ा कर देती है, जहॉं से वह अपने जिस्म को हथियार बनकार निजात का रास्ता ढूॅंढती है। उपन्यास का अंत बेहद हृदय विदारक है। लाख कोशिशों के बाद भी उसकी छोटी बहन 'सुरैया' उसी चंगुल में फॅंस जाती है, जिसमें वह पहले ही अपनी जि़न्दगी तबाह कर चुकी है। एक लिहाज़ से यह एक नकारात्मक अंत है। उपन्यास पाठकों को सोचने के लिए कुछ सवाल छोड़ जाता है। ऐसे सवाल, जो एक संवेदनशील पाठक को परेशान और बेचैन कर सकते हैं। 'पहचान' या 'मेरे दु:ख की दवा करे कोईÓ दोनों का आकार यानी पेज संख्या अगर देखें, तो यह दोनों ही नॉवेला या नॉवलेट की कैटेगरी में आते हैं। जबकि इन उपन्यासों के कॉन्टेंट के लिहाज़ से इनका और भी अधिक विस्तार हो सकता था। उपन्यास 'पहचान' जहॉं देश में व्याप्त साम्प्रदायिकता की समस्या से सीधे—सीधे मुठभेड़ करता है, तो वहीं लेखक ने इसमें कई जगह बेबाक राजनीतिक टिप्पणियॉं भी की हैं। लेकिन 'मेरे दु:ख की दवा करे कोई' तक आते—आते इन सवालों के सुर कुछ धीमे हो गए हैं। सियासी टिप्पणियों से भी लेखक ने अपने आपको बचाने की कोशिश की है। जबकि साम्प्रदायिकता की समस्या आज पहले से भी कहीं ज़्यादा भयावह हो गई है।
Óमेरे दु:ख की दवा करे कोई' में मूल कथानक से इतर मुस्लिम आतंकवाद का भी एक जगह जि़क्र आता है। उपन्यासकार ने उस चरित्र और वातावरण को कुछ इस तरह गढ़ा है कि लगता है कि उस किरदार का ब्रेनवाश हुआ है और उसमें मज़हबी कट्टरता के रुझान बढ़ रहे हैं। यकायक पुलिस उसे गिरफ़्तार कर ले जाती है। लेकिन जिस तरह से $कस्बे वाले एकजुट होकर 'यूसु$फ'
की गिरफ़्तारी का विरोध और उसकी रिहाई के लिए मुहिम चलाते हैं, वह हैरत में डालता है।
जबकि देश में आज जो माहौल है, वह इसके उलट है। किसी शख़्स पर इल्ज़ाम लगते ही न सि$र्फ उसके समाज वाले उससे $फौरन किनारा कर लेते हैं, बल्कि मीडिया भी उसका मीडिया ट्रायल कर उसे ख़लनायक बना देता है। उसे अपराधी घोषित कर देता है। ऐसा लगता है कि यथार्थ से इतर लेखक ने यहॉं कुछ बैलेंस करने की कोशिश की है ? या वे यथार्थ से मुॅंह चुरा रहे हैं ? बावजूद इसके 'मेरे दु:ख की दवा करे कोई' में जगह—जगह यथार्थवाद के दर्शन होते हैं। कथानक से लेकर किरदार भी यथार्थवादी हैं। भाषा कथानक के अनुरूप है। लेकिन शिल्पगत दृष्टि से 'मेरे दु:ख की दवा करे कोई' में कहीं कोई प्रयोग नहीं दिखाई देता। सलीमा को छोड़ दें, तो उपन्यास के बा$की किरदार कमज़ोर नज़र आते हैं। उपन्यासकार ने इन किरदारों पर ज़्यादा ध्यान नहीं दिया है। अगर वे इस पर तवज्जोह देते, तो उपन्यास और भी अधिक प्रभावशाली साबित होता। कुल मिलाकर 'मेरे दु:ख की दवा करे कोई' समग्र रूप से पाठकों पर कोई ज़बर्दस्त असर नहीं छोड़ता। और यही उपन्यास की सबसे बड़ी ख़ामी है।


