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साधारण की असाधारणता

स्त्रियों में किट्टी पार्टी में शामिल आधुनिकाओं की व्यथा है . घड़ी में चार बजते ही बेचैन, चिंतित, भय और आशंका से भर जाने वाली ये चमकती-दमकती आधुनिकाएं अपने माथे पर चोट के धुंधले निशान के बारे में कोई बात नहीं करतीं.

साधारण की असाधारणता
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स्त्रियों में किट्टी पार्टी में शामिल आधुनिकाओं की व्यथा है . घड़ी में चार बजते ही बेचैन, चिंतित, भय और आशंका से भर जाने वाली ये चमकती-दमकती आधुनिकाएं अपने माथे पर चोट के धुंधले निशान के बारे में कोई बात नहीं करतीं. कैसा सुन्दर सपना था स्त्री का, कैसी विकट सचाई उसके सामने आई ! सद्य-प्रसूता थी, काम में जुटी, श्रम करती जिस मजदूर स्त्री का गहना लाज ही था उसी के साथ अन्याय हुआ. लांछित-प्रताड़ित हो घर बाहर वही की गई. बिलौटे के पंजे से छूटी गौरैया जैसी स्त्री ही समाज की दृष्टि में सदोष साबित हुई. इस मानसिकता का कोई उपचार नहीं है क्या ? भारतीय वैवाहिक जीवन खुलापन क्यों नहीं देता, दमघोटू क्यों हो जाता है? इन स्त्री केन्द्रित कविताओं में ये प्रश्न ध्वनित-प्रतिध्वनित होते हैं.

— विजया सती

हिन्दी काव्य जगत में विनोद पदरज की पहचान साधारण की असाधारणता का मर्मस्पर्शी उद्घाटन करने वाले कवि के रूप में गहरी होती जाती है, कहना गलत न होगा.

उनका नवीनतम संग्रह 'एक आँख कौंधती है' वेरा प्रकाशन से 2024 में आया है, यह उनकी स्त्री केन्द्रित कविताओं का संचयन है, जिसमें 150 पृष्ठ हैं, मूल्य 200 रूपए.

घर-परिवार और अंचल की स्त्रियों को समर्पित यह संकलन स्त्रियों के विषय में है. इनमें वे स्त्रियां भी हैं जो हंसते-हंसते चुप हो गई क्योंकि आदमी आ गए. आदमी की एक स्त्री के जीवन में यह कैसी उपस्थिति है? यह संचयन इस प्रासंगिक प्रश्न के साथ उपस्थित है.

स्त्री केन्द्रित ये कविताएं कवि के उन घनीभूत संवेदनों को अवरेखित करती हैं, जो स्त्रियों के प्रति बर्ताव के सदियों पुराने चित्र के उस रंग से विनिर्मित हैं जो आज भी शोख है. आज के दौर में स्त्री-विमर्श की राह विस्तारित करता यह संचयन जीवन की व्यापक विस्तृति में, स्त्री जीवन के उन पक्षों को तन्मयता से अंकित करता है जिन्हें कवि की आँख देखती है.

ये उन वंचिताओं के गीत हैं जो समाज, परिवार, परिस्थिति की मार से स्त्री जीवन को एक सांचें में ढालने को तत्पर वातावरण को परिभाषित करने की कोशिश करते हैं. स्त्री रूप में जन्म लेते ही बेरोकटोक बहुत कुछ अनिवार्यत: स्त्री जीवन में जुड़ता चला जाता है. ऐसा घिरा-बंधा जन्म क्यों मिला स्त्री को? उसने बहुत अधिक नहीं चाहा, उसे मिला कितना कम ! और जो मिला वह भी काट-छांट कर ! स्त्री के अस्तित्व का नकार जहां सर्वोपरि हो, उसका मरना कोई बड़ी बात न हो, जीना भी उतनी ही छोटी बात हो.. ऐसी कठोरताओं को बेलाग दिखाती इन कविताओं में कवि न केवल स्त्री के प्रति द्रवित होता है, बल्कि उसके व्यवहार की सूक्ष्म पड़ताल करते हुए यह प्रश्न सम्मुख रखता है कि वे जो चंचल हिरणियां थी, गिलहरी और खरगोश थी, क्रमश: ऐसी शिथिल क्यों होती चली गई? उनका आखेट किसने किया?

प्रश्न भर नहीं, अपने भीतर झाँक लेने का मूक किन्तु मारक आग्रह प्रस्तावित करती ये कविताएँ उल्लेखनीय इसलिए हैं कि उस जीवन के प्रति सम्मान और सद्भावना का बोध जगाती हैं.

क्या वे स्त्रियां उल्लेख योग्य नहीं हैं जो प्यार की तलाश में धरा पर आई, फिर प्यार के बिना विवाह में रही, गृहस्थी निबाही, अब अस्सी और पिचहत्तर की उम्र में भी जो शर्माना-मुस्कुराना नहीं भूली? कवि उनके बेआवाज़ रोने को सुन पाता है, उनका डबडबाई आँखों से पीहर की गैल को देर तक दूर तक देखना देख पाता है. अस्तित्व की बुनियादी शर्त - प्रश्न कर सकना, अपने ढंग का पहनना-सोना उनके भाग्य में क्यों नहीं - यह प्रश्न पूछ पाता है. उनके जीवन में तमाम अस्वीकृतियों के साथ जीना-मरना-खपना ही क्यों बदा है? विवाह के बाद का जीवन कमतर कैसे हो उठता है? - ऐसे कई प्रश्न इन कविताओं की राह में बिखरे पड़े हैं.

इन कविताओं के परिसर में स्त्री कई रूपों में विचरण करती है - बेटी, बहन, युवती, पत्नी, मां, दादी, वृद्धा.

बेटियों के होने में दूसरी बेटी के जन्म का दु:ख है, तीसरी बेटी तो परिवार की फोटो में भी नहीं है.बेटियां जो अपनी समस्या पिता को न कहना ही उचित समझती हैं, दु:ख को इस सीमा तक सहती हैं कि पिता का अ$फसोस बन जाती हैं !

इनमें वह बहन है जिसके वर्तमान पर विगत हावी है, यहां वे उदास बहनें भी हैं जो न जाने किन स्मृतियों में खो जाती हैं. स्त्री के मातृत्व बल और निष्ठा को कवि ने पहचाना. किसी भी रूप में, कोई चरित्र जी रही हो स्त्री, उसका मातृत्व कभी तिरोहित नहीं होता. कवि मां का रोना, मां का सोना सब देखता है.

इन्हीं कविताओं में, भीतर जिजीविषा जल लिए दादी है, जिनके लिए जीवन फूलों का बगीचा नहीं रहा होगा, जो धधकते रेगिस्तान में नंगे पैर चली होंगी, फिर भी जीवन को मुड़-मुड़कर नहीं देखती ..आगे देखती है.

स्त्रियों में किट्टी पार्टी में शामिल आधुनिकाओं की व्यथा है . घड़ी में चार बजते ही बेचैन, चिंतित, भय और आशंका से भर जाने वाली ये चमकती-दमकती आधुनिकाएं अपने माथे पर चोट के धुंधले निशान के बारे में कोई बात नहीं करतीं. कैसा सुन्दर सपना था स्त्री का, कैसी विकट सचाई उसके सामने आई ! सद्य-प्रसूता थी, काम में जुटी, श्रम करती जिस मजदूर स्त्री का गहना लाज ही था उसी के साथ अन्याय हुआ. लांछित-प्रताड़ित हो घर बाहर वही की गई. बिलौटे के पंजे से छूटी गौरैया जैसी स्त्री ही समाज की दृष्टि में सदोष साबित हुई. इस मानसिकता का कोई उपचार नहीं है क्या ? भारतीय वैवाहिक जीवन खुलापन क्यों नहीं देता, दमघोटू क्यों हो जाता है? इन स्त्री केन्द्रित कविताओं में ये प्रश्न ध्वनित-प्रतिध्वनित होते हैं.

वे औरतें जो उत्सव में दूसरी ही हो जाती हैं, कवि उनके भीतर की खो गई लड़कियों को रेखांकित करके रुक नहीं जाता. उसका कारण भी संकेतित करता है. इनकी आत्मा की कलियों का न खिलना कवि के लिए दुखदायक है. इसलिए वह अनेकश: स्वयं को प्रश्नांकित करता है, स्वयं को उस पुरुष की भूमिका में रखकर जो बेटियों को मां से रात भर बतियाते देख, उदास होकर कम से कम सोचता तो है ..पत्नी से बातें किए बरस बीते, उनके साथ खिलखिलाए युग बीते !

अनेक प्रश्नों से जूझता कवि अंतत: तय करता है कि अब स्त्री ही इन वर्जनाओं को तोड़े. ऐसी स्त्रियों की पहचान कर वह रचता है - मर्दों के घाट पर प्रसन्न मना नहाती वृद्धा को, पति के चले जाने के बाद - 'अपने मन का सा जीवन यही जिया मैंनेÓ कहने वाली स्त्री को, 'तोकूं छोड़ सकूं हूँ पण नाचबो न्ह छोडूं' कहने वाली वृद्धा को, आंधी में झाड़ू निकालने वाली स्त्रियां को, तनी हुई रस्सी पर चलती हुई स्त्री को, खुद को जानती स्त्री को.

स्त्री जीवन जैसे सम्बन्धों की अलगनी पर टंगा है, किन्तु कवि स्त्री को जानने के लिए स्त्री के पास स्त्री की तरह जाता है।

कवि समर्पित पत्नी, युवा, प्रौढ़ा, वृद्धा, असुंदर.. इन तमाम स्त्रियों के कर्म के सौन्दर्य को प्रस्तावित करता है. पति के साथ कार्यरत स्त्री सुन्दर है, बच्ची की जन्मदात्री और यौवन की दहलीज़ से दूर ठिठक कर खड़ी स्त्री जिसकी देह और मन निरा कच्चा है - सुन्दर है. स्त्री की पहचान संबंध सूचक संज्ञाओं से अलग भी है, बेटी का मां के पास आना, दु:ख में डूबी, आंसुओं में भीगी, हंसी में खिली स्त्री का स्त्री के पास आना भी है.

हमेशा की तरह लोक जीवन से ऊर्जा ग्रहण करती इन कविताओं की भाषा लोक के विधान को, रीति-रिवाज को, कथन भंगिमा को सहज आत्मसात कर लेती है. स्थानीयता समेटकर चलने वाले शब्द-संयोजन प्रभावी हैं - भंगिमा को ज्यों का त्यों धर देने में सक्षम!

सदियों पुराने चित्र को कुछ जुदा ढंग से बनाना चाहने की कवि की यह कोशिश सार्थक है. स्त्री-पुरुष का हंसना- खिलखिलाना, सुख-दु:ख बतियाना, यद्यपि सदा सफल नहीं होता, किन्तु एक प्रयास तो है, सर्वथा प्रासंगिक ! इन स्त्री केन्द्रित कविताओं में कवि मन के सघन-सच्चे सरोकार मिलते हैं. जग जीवन के ज्वलंत मुद्दों को टोहती इन कविताओं का कविता की दुनिया में पुन: स्वागत !


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