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कथेतर की ममता

हिंदी की लोकप्रिय कथाकार ममता कालिया को साहित्य अकादेमी ने वर्ष 2025 का पुरस्कार घोषित किया है

कथेतर की ममता
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  • पल्लव

'जीते जी इलाहाबाद' इस रचना शृंखला की उच्चतम परिणति है जहां इलाहाबाद जैसे सांस्कृतिक शहर के चरित्र को लिखते हुए इसके भीतर वे अपने और अपने प्रियजनों के व्यक्तित्व की तलाश भी करती हैं। हिंदी में इस तरह की कृतियां बहुत अधिक नहीं मिलतीं और नयी शताब्दी में साहित्य की विधाओं में आ रहे बदलावों तथा अन्तर्क्रियाओं का भी श्रेष्ठ उदाहरण ममता जी का कथेतर लेखन बन गया है।

हिंदी की लोकप्रिय कथाकार ममता कालिया को साहित्य अकादेमी ने वर्ष 2025 का पुरस्कार घोषित किया है। उनकी संस्मरण पुस्तक 'जीते जी इलाहाबाद' को अकादेमी का यह चर्चित पुरस्कार दिया जाएगा। हिंदी संसार में उनकी ख्याति एक सफल कहानीकार और उपन्यासकार के रूप में है जिन्होंने बेघर, नरक-दर-नरक, दौड़ और दुक्खम सुक्खम जैसे उपन्यास लिखे तो उनकी कहानियों का सिलसिला 1963 से प्रारम्भ हुआ था और तब से उनका साहित्य सृजन निरंतर है। उनके लेखन की मुख्य विशेषता यह है कि वे भारतीय मध्यवर्ग के सामान्य जनजीवन को अत्यंत कुशलता से अपने लेखन में चित्रित करती हैं। वे किसी विचारधारा या वाद से आक्रान्त होकर नहीं लिखतीं बल्कि खांटी जीवनानुभवों को प्रगतिशील दृष्टि से लेखन में जगह देती हैं। आश्चर्य नहीं कि उनकी दो पुस्तकों के शीर्षक थोड़ा-सा प्रगतिशील और खांटी घरेलू औरत उनके लेखन की प्रतिज्ञाओं को भी दर्शाते हैं। पेशे से उच्च शिक्षा में अंग्रेजी की शिक्षक रहीं ममता जी को दिल्ली, मुंबई और इलाहाबाद में काम करने के अनुभव हैं। वे वर्धा के महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय की अंग्रेजी पत्रिका 'हिंदी' की संपादक रहीं और कोलकाता की भारतीय भाषा परिषद् की अध्यक्ष भी रहीं। विपुल मात्रा में लेखन करने वाली ममता जी के गद्य को सदैव रोचकता, हार्दिकता और तरलता के लिए भी प्रशंसा मिली।

उनकी जिस कृति को अकादेमी ने पुरस्कार के लिए चुना है वह संस्मरण की किताब है। ममता जी इससे पहले कितने शहरों में कितनी बार, अंदाज़-ए-बयां उर्फ़ रवि कथा, कल परसों के बरसों, सफ़र में हमसफ़र जैसी किताबें भी लिख चुकी हैं जो कथेतर विधाओं की ही कृतियां हैं। कथेतर यानी कथा जैसी वे गद्य विधाएं जो कथा तो नहीं हैं लेकिन कथा जैसा आस्वाद देती हैं। इनमें से 'कितने शहरों में कितनी बार' को विशेष रूप से आलोचना की सराहना मिली जो पहले तद्भव पत्रिका में धारावाहिक रूप से प्रकाशित हुई और जिसने एक तरह से नयी विधा का सूत्रपात किया। यह विधा है शहरनामा। ऐसा नहीं है कि इसमें वे स्मृतियों की पुनर्रचना नहीं कर रही थीं बल्कि कोई चाहे तो इसे भी संस्मरण की ही कृति मान सकता है लेकिन यहां ममता जी का जोर उस शहर के चरित्र को ध्यान में रखकर अपने अनुभव लिखने पर रहा। शहरों के व्यक्तित्व की यह खोज ममता कालिया की इस किताब कथेतर विधाओं में सर्वथा अलग स्वर देती है। इस स्वर में शहर के बड़े व्यक्तित्व में अपनी जगह खोजते-संभालते खुद लेखक को देखना रोचक है। यहां एक और बात समझ लेनी चाहिए वह यह कि प्रचलित विधाओं के बरक्स इन नयी नयी बन रही विधाओं के रूपाकार खोजने की जरूरत इसलिए नहीं है कि एक नयी विधा के नामकरण का सुख साहित्य के हिस्से आ जाएगा बल्कि इससे दिनोंदिन जटिल होते जा रहे जीवन को देखने-समझने के नए आयाम इस रास्ते में कहीं मिल सकने की उम्मीद बंधती है। तबादलों के साथ जीवन में आते जाते नये शहर मनुष्य के बुनियादी व्यक्तित्व पर कैसा असर डालते हैं? मनुष्य को शहर के साथ जोड़कर उसके व्यक्तित्व को समझने का आग्रह अब कितना सही रह जाएगा?

'जीते जी इलाहाबाद' इस रचना शृंखला की उच्चतम परिणति है जहां इलाहाबाद जैसे सांस्कृतिक शहर के चरित्र को लिखते हुए इसके भीतर वे अपने और अपने प्रियजनों के व्यक्तित्व की तलाश भी करती हैं। हिंदी में इस तरह की कृतियां बहुत अधिक नहीं मिलतीं और नयी शताब्दी में साहित्य की विधाओं में आ रहे बदलावों तथा अन्तर्क्रियाओं का भी श्रेष्ठ उदाहरण ममता जी का कथेतर लेखन बन गया है। पाठकों में कथेतर के आकर्षण का मुख्य कारण है जीवन यथार्थ की अंतरंग प्रस्तुति और उसमें कथा जैसी सूत्रबद्धता या पठनीयता। हिंदी गद्य के इतिहास में संस्मरण, रेखाचित्र और जीवनियां पुरानी विधाएं हैं लेकिन नयी शताब्दी में इनका चोला पूरी तरह बदला हुआ नज़र आता है। अब यहां अश्रु विगलित श्रद्धांजलियां नहीं होतीं और न पुरखों का अतिरिक्त महिमामंडन। हंस के संपादक और प्रसिद्ध कथाकार राजेंद्र यादव ने जोर देकर कहा था, वे देवता नहीं हैं। इस दृष्टि से कथेतर का यह नया दौर साहित्य के जनतांत्रीकरण का भी है जिसमें ममता जी जैसे लेखकों ने विगत की पुनर्रचना जीवन की वास्तविकताओं और जीवंत स्पर्शों के साथ की है। 2020 में प्रकाशित उनकी कृति 'अंदाज-ए-बयां उर्फ रवि कथा' को भी याद कर लेना चाहिए जो उनके दिवंगत पति और मित्र के बहाने एक युग का स्मृति लेखा भी बन गई है। इस किताब की सफलता ने और लेखकों को भी प्रोत्साहित किया कि वे अपने प्रिय पर इस तरह कोई पूरी किताब लिख दें।

पिछली शताब्दी के अंतिम दशक में जिन कृतियों के साथ कथेतर साहित्य के नये दौर का आगमन हुआ उनमें रवींद्र कालिया की संस्मरण पुस्तक 'ग़ालिब छुटी शराब', काशीनाथ सिंह की 'याद हो के न याद हो', दूधनाथ सिंह की 'लौट आ, ओ धार' तथा कांतिकुमार जैन की 'लौट कर आना नहीं होगा' अग्रगण्य हैं। ध्यान देना चाहिए कि संस्मरणों के साथ हिंदी साहित्य में आत्म उद्घाटन का नया दौर भी शुरू हुआ जो आगे यात्रा आख्यानों, आत्मकथाओं, डायरियों, रेखाचित्रों, शहरनामों और जीवनियों के साथ बढ़ता गया। ममता कालिया के संस्मरण, शहरनामे और रेखाचित्र कथेतर विधाओं की शक्ति और संभावनाओं को दर्शाते हैं। उनके रेखाचित्रों की किताब 'कल परसों के बरसों' में इलाहाबाद के अनेक साहित्यकारों के व्यक्ति चित्र आए हैं। इस पुस्तक के श्रेष्ठतम आलेख के रूप में शैलेश मटियानी पर लिखा 'पहाड़ जिन पर टूटता ही रहा' को सबसे पहले देखा जा सकता है। यहां मटियानी जी का संघर्ष, रचनात्मकता, आत्म स्वीकृतियां मिलकर जिस व्यक्तित्व का चित्र बनाती हैं वह पाठक के भीतर स्थायी होकर रहने वाला है। इसी तरह अमरकांत के व्यक्तित्व की सादगी को गरिमापूर्ण ढंग से वे चित्रित करती हैं। अपने इन संस्मरणात्मक रेखाचित्रों में खुद लेखिका का भी व्यक्तित्व उभरता है ख़ास तौर पर जब वे अपने चाचा भारतभूषण अग्रवाल को या पति रवीन्द्र कालिया पर लिख रही होती हैं तब अनायास अपने सम्बन्ध में भी बताती जाती हैं जिसे जानना उनके पाठकों के लिए कम रोचक नहीं है। इन रेखाचित्रों में औरों के बहाने स्वयं ममता जी की रचनागत अवधारणाओं-सरोकारों का भी एहसास होता है। ममता कालिया के लिए अच्छा मनुष्य होना रचनात्मकता की भी पहली कसौटी है और इस कसौटी पर उनके लिए विचारधारा भी उतनी महत्वपूर्ण नहीं रह जाती। उनके चित्रों की जुगलबंदियां तो देखिये- मार्कंडेय और शिवानी, ज्ञानरंजन और विष्णुकांत शास्त्री अर्थात उनके लिए अनिवार्य शर्त मनुष्यता है विचारधारा नहीं।

ममता जी का जन्म 2 नवम्बर 1940 को वृन्दावन में हुआ। उनके पिता विद्याभूषण अग्रवाल आकाशवाणी में थे और उनके चाचा भारतभूषण अग्रवाल जाने माने कवि-लेखक। उनकी प्रारम्भिक और उच्च शिक्षा दिल्ली, मुम्बई, पुणे, नागपुर और इन्दौर जैसे अलग-अलग शहरों में हुई। उन्हें अनेक सम्मान एवं पुरस्कार प्राप्त हो चुके हैं जिनमें व्यास सम्मान, साहित्य भूषण सम्मान, यशपाल स्मृति सम्मान, महादेवी स्मृति पुरस्कार, राममनोहर लोहिया सम्मान, कमलेश्वर स्मृति सम्मान, सावित्री बाई फुले स्मृति सम्मान, लमही सम्मान आदि प्रमुख हैं। उन्होंने हिंदी के यशस्वी कथाकार और सम्पादक रवींद्र कालिया से विवाह किया था जो पूरी तरह मसिजीवी थे। संघर्षों से भरा ममता जी और रवींद्र जी का जीवन इन दोनों के कथेतर साहित्य का आधार भी है। साहित्य अकादेमी का यह पुरस्कार उनके लेखन के महत्व की प्रतिष्ठा ही नहीं है अपितु नयी शताब्दी में आ रहे बदलावों के मध्य कथेतर विधाओं के महत्व की भी उद्घोषणा है। साहित्य अकादेमी पुरस्कार के 70 वर्ष के इतिहास में जीवनी विधा के अतिरिक्त किसी कथेतर कृति को यह पुरस्कार नहीं मिला था बल्कि आमतौर पर कविता और उपन्यास को ही दिया जाता रहा। ऐसे में कथेतर विधाओं में संस्मरण की कृति का चुनाव बताता है कि नयी शताब्दी में स्थापित विधाओं के साथ हाशिये की समझी गई विधाओं को भी महत्व मिलेगा। ममता जी जैसी कुशल गद्यकार इन कथेतर विधाओं को भी विधागत ऊं चाइयों पर ले जाने में समर्थ हैं और अकादेमी पुरस्कार इस बात पर मुहर लगाने जैसा ही है।

(लेखक हिन्दू कालेज में पढ़ाते हैं और कथेतर विधाओं पर लगातार अध्ययनरत हैं।)


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