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अथातो घुमक्कड़ जिज्ञासा

प्राणियों की उत्पत्ति और मानव-वंश के विकास पर ही अद्वितीय खोज नही की, बल्कि सारे ही विज्ञानों को उससे सहायता मिली। कहना चाहिए, कि सभी विज्ञानों को डार्विन के प्रकाश में दिशा बदलनी पड़ी

अथातो घुमक्कड़ जिज्ञासा
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  • राहुल सांकृत्यायन

मेरी समझ में दुनिया की सर्वश्रेष्ठ वस्तु है घुमक्कड़ी। घुमक्कड़ से बढ़कर व्यक्ति और समाज का कोई हितकारी नही हो सकता कहा जाता है, ब्रह्मा ने सृष्टि को पैदा धारण और नाश करने का जिम्मा अपने ऊपर लिया है।

पैदा करना और नाश करना दूर की बाते हैं, उनकी यथार्थता सिद्ध करने के लिए न प्रत्यक्ष प्रमाण सहायक हो सकता है, न अनुमान ही। हाँ, दुनिया को धारण की बात तो निश्चय ही न ब्रह्मा के ऊपर है, न विष्णु के और न शंकर ही के ऊपर। दुनिया—दुख में हो चाहे सुख में—सभी समय यदि सहारा पाती है, तो घुमक्कड़ की ही ओर से। प्राकृतिक आदिम मनुष्य परम घुमक्कड़ था। खेती, बागवानी तथा घर-द्वार से मुक्त वह आकाश के पक्षियों की भाँति पृथ्वी पर सदा विचरण करता था, जाड़े में यदि इस जगह था तो गर्मियों में वहाँ से दो सौ कोस दूर।

आधुनिक काल में घुमक्कड़ों के काम की बात कहने की आवश्यकता है, क्योंकि लोगों ने घुमक्कड़ों की कृतियों को चुराके उन्हें गला फाड़-फाड़कर अपने नाम से प्रकाशित किया, जिससे दुनिया जानने लगी कि तेली के कोल्हू के बैल ही दुनिया में सब कुछ करते हैं।

आधुनिक विज्ञान में चार्ल्स डार्विन का स्थान बहुत ऊँचा है। उसने प्राणियों की उत्पत्ति और मानव-वंश के विकास पर ही अद्वितीय खोज नही की, बल्कि सारे ही विज्ञानों को उससे सहायता मिली। कहना चाहिए, कि सभी विज्ञानों को डार्विन के प्रकाश में दिशा बदलनी पड़ी। लेकिन क्या डार्विन अपने महान अविष्कारों को कर सकता था, यदि उसने घुमक्कड़ी का व्रत नही लिया होता?

मैं मानता हूँ, पुस्तकें भी कुछ-कुछ घुमक्कड़ी का रस प्रदान करती है, लेकिन जिस तरह $फोटो देखकर आप हिमालय के देवदार के गहन वनों और श्वेत हिम-मुकुटित शिखरों के सौंदर्य, उनके रूप, उनके गंध का अनुभव नही कर सकते, उसी तरह यात्रा-कथाओं से आपको उस बूंद से भेंट नही हो सकती जो कि एक घुमक्कड़ को प्राप्त होती है।

अधिक से अधिक यात्रा-पाठकों के लिए यही कहा जा सकता है, कि दूसरे अंधों की अपेक्षा उन्हें थोड़ा आलोक मिल जाता है और साथ ही ऐसी प्रेरणा भी मिल सकती है, जो स्थाई नहीं तो कुछ दिनों के लिए उन्हें घुमक्कड़ बना सकती हैं। घुमक्कड़ क्यों दुनिया की सर्वश्रेष्ठ विभूति है? इसीलिए कि उसी ने आज की दुनिया को बनाया है। यदि आदिम-पुरुष एक जगह नदी या तालाब के किनारे गर्म मुल्क में पड़े रहते तो वह दुनिया को आगे नहीं ले जा सकते थे। आदमी की घुमक्कड़ी ने बहुत बार खून की नदियाँ बहाई हैं, इसमें संदेह नही, और घुमक्कड़ों से हम हर्गिज़ नही चाहेंगे कि खून के रास्ते को पकड़ें, किंतु अगर घुमक्कड़ों के

का​​िफले न आते-जाते तो सुस्त मानव-जातियाँ सो जाती और पशु से ऊपर नहीं उठ पाती। आदिम घुमक्कड़ों में से आर्यों, शकों, हूणों ने क्या-क्या किया, अपने खूनी पथों द्वारा मानवता के पथ को किस तरह प्रशस्त किया, इसे इतिहास में हम उतना स्पष्ट वर्णित नहीं पाते, किंतु मंगोल-घुमक्कड़ों की करामातों को तो हम अच्छी तरह जानते हैं। बारूद, तोप, कागज़, छापाखाना, दिग्दर्शक, चश्मा यही चीज़े थी, जिन्होंने पच्छिम में विज्ञान-युग का आरंभ कराया, और इन चीज़ों को वहाँ ले जानेवाले मंगोल घुमक्कड़ थे। कोलंबस और वास्को-द-गामा दो घुमक्कड़ ही थे, जिन्होंने पश्चिमी देशों के आगे बढ़ने का रास्ता खोला। अमेरिका अधिकतर निर्जन-सा पड़ा था। एशिया के कूप-मंडूकों को घुमक्कड़-धर्म की महिमा भूल गई, इसलिए उन्होंने अमेरिका पर अपनी झड़ी नहीं गाड़ी। दो शताब्दियों पहले तक आस्ट्रेलिया खाली पड़ा था। चीन और भारत को सभ्यता का बड़ा गर्व है, लेकिन इनको इतनी अ$क्ल नहीं आई कि जाकर वहाँ अपना झंडा गाड़ आते। आज अपने 40-50 करोड़ की जनसंख्या के भार से भारत और चीन की भूमि दबी जा रही है, और आस्ट्रेलिया में एक करोड़ भी आदमी नहीं हैं। आज एसियायियों के लिए आस्ट्रेलिया का द्वार बंद है लेकिन दो सदी पहले वह हमारे हाथ की चीज़ थी। क्यों भारत और चीन आस्ट्रेलिया की अपार संपत्ति और असित भूमि से वंचित रह गए? इसीलिए कि वह घुमक्कड़-धर्म से विमुख थे, उसे भूल चुके थे।

हाँ, मैं इसे भूलना ही कहूँगा क्योंकि किसी समय भारत और चीन ने बड़े-बड़े नामी घुमक्कड़ पैदा किए। वे भारतीय घुमक्कड़ ही थे, जिन्होंने दक्षिण-पूरब में लंका,वर्मा,मलाया,यवद्वीप, स्याम, कम्बोज, चंपा, बोनिर्यों और सेलिबीज ही नहीं, $िफलिपाईन तक धावा मारा था, और एक समय तो जान पड़ा कि न्यूजीलैंड और आस्ट्रेलिया भी वृहत्तर भारत का अंग बनने वाले हैं ; लेकिन कूप-मंडूकता तेरा सत्यानाश हो ! इस देश के बुद्धुओं ने उपदेश करना शुरू किया, कि समुंद्र के खारे पानी और हिंदू-धर्म में बड़ा बैर है, उसके छूनेमात्र से वह नमक की पुतली की तरह गल जाएगा। इतना बतला देने पर क्या कहने की आवश्यकता है, कि समाज के कल्याण के लिए घुमक्कड़-धर्म कितनी आवश्यक चीज़ है? जिस जाति या देश ने इस धर्म को अपनाया, वह चारों फलों का भागी हुआ, और जिसने इसे दुराया, उसके लिए नरक में भी ठिकाना नही। आखिर घुमक्कड़-धर्म को भूलने के कारण ही हम सात शताब्दियों तक धक्का खाते रहे, ऐरे गैरे जो भी आए, हमें चार लात लगाते गए।

पुस्तक : घुमक्कड़-शास्त्र (पृष्ठ 1) रचनाकार : राहुल सांकृत्यायन प्रकाशन : राजकमल प्रकाशन दिल्ली संस्करण : 1949


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