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सत्यजीत रे : मानवीय संवेदनाओं को परदे पर जीवंत करने वाले फिल्मकार

जो हमारे भीतर आक्रोश, आवेग, बेचैनी और उत्तेजना ही जगाता है तब सत्यजीत रे की फिल्में और महत्वपूर्ण लगती हैं, जो मन के लिए किसी मरहम का काम कर जाती हैं,

सत्यजीत रे : मानवीय संवेदनाओं को परदे पर जीवंत करने वाले फिल्मकार
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  • — डॉ.सुजाता मिश्र

इस दृष्टि से जब मैं सत्यजीत रे जी की फिल्मों को देखती हूँ तो लगता है कि वो न सिर्फ एक उम्दा फिल्मकार थे बल्कि मानव मन के एक सच्चे चितेरे भी थे जो अपनी फिल्मों के माध्यम से दर्शकों के मन को मांजने का काम करते थे। आज जब सिनेमा केवल व्यवसाय का माध्यम बनकर रह गया है, जो हमारे भीतर आक्रोश, आवेग, बेचैनी और उत्तेजना ही जगाता है तब सत्यजीत रे की फिल्में और महत्वपूर्ण लगती हैं, जो मन के लिए किसी मरहम का काम कर जाती हैं, उनकी फिल्में अनेक अनुत्तरित प्रश्नों का भी माकूल जवाब दे जाती हैं जो हम सबके भीतर कहीं गूंजते

रहते हैं।

सिनेमा और साहित्य के संदर्भ में एक प्रचलित कथन यह चलता है की साहित्य समाज का दर्पण है और सिनेमा उसकी कलात्मक अभिव्यक्ति। किन्तु न तो साहित्य केवल समाज का दर्पण होता है और न ही सिनेमा सिर्फ एक कलात्मक अभिव्यक्ति है। श्रेष्ठ साहित्य वह है जो मानव मन की उन मूल संवेदनाओ को भी अभिव्यक्ति दे जो मौन रह जाती हैं, जिन पर बात करना तो दूर विचार करना भी सभ्य समाज में स्वीकृत नहीं होता और श्रेष्ठ सिनेमा वह है जो मानव मन की दबी-कुचली संवेदनाओं को इस तरह परदे पर जीवंत करे की जो दर्शक के भीतर की सोई हुई , उपेक्षित संवेदनाओं को भी जगा दे। आप कह सकते है कि मनुष्य भी तो समाज का हिस्सा है, किन्तु आपको यह भी स्वीकारना होगा की समाज दरअसल मनुष्य को, उसकी भावनाओं को,इच्छाओं को नियंत्रित करता है, इसीलिए श्रेष्ठ साहित्य और श्रेष्ठ सिनेमा वही है जो समाज द्वारा नियंत्रित-निर्देशित उन सभी मानवीय भावनाओं,संवेदनाओं की कोमल अभिव्यक्ति कर सके जो मन के भीतर कहीं दबकर, कुचलकर रह जाती हैं और फिर कारण बनती है गहरी वेदना का, जन्म देती हैं मानसिक संताप को, अवसाद को, निराशा और आत्मग्लानि को।

इस दृष्टि से जब मैं सत्यजीत रे जी की फिल्मों को देखती हूँ तो लगता है कि वो न सिर्फ एक उम्दा फिल्मकार थे बल्कि मानव मन के एक सच्चे चितेरे भी थे जो अपनी फिल्मों के माध्यम से दर्शकों के मन को मांजने का काम करते थे। आज जब सिनेमा केवल व्यवसाय का माध्यम बनकर रह गया है, जो हमारे भीतर आक्रोश, आवेग, बेचैनी और उत्तेजना ही जगाता है तब सत्यजीत रे की फिल्में और महत्वपूर्ण लगती हैं, जो मन के लिए किसी मरहम का काम कर जाती हैं, उनकी फिल्में अनेक अनुत्तरित प्रश्नों का भी माकूल जवाब दे जाती हैं जो हम सबके भीतर कहीं गूंजते रहते हैं।

जब हम बात करते हैं मानवीय संवेदनाओं की तो वहाँ जाति, धर्म, नस्ल और और लिंग के बंधन खत्म हो जाते हैं, इसीलिए सत्यजीत रे की पहली ही फिल्म 'पथेर पांचालीÓ - जो आज तक विश्व सिनेमा इतिहास में सर्वश्रेष्ठ फिल्मों में गिनी जाती है, का कथानक के केंद्र में भूख, गरीबी और दरिद्रता की मार झेलता एक ब्राह्मण परिवार है। हरिहर राय (कानू बनर्जी) जो साहित्यकार बनना चाहता है किन्तु परिवार की रोजी-रोटी चलाए रखने के लिए पुजारी बन जाता है। परिवार में पत्नी सर्वजया और दो बच्चे हैं दुर्गा और अप्पू, साथ ही चचेरी विधवा बहन भी रहती है जो अब बहुत वृद्ध हो चुकी हैं, दरिद्रता के कारण सर्वजया को अब इंदिरा का वहाँ रहना अखरता है, क्योंकि वो तो अपने बच्चों तक को भरपेट भोजन नहीं दे पाती। किन्तु दोनों बच्चों के लिए वृद्ध इंदिरा बुआ जीवन और मृत्यु के बीच का एक रहस्य हैं, पहेली हैं। बुआ हर रात सोने से पहले ईश्वर का ध्यान कर जो गीत गाती थी वह एक प्रकार से चिर मुक्ति की प्रार्थना का गीत है, चिर मुक्ति की करुण गुहार है :-

'जो मुझसे पहले आए वो भी चले गए

पर मैं अभी तक जिंदा हूँ ,

मुझ भिखारी के पास एक कौड़ी तक नहीं

आज का दिन भी बीत गया और शाम हो गई

हे भगवान अब तो मुझे भी पार लगा दो ,

अब तो अपने पास बुला लो'

जो आलोचक सत्यजीत रे की फिल्मों की यह कहकर आलोचना करते हैं कि उनकी फिल्में भारत की दरिद्रता और गरीबी को प्रचारित करती हैं दरअसल उनकी संकीर्ण बुद्धि सत्यजीत रे के हृदय के उस विस्तार को नहीं देख पाते जो कहना चाहता है कि दरिद्रता, गरीबी या भुखमरी का संबंध किसी जाति, समाज या देश से नहीं हैं, यह किसी के भी जीवन में पैर पसार सकती है, कोई भी इसकी चपेट में आ सकता है, और सत्यजीत रे की इसी सोच, इसी तर्क की झलक हमें 'अप्पू त्रयी' (्रश्चश्चह्व ह्लह्म्द्बद्यशद्द4) में दिखाई देती है, इसी दरिद्रता की मार से 'पथेर पांचाली' में अप्पू अपनी बुआ के बाद अपनी दीदी दुर्गा को भी खो देता है। वो बहन जो उसकी एक मात्र दोस्त भी थी, वो दीदी जिसने पहली बार अप्पू को गाँव से होकर गुजरने वाली रेलगाड़ी दिखाई थी,रेलगाड़ी यहाँ प्रतीक थी बाहरी दुनिया का ,अर्थात वो दुर्गा ही थी जिसने नन्हे अप्पू को एहसास करवाया कि ये दुनिया कितनी बड़ी है और हमारी समस्याएं कितनी छोटी हैं। दुर्गा की असमय मौत तत्कालीन समाज का एक कटु सत्य है।

एक समय था जब अधिकांश लोगों के बच्चे बचपन में ही बीमारियों से जूझते हुए मार जाते थे । क्योंकि गाँव -देहात में चिकित्सक नहीं मिलते थे, गाँव के लोग हर तरह की हारी-बीमारी का घरेलू ईलाज करते थे, बच्चे तक घरों में पैदा हो जाते थे और कितनी ही स्त्रियां बच्चों को जन्म देते हुए खत्म हो जाती थी और यह सब सामान्य समझा जाता था! फिल्म के अंत में कानू बनर्जी अपने बचे हुए परिवार (पत्नी और पुत्र) को लेकर काशी की ओर प्रस्थान कर जाता है, कि शायद गंगा घाट पर पूजा पाठ आदि से कुछ कमाई हो सके और शेष परिवार बच जाए।

किन्तु 1956 में आयी 'अपराजितो' की शुरुआत में ही बीमारी और दरिद्रता कानू बनर्जी को भी लील लेती है और इस तरह अब परिवार में सिर्फ अप्पू और उसकी माँ शेष रह जाते है। माँ की ममता अप्पू को अपने ही पास रोक लेना चाहती है, किन्तु नन्हा अप्पू अपने पिता की तरह पुजारी का जीवन नहीं जीना चाहता ,वह पढ़ना चाहता है और अंतत: माँ की ममता के आगे अप्पू की जिद्द जीत जाती और अप्पू उस दुनिया की तलाश में निकल जाता है जिसका परिचय बचपन में अप्पू की दीदी दुर्गा ने 'रेलगाड़ी' के रूप में करवाया था।

रे,अप्पू के रूप में किशोरावस्था से युवावस्था की ओर कदम बढ़ाते हर उस भारतीय 'लड़केÓ की मन:स्थिति को दर्शाते हैं जो अपनी जि़ंदगी को अपनी शर्तों पर जीना चाहता है, जो घर से, परिवार से दूर होकर अपने निजी अस्तित्व की तलाश करना चाहता है। इसीलिए पढ़ाई के लिए कलकत्ता गया अप्पू धीरे-धीरे माँ के पास आना पूरी तरह बंद कर देता है। यहाँ माँ सर्वजया और अप्पू के परस्पर संबंधों के माध्यम से सत्यजीत रे दो पीढ़ियों के उसी अंतर को सामने रखते हैं जिस पर आज भी काफी बहस होती है। खासकर भारतीय समाज में जहां आज भी बुजुर्ग माता-पिता की सेवा और देखभाल करना संतान का, पुत्र का परम कर्तव्य माना जाता है और ऐसा न करने पर उसे स्वार्थी और कपूत मान लिया जाता है, वहाँ सत्यजीत रे बेहद विनम्रता के साथ संतान के उस मानसिक संघर्ष को प्रकट प्रस्तुत करते हैं, जिसमें वह मन ही मन अपने अस्तित्व और पहचान के लिए जूझ रहा होता है।

अप्पू कलकत्ता में ही पढ़ाई के साथ नौकरी भी करने लगता है, वो व्यस्त रहना चाहता है, आत्मनिर्भर बनना चाहता है, जैसा कि अधिकांश युवा करते हैं। सर्वजया अप्पू के लौट आने का इंतज़ार करते हुए दुनिया से चल बसती है, यह जान अप्पू को कुछ पल के लिए आघात लगता है, पर बचपन से ही गरीबी और भुखमरी की मार ने अप्पू को इतना कठोर हृदयी बना दिया है की वह माँ की तेरहवीं तक भी गाँव में नहीं रुकता। वो स्वीकारता है कि माँ सदा के लिए चली गई हैं और अब वह अनाथ है, पर अपनी इस अनाथ अवस्था में ही अब वह अपनी मुक्ति देखता है। इसलिए माँ की मृत्यु पर शोक बनाने से उचित उसे कलकत्ता जाकर अपने जीवन का आधार तलाश करना उचित लगता है। निश्चित तौर पर हर अलगाव पीड़ादाई होता है किन्तु इसका दूसरा व्यवाहरिक पक्ष यह भी है कि हर अलगाव किसी पुराने बंधन से मुक्ति भी होता है।

अप्पू अपने अस्तित्व को बचाए रखने में कितना सफल हुआ, माता-पिता के गुजर जानें के बाद अप्पू की दुनिया क्या हुई, सत्यजीत रे इसकी ऐसी यथार्थपरक और संवेदनात्मक अभिव्यक्ति 1959 में आई 'अपुर संसार' के माध्यम से करते हैं कि यह $िफल्म न सिर्फ पूर्व की दो फिल्मों 'पथेर पांचाली' और 'अपराजितों' के कथानक को एक मुकम्मल अंत देती है बल्कि 'द शो मस्ट गो ऑन' की तर्ज पर जीवन को बचाए रखने की आम आदमी की मौन जद्दोजहद को भी सामने रखती है 7 जिस अप्पू का अभी तक पूरा जीवन एकाकीपन में,रोजी-रोटी के संघर्ष के बीच कहीं अटका था,जो एक लेखक बनना चाहता था, परिस्थतिवश और कर्तव्यवश उसे अपने घनिष्ठ मित्र की बहन 'अपर्णा' से विवाह करना पड़ता है, क्योंकि जिस युवक से अपर्णा का विवाह होना था, उसकी मानसिक अस्वस्थता का बोध अपर्णा की माँ को तब हुआ जब बारात दरवाज़े पर आ पहुंची।

अपुर और अपर्णा अपने इस विवाह को भले ही विधि का विधान समझ स्वीकारते हैं पर शीघ्र ही दोनों एक-दूजे में ही अपनी पूर्णता को साकार पाते हैं। एक बेहद सम्पन्न परिवार से आई अपर्णा और दरिद्रता में ही पलकर बड़े हुए अपुर के बीच का प्रेम, विसंगतियों के तमाम तर्कों को खारिज कर देता है और अपुर का एकाकी संसार पूरा होने को होता ही है कि पहली संतान को जन्म देते हुए ही अपर्णा भी चल बसती है। अपूर नियति की इस क्रूरता को स्वीकार नहीं पाता। बहन और माता की असमय मृत्यु की पीड़ा को खामोशी से सहन कर जाने वाला अपुर, जीवनसंगिनी की असमय मृत्यु से इस तरह टूटता है कि फिर न सिर्फ अपना लेखन, अध्ययन छोड़ देता है बल्कि अपने नवजात शिशु का मुंह तक नहीं देखता। वो अब किसी मोह में नहीं बंधना चाहता। जीवन से पलायन करने को आतुर अपुर कलकत्ता छोड़ देता है, जीवन से, संसार से विरक्त हो जाता है कि वो कहाँ गया इसकी किसी को खोज खबर नहीं रहती।

अपुर की इस मनोदशा पर चिदानंद दासगुप्ता अपनी पुस्तक 'सत्यजीत राय का सिनेमाÓ में लिखते हैं 'यदि विवाह पूर्व अपु का लापरवाह बांसुरी वादन नदी किनारे बांसुरी बजाते कृष्ण की ओर संकेत करता है तो अपर्णा की मृत्यु के बाद उसकी दीर्घ शोकाकुल व्यग्रता शिव के उस रूप की स्मृति कराती है जिसमें वे अपनी पत्नी की मृत देह को कंधे पर लादे एक स्थान से दूसरे स्थान पर भटकते हैं। दूसरे देवतागण - जो ब्रम्हांड की व्यवस्था पर आए खतरे को लेकर चिंतित होते है, वे सती के शव को कई हिस्सों में खंडित कर देते हैं। जब शिव को एहसास होता है की सती अब नहीं रही तब वो अनिच्छा से वापस अपने कर्तव्यों की ओर लौट पड़ते हैं। अपर्णा के वियोग में व्याकुल अपुर सब कुछ त्याग कर जब कुछ बरसों बाद भी सामान्य जीवन में नहीं लौटता तब अपर्णा का भाई और अपुर का मित्र अपुर की तलाश कर उसे उसके पुत्र के प्रति जि़म्मेदारी का एहसास करवाता है। '

अपुर किसी तरह मन को समझा अपनी ससुराल जाकर पहली बार अपने पुत्र का मुंह देखता है, जो अब 5- 6 बरस का हो चुका है, जिसकी देखभाल के लिए उसके नाना के सिवाय कोई नहीं बचा। अपुर को अपनी गलती का एहसास होता है, वो अपने निजी दुख और पीड़ाओं में इस तरह डूब गया था कि उसे इस नन्हे-अबोध बालक की सुध तक न रही जो अपर्णा और उसके प्रेम की एक मात्र निशानी है। अपुर के थोड़े प्रयासों के बाद बालक अपने पिता के कंधों पर सवार हो उसके साथ चल पड़ता है, पुत्र के रूप में अपुर को एक बार फिर जीवन का आधार मिल गया, जीने की वजह मिल गई... मकसद मिल गया हो। जैसे, अपुर का संसार जैसे फिर बस गया हो। यही तो जीवन है, तमाम उतार-चढ़ावों के बावजूद चलते जाना ही जीवन है .. इस तरह दरिद्रता ,भुखमरी के बीच जीवन जीने के यथार्थपरक कारणों और आधारों को तलाशते हुए अपुर त्रयी अंतत: दार्शनिक बोध के साथ खत्म होती है।

विभूति भूषण बंदोपाध्याय के दो खंडों में लिखित उपन्यास को सिनेमाई पर्दे पर सत्यजीत रे जिस तरह प्रस्तुत करते है उससे ये उपन्यास मानों एक 'महाकाव्यÓ का रूप लेते हैं। ऐसा महाकाव्य जिसमें न कोई नायक है, न खलनायक, बल्कि जहां हर पात्र के पास वह तर्क है,वह कारण है जो उसके वैसा होने को पुष्ट करता है जैसा वो है। ये आम आदमी की जीवन की संघर्ष गाथा है जो महज कोरे आदर्श पर नहीं चल सकती, यथार्थ के थपेड़े जहां उसके आदर्श और कल्पनाओं को बार-बार झकझोरते हैं। देखा जाए तो साहित्य पर केंद्रित सर्वाधिक फिल्में बांग्ला में ही बनी है,यह बांग्लाभाषियों की न सिर्फ साहित्यिक रुचियों बल्कि सांस्कृतिक और बौद्धिक चेतना का भी प्रमाण है।

सत्यजीत रे का सिनेमा भी मूलत: साहित्य पर आधारित है, गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर की कहानियों से लेकर, विभूतिभूषण बंदोपाध्याय, नरेन्द्रनाथ मित्रा और मुंशी प्रेमचंद की कालजयी रचनाओं को जिस कलात्मकता और जीवंतता के साथ उन्होंने सिनेमा के साँचे में पिरोया है वह उन महान रचनाओं को हर उस दर्शक-पाठक तक सहजता से पहुंचा देती है जिसे उक्त भाषा का बोध न हो। क्योंकि सत्यजित रे स्वयं एक उम्दा चित्रकार और फोटोग्राफर भी थे इसीलिए उनकी फिल्में एक शानदार पेंटिंग जैसी लगती हैं।

सत्यजीत रे की फिल्में में कथानक और पात्र यदि मानवीय संवेदनाओं को उभारते है तो उनका कैमरा बंगाल और बनारस की प्राकृतिक सुंदरता , लोक जीवन और संस्कृति को सिनेमा के वैश्विक पटल पर सजीव बना देता है। किसी साहित्यिक रचना का सिनेमाई रूपांतरण कैसे किया जाना चाहिए यह सत्यजीत रे की फिल्में बखूबी बताती हैं, उन्होंने जिस भी प्रकार की रचना को चुना उसके साथ भरपूर न्याय किया।

सत्यजीत रे ने मुंशी प्रेमचंद की दो कहानियों पर हिन्दी में फिल्म बनाई है, 'शतरंज के खिलाड़ी 'और 'सदगति ',इन दोनों ही फिल्मों को सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार भी दिया गया, जो इस बात का प्रमाण है कि मूलत:बांग्लाभाषी होते हुए भी जब उन्होंने प्रेमचंद की कहानियों पर काम किया तो न सिर्फ हिन्दी बल्कि उर्दू और ग्रामीण भाषा की शब्दावलियों को भी आत्मसात किया। यह उनका अपने कार्य के प्रति समर्पण और ईमानदारी का प्रमाण है। निस्संदेह उन्हें 35 बार राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार, पद्म भूषण, पद्म विभूषण सहित भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारत रत्नÓ से अलंकृत किया गया। 30 मार्च 1992 के ऐतिहासिक अवसर पर जब सत्यजीत राय को अकेडमी अवॉर्ड 'लाइफटाइम अचीवमेंट ऑनरेरी अवार्डÓ (ऑस्कर) दिया गया गया उस पल को याद करते हुए प्रतिष्ठित फिल्म निर्देशक श्याम बेनेगल - जो सत्यजीत रे को अपनी प्रेरणा स्रोत मानते थे, ने भारतीय फिल्म वार्षिकी में प्रकाशित अपनी आवरण कथा में युग प्रवर्तक फिल्मकार के प्रति अपनी भावनाएं कुछ इस तरह व्यक्त की थी -

'एक आदमी, उम्र के आठवें दशक को छूता.... दिल के दौरों से जर्जर और उसे मिला है विश्व सिनेमा का सर्वोच्च सम्मान - ऑस्कर। अपनों के माणिक दा और दुनिया के लिए सत्यजीत राय का यह सम्मान कला के गहरे

आयामों का सम्मान है, जिसे हम शनै:-शनै: खोते जा रहे हैं। ऑस्कर सम्मान के संदर्भ में, भारतीय सिनेमा के इस शलाका पुरुष को एक दूसरे फिल्मकार श्याम बेनेगल का सलाम। '

समीक्षक, स्वतंत्र लेखिका


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