सज्जाद ज़हीर और प्रेमचंद
तरक्की-पसंद अदीबों का पहला ग्रुप साल 1935 में सज्जाद ज़हीर, डॉ. मुल्कराज आनंद, डॉ. ज्योति घोष, प्रमोद सेनगुप्त और डॉ. मुहम्मद दीन 'तासीर' ने लंदन में $कायम किया था।

-ज़ाहिद ख़ान
संदर्भ : प्रगतिशील लेखक संघ के नब्बे साल।
तरक्$की-पसंद अदीबों का पहला ग्रुप साल 1935 में सज्जाद ज़हीर, डॉ. मुल्कराज आनंद, डॉ. ज्योति घोष, प्रमोद सेनगुप्त और डॉ. मुहम्मद दीन 'तासीर' ने लंदन में $कायम किया था। मालूम हो कि लंदन में ही प्रगतिशील लेखक संघ के घोषणा-पत्र का मसौदा तैयार हुआ। बाद में ग्रुप ने इस मसौदे को साइक्लोस्टाइल करके हिन्दुस्तान के अपने दोस्तों मसलन डॉ. मुहम्मद अशर$फ, महमूदुज़्ज़फर, डॉ.रशीद जहाँ, प्रोफे़सर हीरेन मुखर्जी, डॉ.युसूफ हुसैन ख़ाँ और हत्थी सिंह आदि के नाम भेज दिया। ताकि वे उसे वहॉं के अदीबों को दिखाएं और इस पर उनकी राय लें। आगे चलकर सज्जाद ज़हीर जब वापस हिन्दुस्तान लौटे, तो उन्होंने प्रगतिशील सांस्कृतिक आंदोलन को कार्यरूप देने के लिए तमाम भारतीय भाषाओं के प्रमुख लेखकों मसलन कन्हैयालाल मुंशी, अहमद अली, $िफरा$क गोरखपुरी, डॉ.सैयद ऐजाज़ हुसैन, पं.अमरनाथ झा, डॉ.ताराचंद से प्रगतिशील लेखक संघ के प्रस्तावित घोषणा-पत्र पर विचार-विनिमय शुरू किया। प्रेमचंद से सज्जाद ज़हीर की पहली मुलाकात कब और कैसे हुई, इसका जि़क्र उन्होंने अपनी किताब 'रौशनाई' में तफसील से किया है। साल 1935 के दिसम्बर महीने में इलाहाबाद के अंदर हिन्दुस्तानी एकेडमी का एक सम्मेलन आयाजित हुआ। जिसमें उर्दू और हिन्दी के साहित्यकार इक_े हुए। प्रेमचंद से उनकी पहली मुला$कात यहीं हुई।
इस मुला$कात के बाद यह तय हुआ कि मौलवी अब्दुल ह$क, जोश मलीहाबादी और प्रेमचंद के साथ एक बैठक और हो और उसमें उनसे प्रगतिशील लेखक संघ के प्रस्तावित उद्देश्यों और घोषणा-पत्र पर सलाह-मशविरा किया जाए। यह बैठक सज्जाद ज़हीर के घर पर हुई। जहाँ प्रेमचंद ने घोषणा-पत्र पर अपनी रज़ामंदी जताते हुए इस पर ख़ुशी-ख़ुशी अपने दस्तख़त कर दिए। इसके बाद प्रगतिशील लेखक संघ के स्वरूप और मसौदे का प्रकाशन कराया गया और उसे देश के बड़े शहरों के प्रसिद्ध साहित्यकारों को भेज दिया गया। ताकि वे इस संगठन से जुड़ें। यह सब कवायद के बाद यह सोच बनी कि अब प्रगतिशील लेखकों की एक अखिल भारतीय कॉन्फ्रेंस हो, जिसमें इस सोच के साहित्यकार इक_े हों और केन्द्रीय संगठन का बा$कायदा निर्माण हो सके। कॉन्फ्रेंस लखनऊ में हो और इसकी अध्यक्षता प्रेमचंद से करने की दरख़्वास्त की जाए। प्रेमचंद उस वक़्त बनारस में रहते थे। सज्जाद ज़हीर संगठन के निर्माण और दूसरे मसलों पर उनसे लगातार ख़तो-किताबत करते रहते थे। प्रगतिशील साहित्य आंदोलन में प्रेमचंद की दिलचस्पी भी बढ़ रही थी। लेकिन उनकी बहुत-सी व्यस्तताएं थीं। उस वक़्त आलम यह था कि देश के किसी भी हिस्से में हिन्दी या उर्दू की कोई भी अदबी कॉन्फ्रेंस या जलसा हो, प्रेमचंद से ही सब लोग उसकी अध्यक्षता कराते थे। प्रेमचंद भी अपने विनम्र स्वभाव की वजह से इसके लिए मना नहीं करते थे। सज्जाद ज़हीर की जि़द और बार-बार इसरार के बाद प्रेमचंद प्रगतिशील लेखक संघ के पहले राष्ट्रीय अधिवेशन की अध्यक्षता इस शर्त पर करने के लिए राज़ी हो गए कि वे इसमें अपना लिखित वक्तव्य देंगे। और वे किसी मसले पर बहस चाहते हैं, तो इसका इशारा कर दें। ताकि वे बातें भी वक्तव्य में जोड़ दी जाएं।
प्रेमचंद सज्जाद ज़हीर के घर ही ठहरे। लखनऊ के मशहूर 'रि$फाह-ए-आमÓ क्लब में 9 अप्रैल, 1936 को प्रगतिशील लेखक संघ का पहला राष्ट्रीय अधिवेशन शुरू हुआ। स्वागत वक्तव्य के बाद मुंशी प्रेमचंद सर्वसम्मति से कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष चुने गए। प्रेमचंद ने अपने लम्बे अध्यक्षीय वक्तव्य में प्रगतिशील लेखक संघ की ज़रूरत और उद्देश्यों पर रौशनी डालते हुए कहा, ''हम चाहते हैं कि साहित्य केन्द्रों में हमारी परिषदें स्थापित हों और वहाँ साहित्य की प्रवृतियों पर नियमपूर्वक चर्चा हो, निबंध पढ़े जाएं, बहस हो, आलोचना-प्रत्यालोचना हो। तभी वह वातावरण बनेगा। तभी साहित्य में नये युग का आविर्भाव होगा।'' उन्होंने अपने इस शानदार वक्तव्य का समापन इन यादगार शब्दों से किया, ''हमारी कसौटी पर वह साहित्य खरा उतरेगा, जिसमें उच्च चिन्तन हो, स्वाधीनता का भाव हो, सौन्दर्य का सार हो, सृजन की आत्मा हो, जीवन की सच्चाइयों का प्रकाश हो, जो हम में गति, संघर्ष और बेचैनी पैदा करे, सुलाए नहीं क्योंकि अब और ज़्यादा सोना मृत्यु का लक्षण है।'' प्रेमचंद को इस वक्तव्य को पढ़ने में कोई चालीस-पैंतालीस मिनट के आस-पास लगे। उनके इस वक्तव्य पर सज्जाद ज़हीर, तो जैसे बिल्कुल $िफदा थे। प्रेमचंद के वक्तव्य के बारे में उनका यहाँ तक दावा था, ''प्रगतिशील साहित्य आंदोलन की अपेक्षा और उद्देश्यों के सम्बन्ध में शायद इससे बेहतर चीज़ अभी तक नहीं लिखी गई है।''
सज्जाद ज़हीर ने इस वक्तव्य की अहमियत जताते हुए आगे लिखा है, ''इस लेख का महत्व इसलिए और बढ़ जाता है, क्योंकि यह हमारी भाषा के एक महान यथार्थवादी कथाकार की संवेदनामय अभिव्यक्ति है।'' अधिवेशन 9 और 10 अप्रैल यानी दो दिन हुआ। जिसमें प्रगतिशील लेखक संघ का घोषणा-पत्र पेश किया गया और यह सर्वसम्मति से पारित हुआ। संगठन का एक संविधान भी स्वीकृत हुआ। इसका मसौदा डॉ. अब्दुल अलीम, महमूदुज़्ज़$फर और सज्जाद ज़हीर ने मिलकर तैयार किया था। इस तरह बा$कायदा लेखकों के एक अखिल भारतीय संगठन 'प्रगतिशील लेखक संघÓ की स्थापना की गई। सज्जाद ज़हीर को इसका पहला महासचिव चुन लिया गया। प्रेमचंद एक बार प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े, तो उसी के ही होकर रह गए।
लेखकों के इस महत्वाकांक्षी संगठन के विचार और उद्देश्यों को लोगों तक पहुँचाने की उन्होंने गम्भीरता से कोशिशें शुरू कीं। अपनी किताब 'रौशनाईÓ में सज्जाद ज़हीर लिखते हैं, ''लखनऊ कॉन्फ्रेंस के बाद मुंशी प्रेमचंद की आंदोलन में बहुत ज़्यादा दिलचस्पी बढ़ गई थी। और वे अब सही मायनो में इसके मार्गदर्शक और निर्माता बन गए थे।ÓÓ सज्जाद जहीर का तो यहाँ तक कहना है कि ''वे अपनी हिन्दी पत्रिका 'हंसÓ को इस नये आंदोलन का मुख-पत्र बनाना चाहते थे। उनकी यह इच्छा थी कि हमारा एक केन्द्रीय पत्र अंग्रेज़ी में बा$कायदगी से प्रकाशित हो और देश की दूसरी भाषाओं में या तो नई प्रगतिशील पत्रिकाएं प्रकाशित हों या जो मौजूदा पत्रिकाएं हैं, उन्हीं को नया रंग दिया जाए। वे संगठन के घोषणा-पत्र तथा लखनऊ कॉन्फ्रेंस की व्यथा-कथा का ज़्यादा से ज़्यादा प्रचार-प्रसार चाहते थे।....वे चाहते थे कि देश के हर भाषायी क्षेत्र में संगठन की शाखाएं खुलें और ख़ुद उन्होंने इसका बीड़ा उठाया था कि अलग-अलग जगहों पर जाकर अपने व्यवहार और प्रभाव से नई इकाइयाँ $कायम कराएंगे। वे चाहते थे कि संगठन की व्यवस्था के लिए कुछ पूर्णकालिक कार्यकर्ता हों।''
प्रेमचंद का साहित्यिक $कद उस वक़्त बेहद बड़ा था। अंजुमन तरक़्$की उर्दू, हिन्दी साहित्य सम्मेलन, भारत साहित्य परिषद् और देश की अनेक संस्थाओं से उनका सम्बन्ध था। गाँधी जी के हिन्दुस्तानी आंदोलन से भी वे जुड़े हुए थे। प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़ने के बाद प्रेमचंद ने इन संस्थाओं से अपना सम्बन्ध तो नहीं छोड़ा, लेकिन अपनी प्राथमिकता प्रलेसं की विचारधारा को लोगों तक पहुँचाने की बना ली। इस दौरान प्रेमचंद जिस साहित्यिक सभा या आयोजन में शामिल हुए, उन्होंने वहाँ अपना प्रगतिशील दृष्टिकोण ही प्रस्तुत किया। प्रेमचंद ने अपनी साहित्यिक पत्रिका 'हंसÓ के जुलाई, 1936 अंक में लखनऊ राष्ट्रीय अधिवेशन में दिए अध्यक्षीय भाषण का तो हिन्दी में अुनवाद प्रकाशित किया ही, साथ ही बनारस, पटना, नागपुर आदि देश के साहित्य और संस्कृति से जुड़े प्रमुख शहरों में अपने दोस्तों, हिन्दी और उर्दू के साहित्यकारों को प्रगतिशील सांस्कृतिक आंदोलन से भी जोड़ा। वो कांग्रेस या 'हिन्दी साहित्य परिषद्Ó के जलसों में जाते, तो इस आंदोलन के उद्देश्यों का बा$कायदा प्रचार करते। प्रेमचंद उस वक़्त न सिर्फ सांगठनिक दृष्टि से बेहद सक्रिय थे, बल्कि उनके लेखन में भी अब बदलाव दिखाई देने लगा था। साल 1936 वह साल है, जिसमें 'गोदानÓ जैसा एपिक उपन्यास, 'क$फनÓ जैसी कालजयी कहानी और दिल को झिंझोड़ देने वाला निबंध 'महाजनी सभ्यताÓ उनकी धारदार $कलम से निकला। साहित्यिक लेखन के अलावा प्रेमचंद 'हंसÓ पत्रिका के सम्पादकीय और अपने आलेखों में भी प्रगतिशील विचारों को आगे बढ़ा रहे थे। उन्होंने अपने जीवन का मुख्य उद्देश्य प्रगतिशील और जनवादी विचारों को अधिक से अधिक देशवासियों तक पहुँचाना बना लिया था। लेकिन अ$फसोस, प्रगतिशील लेखक संघ गठन के सि$र्फ छह महीने बाद ही महज़ छप्पन साल की उम्र में 8 अक्टूबर, 1936 को प्रेमचंद ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। यदि उन्हें और जि़ंदगी मिलती, तो प्रगतिशील लेखक संघ को निश्चित तौर पर उनकी व्यापक दृष्टि और विचारों का $फायदा पहुँचता। सच बात तो यह है कि प्रगतिशील लेखक संघ का आज जो हमंर स्वरूप दिखाई देता है, उसमें प्रेमचंद की रहनुमाई का भी बड़ा हाथ है।
प्रेमचंद की असमय मौत का सबसे ज़्यादा $गम और अ$फसोस सज्जाद ज़हीर को हुआ। जिसका इज़हार उन्होंने बड़े ही $गमगीन लफ़्ज़ों में 'रौशनाईÓ में किया है। प्रगतिशील सांस्कृतिक आंदोलन में प्रेमचंद के बेमिसाल योगदान को याद करते हुए वे लिखते हैं, ''यह दु:ख और भी बढ़ जाता है, जब यह एहसास हो कि मरने वाले को अभी मरना न था, अभी उसकी जिजीविषा ने उसे जवाब न दिया था। बल्कि एक क्रूर और कृतघ्न समाज ने अपनी उपेक्षा से एक मूल्यवान हीरे को मौत के हाथों कौड़ियों के मोल बेच दिया। दुनिया के सबसे बड़े राष्ट्र का एक महान साहित्यकार, दस करोड़ हिन्दी और उर्दू बोलने वालों का सबसे बड़ा कथाकार, ज़रूरी नहीं कि इस तरह और इन हालात में यहाँ से उठ जाए जैसा कि प्रेमचंद। वे बूढ़े न थे। अभी तो उनकी जवानी ख़त्म हुई थी। और प्रौढ़ावस्था की शुरूआत थी। उनका आर्ट सौंदर्य, चिन्तन और प्रभावमयता की नई बुलंदियों पर पहुँच रहा था। उसमें सक्रियता और विकास बराबर जारी था। अपने समाज की चेतना, अपने राष्ट्र के आम मेहनतकशों, ईमानदार लोगों के प्रति उनका लगाव और उनके लिए, सीने का दर्द बढ़ रहा था...ऐसे में वे यकायक दामन झाड़कर उठ खड़े हुए और हमें छोड़कर चले गए। शायद इसलिए कि एक अच्छे शिक्षक और मार्गदर्शक की तरह हमें सख़्ती से यह सब$क सिखाएँ कि दुनिया का हर जीवित और सच्चाई पर टिका हुआ आंदोलन किसी एक व्यक्ति का इतना आश्रित नहीं होता कि उसके बिना वह चल ही न सके। प्रेमचंद उठ गए। लेकिन हमारे कथा-साहित्य के उपवन में यथार्थ चित्रण और मानव-मैत्री के जो नाजुक पौधे उन्होंने लगाए थे, आज वे फल-फूल रहे हैं। प्रगतिशील साहित्य का आंदोलन, जिसकी उन्होंने शुरूआती और मुश्किल दिनों में रहनुमाई की थी, आज देश का सबसे बड़ा और सबसे महत्त्वपूर्ण साहित्यिक आंदोलन है।ÓÓ


