ऋत्विक घटक का चिन्तन अपने देशवासियों के प्रति था
सन्दर्भ : 6 फरवरी, महान फिल्मकार ऋत्विक घटक का स्मृति दिवस

- ज़ाहिद ख़ान
फिल्म बनाने के पीछे ऋत्विक घटक का म$कसद क्या था ? इसका जवाब भी उन्होंने अपने एक इंटरव्यू में दिया था, ''फिल्म बनाने का प्राथमिक उद्देश्य मानवजाति के लिए भलाई करना है। यदि आप मानवता के लिए भलाई न करें, तो कोई भी कला, सच्ची कला का कार्य नहीं है। मानवता के प्रति प्रेम ही एकमात्र महत्वपूर्ण चीज़ है। फिल्मों का प्राथमिक उद्देश्य....सिर्फ फिल्म ही नहीं, किसी भी कला का....अपने देश के लोगों की समकालीन विपत्ति और संघर्षों का चित्रण होना चाहिए।'
ऋत्विक घटक एक प्रतिबद्ध फिल्मकार थे। भारतीय सिनेमा और रंगमंच को उन्होंने जो अपना योगदान दिया, वह मील का पत्थर है। उनका शुमार जीनियस फिल्मकारों में होता है। घटक की एक नहीं, कई फिल्में मसलन 'नागरिक', 'मेघे ढाका तारा', 'कोमाल गांधार' आदि क्लासिक सिनेमा की कैटेगरी में आती हैं। उन्हें गुज़रे आधी सदी बीत गई, लेकिन आज भी उनके सिनेमा की बात होती है। दुनिया भर के फिल्म संस्थानों में ऋत्विक घटक का सिनेमा पढ़ाया और दिखाया जाता है। नई पीढ़ी को उनका सिनेमा बेहद मुतास्सिर करता है। वे उस सिनेमा से फिल्म मेकिंग की बारीकियॉं सीखते हैं। समाज और सिनेमा के जानिब ऋत्विक घटक के दिल में जो कमिटमेंट पैदा हुआ, इसके पीछे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और इप्टा से उनका जुड़ाव था। इप्टा से वे अपने नौजवानी के दिनों ही से जुड़ गए थे। 1943-44-45 के ज़माने में जब दुनिया भर में $फासीवाद विरोधी आन्दोलन शुरू हुआ, तो हमारे देश में भी प्रगतिशील और जनवादी रुझान रखने वाले अदीब और कलाकार सामने निकलकर आए। उन्होंने प्रगतिशील लेखक संघ और इप्टा जैसी लेखन एवं रंगमंच की जनोन्मुखी संस्थाएं बनाईं। ऋत्विक घटक ने अपने एक इंटरव्यू में ख़ुद ही इस बात को $कबूला है कि ''वे दोनों संगठनों के रेगुलर मेम्बर बन गए। उन्होंने मार्क्सवादी साहित्य का अध्ययन और उस पर लेखन किया।'' बिजन भट्टाचार्य का 'नबान्न' वह नाटक था, जिसने घटक के जीवन की धारा पलट दी। उनके सोचने का ढंग बदल दिया और वे नाटक की ओर झुकते चले गए। आगे चलकर उन्होंने 'नबान्न' में अभिनय भी किया। साल 1948 में उन्हें कलकत्ता इप्टा का सचिव बना दिया गया। यहॉं तक कि कुछ समय तक वे इप्टा के सांस्कृतिक जत्थे सेन्ट्रल स्क्वाड के डायरेक्टर भी रहे।
ऋत्विक घटक नाटककार भी थे और उन्होंने कई नाटकों का निर्देशन किया। उन्होंने 'ज्वाला', 'दलील', 'सांको', 'कालो सायार' और 'भांगा बन्दर' जैसे चर्चित नाटक लिखे, उनका निर्देशन और अभिनय किया। 'ज्वाला' नाटक का हिन्दी अनुवाद भी हुआ। अनुवाद और किसी ने नहीं, बल्कि फणीश्वरनाथ रेणु ने किया। रंगमंच की ओर घटक का झुकाव क्यों हुआ और बाद में वे सिनेमा की तरफ क्यों गए, इसका जवाब उन्होंने अपने एक इंटरव्यू में दिया था,''नाटक की प्रतिक्रिया तत्काल होने की वजह से नाटक मुझे बहुत अच्छे लगने लगे थे। फिर कुछ दिन बाद क्या हुआ कि नाटक भी मुझे नाका$फी लगने लगे, मन में आया कि नाटक का प्रभाव भी सीमित होता है। सिनेमा लाखों लोगों को एक साथ, एक ही बार में पूरी तरह अपने प्रभाव में ले सकता है। इस तरह मैं सिनेमा में आया, न कि फिल्म बनाऊँगा यह सोचकर।'' सिनेमा में आने की एक बड़ी वजह इप्टा से उनका अलग होना था। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की आंतरिक राजनीति और वैचारिक मतभेद होने के कारण आगे चलकर उन्होंने पार्टी भी छोड़ दी या यूँ कहें उन्हें उससे निष्कासित कर दिया गया।
कम्युनिस्ट पार्टी और उसके नेतृत्व ने सांस्कृतिक मोर्चे पर क्या $गलतियाँ कीं और पार्टी के पहले महासचिव पी.सी. जोशी के बारे में ऋत्विक घटक क्या सोचते थे ? इसका जवाब उन्होंने अपने एक इंटरव्यू में दिया था, ''बेशक, बहुत बड़ी $गलतियाँ हुईं, जिनकी वजह से मैंने पार्टी छोड़ी। पी.सी. जोशी में भी बहुत दोष रहे होंगे, पर उनकी इन मुद्दों पर गहरी समझ थी। जब भी मैं दिल्ली जाता था, वह मुझे अपने घर बुलाते थे। और यह सि$र्फ मेरे लिए या लक्ष्मी के लिये नहीं था...वह हर एक साथी के बारे में व्यक्तिगत रूप से पूछते थे। और उस आदमी को पार्टी के एक गिरोह....मैं कुछ नाम नहीं लूँगा..ने पार्टी से बाहर कर दिया था। वह 1948 अगस्त में 'वेलिंगटन कॉन्फ्रेंस' में हुआ था, जिसे दूसरा कॉंग्रेस कहा गया। तब से पार्टी नेताओं ने अपनी जि़म्मेदारियाँ छोड़ दीं और ज़ाहिर है कि यह चर्चा करने का कोई लाभ नहीं कि उन्होंने कितना नुकसान किया है। मैंने अलग-अलग तरी$कों से जितना छोटा-सा कर सकता था किया।'' (साल 1975 में प्रवीर सेन को दिया इंटरव्यू।) ऋत्विक घटक पार्टी और इप्टा से भले ही अलग हो गए, लेकिन उन्होंने अपनी विचारधारा से कभी समझौता नहीं किया। विचारों से वे मार्क्सवादी ही बने रहे। अपने आख़िरी दिनों में दिए गए इंटरव्यू में भी उन्होंने इप्टा और प्रगतिशील लेखक संघ में एक बार फिर अपना य$कीन जताया था, ''मैं मानता हूँ कि आज भी ऐसी संस्थाओं की ज़रूरत है। मैं यह दृढ़ता से महसूस करता हूँ।'' ऋत्विक घटक अपनी फिल्मों में हमेशा राजनैतिक बने रहे। सियासत से उन्हें कोई गुरेज़ नहीं था। उनकी नज़र में, ''राजनीति जीवन का विराट अंश है, राजनीति के बिना कुछ भी नहीं होता है। हर मनुष्य राजनीति करता है, जो कहता है कि 'मैं राजनीति नहीं करता', वह भी करता है। अराजनैतिक जैसी कोई बात ही नहीं है। आप हर समय या तो पक्ष या विपक्ष के हिस्से होते हैं।'' ऋत्विक घटक का इस सम्बन्ध में यहॉं तक कहना था, ''इस समाज..इस वर्ग-आधारित समाज में हर व्यक्ति को पूरी तरह राजनीति से भरा होना चाहिए। सि$र्फ कलाकार नहीं, ...हर कोई। पर इसका मतलब यह नहीं कि कलाकार नारेबाज़ हो जाए। सस्ते नारे लगाकर आप कलाकार नहीं बन सकते; कलाकार को अपनी सम्वेदनाओं और समझ के अंदर गहराई से कार्य करना चाहिए। जो भी सामाजिक जि़म्मेदारी से बचता है या ख़ुद को उससे अलग बताता है, वह किसी न किसी तरह ऊपरी-वर्ग और शासकों की मदद कर रहा होता है।''
साल 1951 में ऋत्विक घटक ने अपनी पहली फिल्म 'नागरिक' की पटकथा लिखी और 1952 में वह कम्पलीट हुई, सेंसर में भी पास हो गयी। लेकिन अ$फसोस, यह फिल्म थियेटर का मुँह नहीं देख पाई। घटक के निधन के बाद 1977 में जाकर फिल्म रिलीज़ हुई। फिल्म अटकने की वजह वैचारिक थी। फिल्म में उन्होंने मुखर रूप से सियासी बातें की थीं। जो कुछ लोगों को पसंद नहीं आईं। देश विभाजन का ऋत्विक घटक के दिल पर गहरा असर हुआ। वे ख़ुद विस्थापित थे। अपनी जड़ों से विस्थापन की पीड़ा उनके परिवार ने झेली थी। उनका जन्म पूर्वी बंगाल स्थित ढाका में हुआ था, जो कि अब बांग्लादेश में है। आज देश में जो समस्याएं दिखाई देती हैं, घटक की नज़र में ''देश का विभाजन ही मेरी दृष्टि में सारी समस्याओं का केन्द्र बिन्दु है। बंगाल के विभाजन की घटना ने हमारे आर्थिक, राजनैतिक जीवन को तहस-नहस कर दिया था। आज की जो सारी अर्थनीति चकनाचूर हो गयी है, उसका मूलभूत तथ्य था, बंग-भंग।'' बहरहाल, बंगाल विभाजन को ऋत्विक घटक कभी भी स्वीकार नहीं कर पाए। अपनी फिल्म त्रयी-'मेघे ढाका तारा', 'कोमल गान्धार' और 'सुबर्णरेखा' में उन्होंने यही बात कही है। इन तीनों फिल्मों के माध्यम से ऋत्विक घटक आख़िर क्या कहना चाहते थे, उन्हीं की ज़ुबानी—''इन तीनों के बीच केवल एक ही सम्बन्ध है, और वह है दो बंगालों का एकीकरण। मैं दो बंगालों को एक करना चाहता था। यहाँ तक कि मेरी आख़िरी फिल्म ('जुक्ति, तक्को आर गप्पो') में भी, मुझे लगता है कि मैंने यही काम किया है।''
ऋत्विक घटक दोनों बंगालों के एकीकरण के प्रबल पक्षधर थे। लेकिन ज़मीनी ह$की$कत का भी उन्हें अच्छी तरह से एहसास था। वे जानते थे कि ''यह काम बड़ा मुश्किल है। क्योंकि इतिहास में जो एक बार घट गया, वह सदा के लिए घट गया है।'' घटक कहते थे, ''मैं किसी राजनीतिक एकीकरण की चर्चाओं का हिस्सा नहीं हूँ। क्योंकि मैं इसे समझता नहीं हूँ, और मुझे इसकी कोई ज़रूरत भी नहीं है। लेकिन सांस्कृतिक एकीकरण.....मैं इसके प्रति उत्साही हूँ....मैंने दोनों बंगालों में काम किया है। और मुझसे ज़्यादा किसी ने ऐसा नहीं किया है। ये केवल एक बंगाल है। अगर हम कोशिश करें, तो हम अब प्रेम और करुणा के आधार पर, जो हमेशा वहॉं मौजूद है, फिर से एक हो सकते हैं।'' 'कोमल गांधार' से लेकर 'मेघे ढाका तारा' और 'सुबर्णरेखा' तीनों ही फिल्मों में उन्होंने दोनों ही देशों भारत और बांग्लादेश के बीच सांस्कृतिक मिलन की बात कही है। अपने व्यक्तिगत मामलों में बेहद अराजक और लापरवाह ऋत्विक घटक इंसान की जि़न्दगी और उसके भविष्य के प्रति बेहद आशावान थे। उन्होंने अपने आख़िरी दम तक अपनी फिल्मों के ज़रिए सांस्कृतिक एकीकरण की कोशिशें कीं। उन्हें लगता था कि ''सांस्कृतिक रूप से बंगालियों को विभाजित नहीं किया जा सकता। ये एक संस्कृति है।'' यही वजह है कि ऋत्विक घटक और उनका सिनेमा भारत के साथ—साथ बांग्लादेश में भी पसंद किया जाता है। उनकी आख़िरी फिल्म 'तितास एकटि नदीर नाम' जो अद्वैत मल्लबर्मन के उपन्यास पर आधारित है, भारत—बांग्लादेश के संयुक्त सहयोग से ही बनी थी। उनकी दीगर फिल्मों की तरह इस फिल्म का अंत भी सकारात्मक है। उन्होंने नये जीवन का संकेत देकर फिल्म का अन्त किया है। सच बात तो यह है कि यही मार्क्सवाद और उसका सही पै$गाम है।
फिल्म बनाने के पीछे ऋत्विक घटक का मकसद क्या था ? इसका जवाब भी उन्होंने अपने एक इंटरव्यू में दिया था, ''फिल्म बनाने का प्राथमिक उद्देश्य मानवजाति के लिए भलाई करना है। यदि आप मानवता के लिए भलाई न करें, तो कोई भी कला, सच्ची कला का कार्य नहीं है। मानवता के प्रति प्रेम ही एकमात्र महत्वपूर्ण चीज़ है। फिल्मों का प्राथमिक उद्देश्य....सि$र्फ फिल्म ही नहीं, किसी भी कला का....अपने देश के लोगों की समकालीन विपत्ति और संघर्षों का चित्रण होना चाहिए।'' और ऋत्विक घटक ने अपनी फिल्मों के ज़रिए यही किया। चाहे नाटक हो या फिर सिनेमा, उनके लिए यह सिस्टम को बदलने का हथियार भर था। एक बेहतर समाज के निर्माण का। उन्होंने अपनी फिल्मों से लोगों का मनोरंजन किया, लेकिन समाज में इंसानियत और भाईचारा बचा रहे, इसकी भी पूरी कोशिश की। उन्हें इंसानों—अपने देशवासियों से बेहद मुहब्बत थी। उनका एकमात्र चिन्तन अपने देशवासियों के प्रति था। घटक का कहना था, ''आप मनुष्यों के प्रति प्रेम के बिना कोई काम कैसे करेंगे ?...लोगों से प्रेम करना, उनकी सेवा करना और उनके लिए बोलना...और यह सब कला के माध्यम से अभिव्यक्त होना चाहिए।'' यही वजह है कि ऋत्विक घटक और उनका सिनेमा आज भी प्रासंगिक हैं। और आगे भी रहेगा। नई पीढ़ी उनके सिनेमा और विचारों से हमेशा प्रेरणा लेती रहेगी।


