Top
Begin typing your search above and press return to search.

रविदास-क्रांतिकारी चेतना चेतना के संवाहक संत

भारतीय समाज के इतिहास में संत रविदास केवल एक संत या कवि नहीं, बल्कि एक ऐसी वैचारिक आग हैं जो सदियों से जली आ रही है ऐसी आग जो रोशनी भी देती है

रविदास-क्रांतिकारी चेतना चेतना के संवाहक संत
X
  • डॉ घनश्याम बादल

इन दिनों जब देश में जातिवादी एवं वर्गवादी बंटवारे को लेकर गहरी बहस चल रही है तब संत रविदास कहीं अधिक प्रासंगिक हो जाते हैं। आज उनकी जयंती है इस अवसर पर उन्हें नए संदर्भ में याद करना तो बनता है।

भारतीय समाज के इतिहास में संत रविदास केवल एक संत या कवि नहीं, बल्कि एक ऐसी वैचारिक आग हैं जो सदियों से जली आ रही है ऐसी आग जो रोशनी भी देती है और जलाने की कुव्वत भी रखती है।

वर्ग एवं जातिवादी सोच ने जिस समाज में जाति, श्रम और मानव गरिमा के बीच गहरी खाइयाँ बनाई गईं, वहाँ संत रविदास ने अपनी वाणी और जीवन से उन दीवारों पर सीधा प्रहार किया। आज जब सामाजिक न्याय, समानता और लोकतांत्रिक मूल्यों की बातें फिर से संघर्ष के केंद्र में हैं, तब संत रविदास को केवल स्मरण करना नहीं, बल्कि समझना और अपनाना समय की मांग है।

संत रविदास की सबसे बड़ी विशेषता उनका निर्भीक विचार-साहस था। वे उस समय खड़े हुए जब समाज में जन्म से तय की गई हैसियत को ईश्वर की मर्जी बताकर स्थापित किया जा चुका था। रविदास ने इसे सीधे चुनौती दी। उन्होंने कहा कि मनुष्य की पहचान उसके कर्म से है, न कि जाति से। यह कथन आज के संविधान के मूल भाव से मेल खाता है, लेकिन अपने समय में यह क्रांतिकारी विद्रोह था।

उनकी दूसरी बड़ी विशेषता थी श्रम की प्रतिष्ठा। चर्मकार होने के कारण उन्हें सामाजिक तिरस्कार झेलना पड़ा, लेकिन उन्होंने अपने पेशे को कभी हीन नहीं माना। उनके लिए श्रम साधना था और साधना ही ईश्वर-प्राप्ति का मार्ग। आज जब 'वर्कर डिग्निटीÓ, 'अनौपचारिक श्रमÓ और 'श्रमिक अधिकारÓ जैसे प्रश्न फिर से बहस के केंद्र में हैं, तब रविदास का यह दृष्टिकोण और अधिक अर्थपूर्ण हो जाता है।

संत रविदास की कल्पना की बेगमपुर अवधारणा समानता का राजनीतिक स्वप्न है। उनकी विचारधारा का सबसे सशक्त प्रतीक है उनका 'बेगमपुराÓ । एक ऐसा समाज जहाँ कोई दुखी नहीं, कोई शोषित नहीं, कोई ऊँच-नीच नहीं। यह केवल आध्यात्मिक कल्पना नहीं थी, बल्कि एक सामाजिक-राजनीतिक घोषणापत्र था।

उनकी कल्पना के बेगमपुरा में न कर है, न भय है, न भेदभाव। यह आज के संदर्भ में एक कल्याणकारी, समतामूलक और लोकतांत्रिक राज्य की परिकल्पना है। सवाल यह है कि क्या आज का भारत, जहाँ असमानता बढ़ रही है, सामाजिक विभाजन गहराता जा रहा है—बेगमपुरा के आदर्शों के करीब जा रहा है या उनसे दूर?

संत रविदास का जीवन चुनौतियों से भरा था। उन्हें केवल व्यक्तिगत अपमान नहीं सहना पड़ा, बल्कि सामाजिक बहिष्कार और धार्मिक श्रेष्ठतावाद की संगठित हिंसा का सामना करना पड़ा। उनकी साधना, वाणी और शिष्यों को यह कहकर खारिज किया गया कि 'नीच जाति का व्यक्ति ज्ञान कैसे दे सकता है?Ó यह वही मानसिकता है जो आज भी अलग-अलग रूपों में जीवित है। कभी आरक्षण-विरोध के नाम पर, कभी मेरिट की आड़ में, तो कभी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के बहाने तो कभी यूजीसी के नियमों के विरोध के रूप में।

रैदास ब्राह्मणवादी धार्मिक संरचना के भीतर रहकर ही उसे चुनौती दे रहे थे। उन्होंने धर्म को छोड़ा नहीं, बल्कि धर्म के भीतर व्याप्त अन्याय को बेनकाब किया। यह रास्ता आसान नहीं था। यह प्रत्यक्ष विद्रोह नहीं, बल्कि विचारों की दीर्घकालिक लड़ाई थी।

यद्यपि संत रविदास की वाणी में स्त्री-प्रश्न सीधे रूप में बहुत मुखर नहीं रहा, लेकिन उनकी समता-दृष्टि स्वाभाविक रूप से पितृसत्ता-विरोधी है। उनकी शिष्या मीराबाई का उदाहरण बताता है कि रविदास की साधना में स्त्री के लिए भी समान आध्यात्मिक अधिकार था। आज के दौर में, जब स्त्री की स्वतंत्रता और सम्मान फिर से सामाजिक संघर्ष का विषय है, रविदास की समता-दृष्टि एक मौन लेकिन मजबूत आधार देती है।

आज का भारत कई स्तरों पर संकट से गुजर रहा है—सामाजिक ध्रुवीकरण, बढ़ती आर्थिक असमानता, हाशिए के समुदायों पर हिंसा और विचारों पर नियंत्रण। ऐसे समय में संत रविदास की प्रासंगिकता केवल ऐतिहासिक नहीं, बल्कि राजनीतिक और नैतिक है। जब संविधान की प्रस्तावना में लिखे 'समताÓ और 'बंधुत्वÓ सवालों के घेरे में हों, तब रविदास की वाणी जवाब बनकर खड़ी होती है। जब श्रमिकों और दलितों की आवाज़ को बार-बार दबाया जाए, तब रविदास का जीवन प्रतिरोध का पाठ पढ़ाता है।

जब धर्म को सत्ता का औजार बनाया जाए, तब रविदास याद दिलाते हैं कि सच्चा धर्म मनुष्यता है, वर्चस्व नहीं। संत रविदास की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि उन्हें अक्सर केवल जयंती और मंचीय भाषणों तक सीमित कर दिया जाता है। उनकी मूर्तियाँ लगती हैं, लेकिन उनके विचारों को सामाजिक व्यवहार में जगह नहीं मिलती। यह रविदास के साथ सबसे बड़ा अन्याय है।

संत रविदास हमें यह नहीं सिखाते कि व्यवस्था के सामने सिर झुका दिया जाए, बल्कि यह सिखाते हैं कि विचारों के स्तर पर व्यवस्था को चुनौती दी जाए। वे हमें बताते हैं कि क्रांति केवल नारे से नहीं, बल्कि जीवन-पद्धति से आती है। संत रविदास आज भी सबसे प्रासंगिक चिंतकों में से एक हैं। वे हमें आईना दिखाते हैं कि बिना सामाजिक न्याय के कोई भी राष्ट्र नैतिक रूप से महान नहीं हो सकता। रविदास का स्पष्ट संदेश है कि जब तक समाज में कोई एक भी व्यक्ति जाति, श्रम या जन्म के कारण अपमानित है, तब तक वह राष्ट्रीय समाज समता मूलक ढंग से वास्तविक प्रगति या विकास नहीं कर सकता।


Next Story

Related Stories

All Rights Reserved. Copyright @2019
Share it