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साहित्य में भी गोदी मीडिया जैसे सवाल : मगर ज्ञानरंजन प्रगतिशीलता से डिगे नहीं

इस पर बहुत लिखा गया। और एकदम दो सिरों पर जाकर। ज्ञानरंजन की आलोचना बहुत हुई। सही संदर्भ में उनकी बातों को रखा कम गया। इंटरव्यूकर्ता का शायद उद्देश्य भी यही था

साहित्य में भी गोदी मीडिया जैसे सवाल : मगर ज्ञानरंजन प्रगतिशीलता से डिगे नहीं
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- शकील अख्तर

इस पर बहुत लिखा गया। और एकदम दो सिरों पर जाकर। ज्ञानरंजन की आलोचना बहुत हुई। सही संदर्भ में उनकी बातों को रखा कम गया। इंटरव्यूकर्ता का शायद उद्देश्य भी यही था। ज्ञानरंजन के बारे में परिचय जैसा क्या लिखें? किसी और भारतीय भाषा के होते तो अपमान लगता। मगर हिन्दी में लगता है इतना तो बताना चाहिए कि बड़े लेखक और संपादक। 70 के दशक के बहुत चर्चित कहानीकार। जिनकी एक कहानी घंटा ने ही सबसे ज्यादा उनका नाम किया। और प्रसिद्ध आलोचक नामवर सिंह ने इस को तो स्वीकार किया मगर बाकी कहानियों को नहीं और उन्हें डेढ़ कहानी का कहानीकार कहा। इस पर इंटरव्यू में ज्ञानरंजन ने अपनी नाराजगी भी जाहिर की है और कारण भी बताया है। इसी को लेकर ज्ञानरंजन बहुत आलोचना के शिकार हुए कि उन्होंने इस प्रसंग में काशीनाथ सिंह को कमजोर कहानीकार बता दिया। काशीनाथ नामवर के भाई।

ऐसे ही कई और लेखक कवियों पर ज्ञानरंजन की टिप्पणियों को लेकर उन पर हमला हुआ। मगर हां यहां कहानीकार के बाद उनका दूसरा सबसे बड़ा परिचय और लिख दें। पहल के संपादक का। एक ऐसी पत्रिका जो जबलपुर से निकलती थी और पूरे हिन्दी जगत में बहुत महत्वपूर्ण स्थान रखती थी। चूंकि अख़बार में लिख रहे हैं। जहां सब तरह के पाठक होते हैं इसलिए साहित्य के बारे लिखते समय थोड़े विस्तार से बताने में कोई हर्ज नहीं है। तो इसके लिखने का कारण वह वीडियो इंटरव्यू है जो अजुंम शर्मा ने लिया। लेखकों के आम तौर पर छपे हुए इंटरव्यू होते हैं। जिन्हें पढ़ना आसान होता है। और ज्ञानरंजन वाला इंटरव्यू देखकर लगा कि लेखक उसी में खुद को और अपने लिखने को सही परिप्रेक्ष्य में पेश कर पाता है। यह बड़ा इंटरव्यू है। शायद डेढ़ घंटे से ज्यादा का। कई किस्तों में देख पाए। लिखा हुआ तो शायद ही कभी बीच में छोड़ा हो। चाहे जितना बड़ा हो। ज्ञानरंजन को अपनी तमाम भलमनसाहत के बावजूद इंटरव्यू में कहना पड़ा और यह भी कि फंसाइए नहीं मुझे। नेता होते हैं तो वे माइक धकेल देते हैं सामने से जैसा अभी अखिलेश यादव ने किया। अखिलेश का जिक्र इसलिए कि इंटरव्यूकर्ता अंजुम शर्मा भी इस इंटरव्यू में उनका नाम ले आए। आलोचक वीरेन्द्र यादव की छवि खराब करने की कोशिश में।

खैर अब मूल बात। पूरे इंटरव्यू का सार यह है कि ज्ञानरंजन शुरू से लेकर आखिरी तक प्रगतिशील विचारधारा की बात करते रहे। और अंजुम शर्मा लगातार प्रगतिशीलता के विरोध में सवाल लाते रहे। पहल के बारे में पूछते हैं सिर्फ प्रगतिशील छपे? ज्ञानरंजन नहले पर दहला मारते हैं कि नहीं अशोक वाजपेयी भी छपे।

इस इंटरव्यू को बहुत सावधानी से देखने की जरूरत है। और अभी हम जितना लिख पा रहे हैं, अखबार की स्थान सीमा के अंदर उससे बहुत ज्यादा विस्तार से लिखने की जरूरत है। क्योंकि दरअसल ये बारीक कारीगरी के साथ साहित्य की प्रगतिशील विचारधारा पर वे किए जा रहे हमले ही हैं। प्रिंट से इलेक्ट्रोनिक माध्यम में आकर। क्योंकि यहां ज्यादा लोग देखते हैं। चर्चा ज्यादा और अनुकूल हो जाती है। अभी ज्ञानरंजन का इंटरव्यू भी बहुत देखा गया। लेखकों के पढ़े जाने वाले साक्षत्कारों से तुलना करें तो उससे कई गुना ज्यादा। और मैसेज जो लेखक के इंटरव्यू का जाना चाहिए उनके लेखन के बारे में ज्यादा जिज्ञासा उसके उलट यह गया कि ज्ञानरंजन लेखक कवियों पर गलत टिप्पणियां कर रहे हैं। आप देखिए कि साहित्यकार वह भी 88 वर्ष के हिन्दी के इस समय के आखिरी सबसे बड़े लेखकों में एक और साहित्यिक संपादक तो एक मात्र उनसे कैसे पूछा जाता है!

रेपिड क्वश्चयन। इंटरव्यूकर्ता कहते हैं मैं एक नाम लूंगा और आपको उनके बारे में एक शब्द बोलना होगा। इस तरह के फटाफट सवाल जवाब किस के साथ होते हैं? शायद प्रचार पाने के इच्छुक सेलिब्रिटिज के साथ! प्रायोजित प्रोग्राम। तो परसाई के बारे में! जिनके बारे में जब इंटरव्यू के शुरू में अंजुम शर्मा शहर जबलपुर का परिचय देते हुए जहां ज्ञानरंजन रहते हैं तमाम बातें बताते हैं मगर साहित्य में जिनकी वजह से शहर जाना जाता है उन हरिशंकर परसाई का नाम भी नहीं। परसाई प्रगतिशील विचार के साथ उस विचारधारा के लेखकीय संगठन प्रगतिशील लेखक संघ से भी हमेशा जुड़े रहने वाले। और लेखक कितने बड़े! इसे अंजुम के जबलपुर शहर के परिचय में नाम न लेने के बाद ज्ञानरंजन ने बताया कि जबलपुर की साहित्य की पहचान वे थे। और मैंने प्रगतिशील विचारधारा उन्हीं से सीखी है। यहां याद रखिए इलाहाबाद से आया हुआ लेखक प्रगतिशील विचारधारा जबलपुर में सीख रहा है। मगर अंजुम इन बिन्दुओं से बात को आगे नहीं बढ़ाते उनके पास ऐसे सवाल थे कि आप सरकारी विज्ञापन लेते थे। ज्ञानरंजन ने बहुत संयम से जवाब दिया कि सरकारी विज्ञापन जनता के होते हैं। साहित्य की पत्रिका बिना किसी संसाधन के 50 साल निकालना बहुत बड़ी होती है। घर फूंक तमाशा करने वाली जैसी। मगर उस संघर्ष को जानने के बदले इन्टरव्यूकर्ता कहते है कि मैंने बहुत लोगों से बात की किसी की समझ में नहीं आया कि यह पत्रिका थी किसकी? कहानी की कविता की साक्षात्कार की? ज्ञानरंजन क्या खूब जवाब देते हैं। विचारधारा की। विचार प्रमुख है इसकी। विचारधारा को बढ़ाने का माध्यम। यहां इंटरव्यूकर्ता बिल्कुल गोदी मीडिया के पत्राकार एंकरों की तरह रुस और कम्यूनिस्ट पार्टियों को ले आते हैं। मगर ज्ञानरंजन साफ करते हैं जो कि जरूरत नहीं थी। लेकिन इंटरव्यू ही पूरा उस दिशा में था तो कहना पड़ता है कि पहल कम्युनिस्ट पार्टी की पत्रिका नहीं थी। यह ज्ञानरंजन का साहस है कि वे तीनों प्रमुख कम्युनिस्ट पार्टियों सीपीआई एम, सीपीपीआई और सीपीआई एमएल का नाम लेकर बात करते हैं। और तीनों प्रमुख लेखक संगठनों प्रगतिशील लेखक संघ जिसके लिए तो उन्हों काम भी किया और जलेस एवं जसम का भी। लेकिन समस्या यह है जो हमने ऐसे एक दो और वीडियो इंटरव्यू में देखा कि कि इंटरव्यू लेने वाले की कोशिश विचारधारा की बात करते प्रतिक्रियावादी विचारधारा की स्थापना करना होता है। मगर ज्ञानरंजन कहीं नहीं फंसे। हर बार एक ही बात कहते रहे कि हम प्रगतिशील चेतना की बात करते हैं। उसकी कोशिश करते हैं।

आलोचना विचारधारा को लेकर नहीं व्यक्तियों के बारे में उस समय रखी धारणाओं के लेकर हो रही है। इतने बड़े जीवन और बहुत सक्रिय में व्यक्तियों के कई बिम्ब बनते बिगड़ते हैं। और फिर जो हमने बताया रेपिड क्वश्चन उसमें तो एक शब्द के जवाब में कन्ट्रोवर्सी होना ही है। परसाई के लिए जैसा वे थे उन्होंने बहुत अच्छा बोला विश्व दृष्टि रखने वाले। अशोक वाजपेयी कवि अच्छे नहीं। बहुत सारे लोगों को बारे में पूछा। निराला फिराक जैसों से कोई पूछता तो पता नहीं वे क्या हाल करते। इसलिए हमने लिखा कि ज्ञानरंजन भले आदमी हैं। एक और जिस बात को लेकर कंट्रोवर्सी पैदा करने की कोशिश की गई है पिता के साथ संबंधों को लेकर वह बहुत सामान्य और विचारधारात्मक स्तर की है। पिता रामनाथ सुमन बड़े लेखक, स्वतंत्रता सेनानी, गांधीवादी। ज्ञानरंजन लेफ्टिस्ट। तो यह विचारों का संघर्ष उस दौर में कोई अनहोनी बात नहीं थी। पूरे इंटरव्यू में उन्होंने सम्मान और प्रेम के साथ पिता को याद किया है। अपनी कहानी पिता का भी जिक्र किया। जो उन पर है और सकारात्मक है। जिन लोगों ने उनकी सहायता की उन सबके नाम भी ज्ञानरंजन ने याद करके लिए। कहा देशबन्धु के संपादक मायाराम सुरजन जी ने बहुत मदद की। राहुल बारपुते का नाम लिया। और देखिए आप कि रेपिड सवालों में वाजपेयी को अच्छा कवि नहीं कहा मगर सहायता करने वालों में उनका नाम लिया। सुदीप बनर्जी का लिया। धर्मवीर भारती के बारे में कहा कि उन्होंने पांच लेख मेरे विरोध में धर्मयुग में छापे। नामवर सिंह के बारे में भी कहा। राजेन्द्र यादव के भी, उदय प्रकाश के भी। इस संदर्भ में ही अंजुम शर्मा उदय प्रकाश का तो यह कहकर बचाव करते हैं कि उनकी आस्था है मगर अखिलेश यादव का नाम लेकर वीरेन्द्र यादव पर हमला कर देते हैं। ज्ञानरंजन अच्छा जवाब देते हैं कि आप उदय प्रकाश का योगी से सम्मान लेने के मामले को डायलूट कर रहे हैं। असली मुद्दा साहित्य का मूल स्वर क्या होना चाहिए था। जो डायरेक्ट कहीं नहीं आया। मगर अंजुम शर्मा का पूरा जोर इस पर था कि वह प्रगतिशीलता नहीं। और ज्ञानरंजन ने हर सवाल पर विचारधारा की रक्षा करते हुए मजबूती से बताया कि विचार प्रमुख है कहानी कविता साक्षात्कार सब इसके लिए होते हैं। यह प्रगतिशीलता बनाम दक्षिणपंथ का इंटरव्यू था। इसमें व्यक्तियों को लेकर तात्कालिक कारणों से की गई प्रतिकूल टिप्पणियों का उतना महत्व नहीं है। जितना दिया जा रहा है।

एक और खास बात। अंजुम शर्मा ने इंटरव्यू शुरु करते कहा कि यह उनका सौ वां इंटरव्यू है। पहला एक कवि का, 25 वां आलोचक का, 50 वां कहनीकार का, 75 वां आलोचक का। और यह पहली हिन्दी में ऐसी सीरिज है। ठीक है। मगर पहला किस कवि का? 25 वां किस आलोचक का ? इसी तरह बाकी 50 वां, 75 वां किसका? उनके नाम तक नहीं लिए। इतने अमहत्वपूर्ण बना दिए उनको?

मतलब अगर 125 वां होगा तो उसमें सौ वें ज्ञानरंजन का नाम भी नहीं होगा! पाठक इस लिंक पर जाकर इंटरव्यू देख सकते हैं

https://www.youtube.com/watch?v=WaJmZx9qsL8


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