मसीहा और विपरीत भक्त
बुद्ध ने न केवल धर्म के क्षेत्र में 'पाखण्डों' और अत्याचारों से मुक्ति दिलाई, बल्कि एक न्यायपूर्ण समतावादी समाज की रूपरेखा दी। एक स्वस्थ समाज ।

— हरिशंकर परसाई
बुद्ध का भी यही हाल हुआ। बुद्ध ने न केवल धर्म के क्षेत्र में 'पाखण्डों' और अत्याचारों से मुक्ति दिलाई, बल्कि एक न्यायपूर्ण समतावादी समाज की रूपरेखा दी। एक स्वस्थ समाज । बुद्ध की दृष्टि वैज्ञानिक थी। पर अनुयायियों ने जिनसे बुद्ध ने अपना दीपक आप बनने जैसी स्वतन्त्र चिन्तन और लोकतांत्रिक भावना की बात कही थी, फिर क्या किया ? दो भाग हुए- महायान और हीनयान । एक ने शैवों-शाक्तों से ऐसे क्रूर, घृणित, अनैतिक, समाज-विरोधी कर्मकाण्ड ले लिए कि बुद्ध के मूल उद्देश्य ही छूट गये । समाज में वे घृणा की दृष्टि से देखे जाने लगे । बाहर बौद्ध धर्म दक्षिण-पूर्व एशिया, जापान और चीन में गया। इन्होंने बुद्ध का सिखाया क्या माना ? उलटे जापानी साम्राज्यवादी फासिस्ट और क्रूर हो गये । प्रसंगवश याद कर लें कि पिछले कुछ समय से बोध गया (बिहार) में बौद्ध मन्दिर पर कब्जे को लेकर झगड़ा चल रहा है। महंत मंडली में ब्राह्मण और बौद्ध दोनों हैं।
पण्डित हजारी प्रसाद द्विवेदी का एक निबन्ध है - 'घर जोड़ने की माया' । उन्होंने लिखा है कि जब अनुयायी घर जोड़ने की माया में फँसते हैं, तब अपने गुरु के उपदेशों से उलटा करने लगते हैं। कबीरदास मंत्र के विरोधी थे, पर कबीरपंथियों ने दान करने और शौच जाने के भी मंत्र बना लिये हैं । उन्हें ये भी लिखना था कि चेले उसी 'माया महाठगिनी' के चक्कर में मठ की सम्पत्ति के लिए लड़ते हैं । यह भी कि किसी-किसी मठ के मठाधीश ब्राह्मण हो गये हैं, जिनके पाखंडों और कर्मकांडों के खिलाफ कबीर जिन्दगी-भर लड़ते रहे।
गुरु, पंथ-प्रवर्तक, मसीहा, देवदूत के साथ यह मजाक उसके अनुयायी आगे करते हैं कि उसने जो सिखाया, उससे उलटा करने लगते हैं। जिस अज्ञान और अतर्क से उसने निकाला था, उसी में फिर फँस जाते हैं ।
अन्धविश्वासों से उस मसीहा ने निकाला, उसी के नाम से फिर अन्धविश्वासों में फँस जाते हैं। कारण है। कुछ ही लोग होते हैं, जो उस समझ तक पहुंचते हैं, जिस समझ के स्तर से उसने ज्ञान दिया था। बाकी लोग कर्मकांड करके सन्तुष्ट हो जाते हैं । यह आसान है। बाकी मानसिकता और कर्म में वही फँस जाते हैं, जहां से उसने निकाला था । एक साधु का तोता था । साधु की कुटी के सामने पेड़ था, जिस पर बहेलिये ने जाल बाँध रखा था । साधु तोते को समझाते थे-
उस तक पर है माया जाल
वहाँ न जाना मेरे लाल
तोते ने इसे रट लिया । साधु निश्चित हो गये । एक दिन तोता पेड़ पर गया और जाल में फँस गया। मगर वह बराबर बोल रहा था-
उस तक पर है माया जाल
वहाँ न जाना मेरे लाल
मसीहा के अनुयायी अपने को कहने वालों का हाल उस तोते सरीखा हो जाता है ।
मसीहा, देवदूत, धर्म-प्रवर्तक वास्तव में विद्रोही और मुक्तिदाता होते हैं। पर यह इतिहास की त्रासदी है कि शोषक शक्तियाँ फिर लोगों को अज्ञानी, अन्धविश्वासी और केवल कर्मकांडी बना देती हैं- उसी मुक्तिदाता मसीहा के नाम और पंथ पर ।
चले आ रहे यहूदी धर्म के पाखंड, भ्रष्टाचार, कर्मकाण्ड, अन्धविश्वास से ईसा ने मुक्ति दिलाई। इतनी करुणा, दया, क्षमा, परोपकार शायद किसी के उपदेशों में नहीं है जितना ईसा के बहुत सरल धर्म है। बहुत कम कर्म- काण्ड है । ईसा कहते हैं- मेरे इन भाइयों में से अन्तिम के लिए जो तुम करते हो, वह तुम मेरे लिए करते हो। दरिद्र धन्य हैं, वे प्रभु के राज्य के अधिकारी होंगे । 'टेन कमांडमेंट्सÓ में कितनी अच्छी बातें हैं। ईसा के पंथ में समता, न्याय, शोषणहीनता है ।
पर आगे क्या हुआ ? सहज विश्वासी लोगों के मानस पर संगठित पादरी- वर्ग ने अधिकार कर लिया। धर्मसत्ता राजसत्ता से ऊपर हो गई। ईसा के उपदेशों का पाठ करने वाले यूरोप के ईसाई साम्राज्यवादियों ने एशिया, अफ्रीका के लोगों पर कितनी क्रूरता की कितने अत्याचार किये ! करुणा की जगह क्रूरता ने ले ली । पर ये लोग नियमित चर्च जाते रहे, प्रार्थना करते रहे, ईसा के उपदेश सुनते रहे ।
ताल्सताय पक्के ईसाई थे, पर धर्म के कर्मकाण्डों से, पाखण्डी पादरियों से नफरत करते थे । उन्होंने चर्च जाना छोड़ दिया था। चर्च वाले उन्हें नास्तिक कहने लगे थे। पर महात्मा गांधी ने कहा था--ताल्सताय यूरोप में सबसे सच्चे ईसाई हैं ।
बुद्ध का भी यही हाल हुआ। बुद्ध ने न केवल धर्म के क्षेत्र में 'पाखण्डों' और अत्याचारों से मुक्ति दिलाई, बल्कि एक न्यायपूर्ण समतावादी समाज की रूपरेखा दी। एक स्वस्थ समाज । बुद्ध की दृष्टि वैज्ञानिक थी। पर अनुयायियों ने जिनसे बुद्ध ने अपना दीपक आप बनने जैसी स्वतन्त्र चिन्तन और लोकतांत्रिक भावना की बात कही थी, फिर क्या किया ? दो भाग हुए- महायान और हीनयान । एक ने शैवों-शाक्तों से ऐसे क्रूर, घृणित, अनैतिक, समाज-विरोधी कर्मकाण्ड ले लिए कि बुद्ध के मूल उद्देश्य ही छूट गये । समाज में वे घृणा की दृष्टि से देखे जाने लगे । बाहर बौद्ध धर्म दक्षिण-पूर्व एशिया, जापान और चीन में गया। इन्होंने बुद्ध का सिखाया क्या माना ? उलटे जापानी साम्राज्यवादी फासिस्ट और क्रूर हो गये । प्रसंगवश याद कर लें कि पिछले कुछ समय से बोध गया (बिहार) में बौद्ध मन्दिर पर कब्जे को लेकर झगड़ा चल रहा है। महंत मंडली में ब्राह्मण और बौद्ध दोनों हैं। परिसर में शिवलिंग और वैष्णव मन्दिर भी हैं। न जाने कब कैसे ब्राह्मणों ने इस मठ पर कब्जा कर लिया। एक बार जयप्रकाश नारायण ने मठ को ब्राह्मणों से मुक्त कराने के लिए 'मुक्तिवाहिनीÓ भेजी थी, पर प्रधान महंत ने अपने लठतों से उसकी पिटाई कराके भगवा दिया। जायदाद है, सम्पत्ति है वहाँ । इसलिए कब्जे का झगड़ा है। वहां कुछ समय से महाराष्ट्र के अम्बेडकरवादी लड़ाकू नवबौद्ध कब्जा लेने जा रहे हैं। कहते हैं-उधर से विश्व हिन्दू परिषद ने कमर कस ली है । झगड़ा बढ़ सकता है।
धर्म का तत्त्व यही रह गया है - ढाँचे पर, इमारत पर महंती पर, मठा- धीशी पर झगड़ा । आचरण से वह मूल तत्त्व निकल गया ।
स्वामी विवेकानन्द क्रान्तिकारी थे - राजनैतिक, सामाजिक, धार्मिक क्रान्तिकारी। वे एक वर्ग वेतन क्रान्ति- कारी चिन्तक थे । इसका प्रचार नहीं करके, यह प्रचार किया जा रहा है कि वे एक पुरातनवादी, गतिहीन, चेतनाहीन वैदिक धर्म के व्याख्याता थे, जिन्होंने हमारे धर्म की पताका दुनिया में फहराई । अगर विवेकानन्द आज होते तो वे उन कट्टर सम्प्रदायवादियों के सबसे बड़े विरोधी होते, जो उनकी जय बोलते हैं, उनकी प्रतिमा के जुलूस निकालते हैं, और उन पर अपने अधिकार मानते हैं ।
विवेकानन्द धर्म, पंथ के मामले में निहायत उदार थे। वे धर्मों, पंथों की अलग-अलग नदियां मानते थे। ये सब नदियाँ सागर में मिलनी चाहिए, जिससे एक 'विश्व धर्मÓ की प्राप्ति होगी। विवेकानन्द ऐसे विश्व-धर्म के रूप के बारे में चिन्तन करते थे। उनका वैसे भी अमेरिका, यूरोप, भारत में किसी भी धर्म वालों ने विरोध नहीं किया। उनके विचार इतने उदात्त और उदार थे। सिर्फ 'थियोसाफिस्टों' ने उनके विरोध में अमेरिका और ब्रिटेन में मनगढ़ंत बातें उड़ा दीं। उन्हें तंग भी किया। इनको उन्होंने एक भाषण में करारा जवाब दिया- जिस आदमी का चौदह साल तक यह ठिकाना नहीं रहा हो कि अगला भोजन कहाँ मिलेगा और आज की रात कहाँ सोऊँगा, जो आदमी शून्य डिग्री से काफी नीचे शीत में बिना कपड़ों के रहा — उस आदमी को झुकाना आसान नहीं है ।
विवेकानन्द अपने को 'समाजवादी' कहते थे। विवेकानन्द केवल भारत के शोषितों के बारे में नहीं, दुनिया के शोषितों के बारे में सोचते थे । न्यूयार्क में एक सभा में उन्होंने कहा था- तुम गोरे अमेरिकी लोगों ने कालों को, नीग्रो को क्यों मुक्त किया ? क्यों दास प्रथा खत्म की ? तुम समझते हो तुमने बड़ा मानवीय काम किया। तुम्हारा मन तो वही है । जब नीग्रो थे तब उनका मालिक रक्षक होता था। अब उनका कोई रक्षक नहीं । गोरे लोग नीग्रो को सड़क पर यातना देकर मार डालते हैं. तुम्हारा कानून उसकी रक्षा नहीं करता। उन्हें मारने वालों को दण्ड नहीं मिलता ।
विवेकानन्द मूर्तिपूजा, धार्मिक कर्मकाण्ड आदि के खिलाफ थे ।विवेकानन्द घोर साम्राज्यवाद विरोधी थे । अंग्रेज साम्राज्यवादियों ने भारत के लोगों की क्या दुर्गति की है, इसका विस्तृत विवरण उन्होंने अपनी एक शिष्या को लिखा था । अन्त में लिखा था- मैंने जो तुम्हें लिखा, वह तुम प्रकाशित करा दो, तो तुम्हारी जाति की सरकार मुझे पकड़कर ब्रिटेन बुला लेगी और वहाँ फाँसी दे देगी और कोई अंग्रेज इसका विरोध नहीं करेगा । विवेकानन्द इन विचारों के ऐसे व्यक्तित्व और कर्म के व्यक्ति थे, पर उन्हें एक संकीर्ण दृष्टि स्वामी के रूप में प्रचारित किया जाता है।


