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भारत का झण्डा

भारत का झण्डा फहरै

भारत का झण्डा
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  • मैथिलीशरण गुप्त

भारत का झण्डा फहरै।

छोर मुक्ति-पट का क्षोणी पर,

छाया काके छहरै॥

मुक्त गगन में, मुक्त पवन में,

इसको ऊँचा उड़ने दो।

पुण्य-भूमि के गत गौरव का,

जुड़ने दो, जी जुड़ने दो।

मान-मानसर का शतदल यह,

लहर लहर का लहरै।

भारत का झण्डा फहरै॥

रक्तपात पर अड़ा नहीं यह,

दया-दण्ड में जड़ा हुआ।

खड़ा नहीं पशु-बल के ऊपर,

आत्म-शक्ति से बड़ा हुआ।

इसको छोड़ कहाँ वह सच्ची,

विजय-वीरता ठहरै।

भारत का झण्डा फहरै॥

इसके नीचे अखिल जगत का,

होता है अद्भुत आह्वान!

कब है स्वार्थ मूल में इसके ?

है बस, त्याग और बलिदान॥

ईर्षा, द्वेष, दम्भ; हिंसा का,

हदय हार कर हहरै।

भारत का झण्डा फहरै॥

पूज्य पुनीत मातृ-मन्दिर का,

झण्डा क्या झुक सकता है?

क्या मिथ्या भय देख सामने,

सत्याग्रह रुक सकता है?

घहरै दिग-दिगन्त में अपनी

विजय दुन्दभी घहरै।

भारत का झण्डा फहरै॥


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