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पश्चिम के उस देश में जो सदा कलाकारों को प्रिय रहा है

सैंट पीटर गिरजाघर के बाद सैंट पाल रोम का सबसे बड़ा गिरजाघर है। 1823 के अग्निकांड में जल जाने के बाद लगभग समूचा गिरजाघर ही फिर से बनाया गया है

पश्चिम के उस देश में जो सदा कलाकारों को प्रिय रहा है
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  • सेठ गोविंददास

सैंट पीटर गिरजाघर के बाद सैंट पाल रोम का सबसे बड़ा गिरजाघर है। 1823 के अग्निकांड में जल जाने के बाद लगभग समूचा गिरजाघर ही फिर से बनाया गया है। यह गिरजाघर कान्स्टेन्टाइन ने बनवाया था। इसी स्थल पर सैंट पाल का सिर उतारा गया था। पाँचवीं शताब्दी में इस गिरजाघर को बड़ा बनाया गया।

हम सबसे पहले रोम के प्रसिद्ध सैंट पाल गिरजाघर को देखने गए। कितना विशाल, भव्य और सुंदर यह गिरजाघर है। बनावट तथा उसकी सामग्री में तो नहीं, परंतु विशालता, भव्यता और सौंदर्य में इसका पूरा मिलान काहरा की मुहम्मद अली की मस्जिद से हो सकता है। जैसा विशाल, भव्य और सुंदर यह गिरजाघर है वैसी ही काहरा की वह मस्जिद और दोनों है उस जगदाधार जगदीश्वर की वंदना के स्थान। मुझे एकाएक दक्षिण भारत के ऐसे ही विशाल, भव्य और सुंदर श्री रंग, रामेश्वर एवं मीनाक्षी देवी मंदिरों का स्मरण हो आया। उन मंदिरों के गोपुरों, मंडपों आदि में भी ऐसी ही विशालता, भव्यता और सौंदर्य दिखता है, चाहे बनावट सर्वथा दूसरे प्रकार की ही क्यों न हो। तो स्थापत्यकला की भिन्न-भिन्न प्रणालियों से इन वस्तुओं का मन पर जो प्रभाव पड़ता है, उस प्रभाव का कोई संबंध नहीं है। चाहे स्थापत्यकला भिन्न-भिन्न प्रकार की हो, पर यदि निर्मित वस्तु में विशालता है, भव्यता है और सौंदर्य है तो मन पर उस वस्तु का प्रभाव एक-सा ही पड़ेगा। हाँ, इस दर्शन से आनंद प्राप्त करने के लिए मन को उदार होने की आवश्यकता अवश्य है। यदि मन में संकीर्णता है और धर्मांधता कि इस प्रकार की भावना कि चाहे हाथी के पैर के नीचे कुचल जाओ पर जैन मंदिर में पैर न रखो तो फिर मन को कोई आनंद प्राप्त नहीं हो सकता। इसलिए गाँधी जी की प्रार्थना के समय 'रघुपति राघव राजा राम' के साथ 'ईश्वर अल्लाह तेरे नाम' भी गाया जाता था। मेरे मन में काहरा की मुहम्मद अली को मस्जिद और रोम के सैंट पाल गिरजाघर के दर्शन से कुछ वैसे ही आनंद की उत्पत्ति जैसे भारत में दक्खिन के विशाल मंदिरों के दर्शन के समय हुई थी और इस आनंद में मुझे उस परमपिता परमात्मा की भी याद आई जिसकी महानता के स्मरण के लिए ही इन महान वस्तुओं का निर्माण हुआ था। हाँ, काहरा की मस्जिद और रोम के इस गिरजाघर की $कब्रें मुझे ज़रा भी अच्छी न लगीं। नित्य के उस दर्शन की मन में अभिलाषा उत्पन्न कराने के लिए जिन ऐसी वस्तुओं का निर्माण होता है उनमें इस क्षणभंगुर अनित्य शरीर की कल क्यों बनाई जाएँ।

सैंट पीटर गिरजाघर के बाद सैंट पाल रोम का सबसे बड़ा गिरजाघर है। 1823 के अग्निकांड में जल जाने के बाद लगभग समूचा गिरजाघर ही फिर से बनाया गया है। यह गिरजाघर कान्स्टेन्टाइन ने बनवाया था। इसी स्थल पर सैंट पाल का सिर उतारा गया था। पाँचवीं शताब्दी में इस गिरजाघर को बड़ा बनाया गया। समय-समय पर गिरजाघर में और भी सजावट होती रही। अंत में इसकी गणना सर्वोत्तम गिरजाघरों में होने लगी। प्रोटेस्टेंट मतानुयायियों के सुधार-आंदोलन से पहले यह गिरजाघर इंग्लैंड के बादशाह के संरक्षण में रहता था।

यह गिरजाघर कालडेरिनी के डिज़ाइन के आधार पर तैयार किया गया है। इसमें 146 स्तंभ है। मध्य में सैंट पाल की मूर्ति है। पीछे गुलाबी ग्रेनाइट के दस स्तंभ हैं।

इस गिरजाघर से हम गए उस स्थान पर जहाँ किसी ज़माने में मानव से सिंह की कुश्ती कराई जाती थी और उसे देखने चारों ओर नर-नारी एकत्रित होते थे।

वह स्थान फ्लैवियन (स्नद्यड्ड1द्बड्डठ्ठ) वंश के सम्राट् वैस्पेसियन ने बनवाया था। इसी स्थल पर नीरो के उद्यान की अप्राकृतिक झील थी। इस इमारत को सम्राट वैस्पेसियन के पुत्र टीटस ने 80 ईसवी में पूरा किया। इसका उद्घाटन समारोह सौ दिन तक चलता रहा और इस बीच कोई पाँच हज़ार वन्य पशुओं का वध किया गया। भूचाल, मरम्मत न होने और नागरिकों के दुरुपयोग के कारण यह इमारत बहुत कुछ नष्ट हो गई। इसे कोलोसियम कहा जाता है जो रोमन सम्राटों का क्रीड़ास्थल था और बर्बरता का केंद्र भी। कोलोसियम नाम पड़ने का कारण या तो यह हो सकता है कि यह इमारत ही अत्यंत विशाल है अथवा यह कि पास ही में नीरो की जो मूर्ति है वह अत्यंत विशाल है। यह इमारत अंडाकार है। इसका घेरा 576 गज है, लंबाई 205 गज है और चौड़ाई 170 गज है। इसकी ऊँचाई 157 फुट है। इमारत चौमंजिली है। अंदर अखाड़े के चारों ओर 50 हज़ार दर्शकों के बैठने लायक स्थान है। अखाड़े में मसीहियों पर किए गए अनेक अत्याचारों के स्मारक के रूप में क्रॉस रखा हुआ है। इमारत की चार मंजि़लों में से पहली तीन में स्तंभ हैं जो क्रमश: डौरिक, आयोनिक और कोरिथियन $िकस्म के हैं। चौथे मंजिल पर दीवार है जिसमें चौकोर खिड़कियाँ हैं।

इसके अंदर के अखाड़े की लंबाई 94 और चौड़ाई 59 गज है। अखाड़े के मैदान के चारों और पाँच गज ऊँचा चबूतरा-सा हैं। यह स्थान सम्राट के बैठने के लिए होता था। बड़े-बड़े अधिकारी —सेनेट के सदस्य, मजिस्ट्रेट, राजदूत, पुरोहित आदि और देवदासी कुमारियों को भी यहाँ स्थान दिया जाता था।

पहली मंजि़ल बहादुर जवानों और सरदारों के लिए होती थी। बीज की मंजि़ल नागरिकों के लिए होती थी और इसके उपरांत दीन जनों के लिए देखने का प्रबंध था। महिलाओं के लिए अलग गैलरी निश्चित थी।

प्राचीनकाल में यह कहा जाता था कि जब तक रोम में कोलोसियम है तब तक रोम भी है, इसके पतन के साथ-साथ रोम का पतन हो जाएगा और रोम के पतन के साथ-साथ संसार का पतन हो जाएगा।

पुस्तक : पृथ्वी परिक्रमा (पृष्ठ 55)

रचनाकार : सेठ गोविंददास

प्रकाशन : हिंदी प्रिंटिंग प्रेस संस्करण : 1954


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