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एक गंभीर भूल के गंभीर परिणाम!!

लचकलाल इधर घर से बाहर पाँव रखे नहीं कि उसे घरवाली के भयंकर ताने घेरने शुरू कर देते हैं।

एक गंभीर भूल के गंभीर परिणाम!!
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— भूपेन्द्र भारतीय

लचकलाल इधर घर से बाहर पाँव रखे नहीं कि उसे घरवाली के भयंकर ताने घेरने शुरू कर देते हैं। इधर इन दिनों पड़ोसी अलग व्यंग्य भरी हँसी से लचकलाल का अभिवादन करने लगे हैं। उधर कार्यालय के साथी अलग आतंकी नजरों से लचकलाल को घूरते हैं। उसे इस गंभीर भूल की भारी कीमत चुकानी पड़ रही हैं।

चकलाल से पिछले दिनों एक गंभीर भूल हो गई। यह भूल कोई छोटी मोटी नहीं थी। बड़ी गंभीर व गंभीर परिणाम वाली हुई। अक्सर युवा अवस्था में युवाओं से गंभीर भूल हो जाती है लेकिन उसे प्रौढ़ व वृद्ध लोग क्षमा कर देते हैं। लेकिन लचकलाल तो अपने कार्यालय में समझदार व्यक्ति माने जाते है। उन्हें उनके बाकी साथी चतुर व सूझबूझ वाला समझते हैं। उस दिन ना जाने क्यों लचकलाल से एक बड़ी ही गंभीर भूल हो गई। लचकलाल भी उस दिन के बाद से आज तक पश्चाताप की अग्नि में झुलस रहा है। उसे अपने ही कार्यालय के कर्मचारी संदेह की दृष्टि से देखते रहते हैं। उस दिन के बाद से कार्यालय के बाकी लोग लचकलाल से एक उचित दूरी बनाने लगे हैं। 'जैसे उससे कोई वायरस चिपक गया हो।' इस भूल के कारण कार्यालय के किसी भी महत्वपूर्ण कार्य की सामान्य बातचीत भी बाकी लोग अब लचकलाल के सामने नहीं करते हैं। लचकलाल उस गंभीर भूल का कैसे प्रायश्चित करें उस कुछ समझ नहीं आ रहा है। इधर उसके घर में भी उसने उस गंभीर भूल की चर्चा गलती से अपनी घरवाली से कर दी। उसके घर से दो सप्ताह से बर्तनों की आवाज मानक ध्वनि प्रदूषण से ज्यादा होने लगी है।

'लचकलाल की घरवाली बात बात में उसे सुनाने लग जाती है कि क्या जरुरत थी उस दिन तुम्हें अपनी रीढ़ की हड्डी के साथ कार्यालय जाने की ? तुम्हारी एक भूल ने हमारा कितना बड़ा नुकसान कर दिया। बड़े आये रीढ़ की हड्डी वाले। अब हमारी ऊपर की इनकम कैसे होगी। सारे महंगे सामान कैसे आयेंगे। बबलू को आपने जो बड़े स्कूल में पढ़ाने भेजा है उसकी फीस के बारे में थोड़ा भी सोचा था ? और आप चल दिये रीढ़ की हड्डी वाले मार्ग पर। बड़ा बनने का शौक आपको ही लगा था। गली की महिलाओं को मैं क्या बताओ कि आप ईमानदार बनने चले थे और कार्यालय के बाकी लोगों की नजरों से उतर गए। बड़े ईमानदार बनने चले थे! एक दिन की तुम्हारी होशियारी ने कर दिया ना सारा कबाड़ा। बड़े आये रीढ़ की हड्डी के साथ कार्यालय जाने वाले। सब हमें शिकायती कहेंगे। कितनी बार बोला है कि जब तक नौकरी में हो अपनी रीढ़ की हड्डी को अलमारी में ही रखी रहने दो। जब सेवानिवृत्त हो जाओ तो फिर लगा लेना उस हड्डी को। पहले भी आपको एक बार अंतरात्मा की आवाज के आने का रोग लगा था। आखिर तालाब में रहकर मगरमच्छों से बैर लेने का आपमें साहस कहाँ से आया। आप इन दिनों किसी गलत संगति में तो नहीं पड़ गए है! '

लचकलाल इधर घर से बाहर पाँव रखे नहीं कि उसे घरवाली के भयंकर ताने घेरने शुरू कर देते हैं। इधर इन दिनों पड़ोसी अलग व्यंग्य भरी हँसी से लचकलाल का अभिवादन करने लगे हैं। उधर कार्यालय के साथी अलग आतंकी नजरों से लचकलाल को घूरते हैं। उसे इस गंभीर भूल की भारी कीमत चुकानी पड़ रही हैं। उसने एक दिन के लिए अपनी रीढ़ की हड्डी के साथ कार्यालय जाने की गंभीर भूल जानबूझकर नहीं की थी। वह तो बस उस दिन जल्दी जल्दी में अलमारी से अपनी युवावस्था के समय का कोर्ट निकाल रहा था तो उसके साथ गलती से ना जाने कब रीढ़ की हड्डी भी आ गई। उस दिन कार्यालय पहुंचता तब तक उसे कुछ समझ नहीं आया कि आज उसके साथ रीढ़ की हड्डी भी है। बाकी दिनों की तरह वह रीढ़विहीन नहीं है! वह तो उस दिन जैसे ही कार्यालय में कुछ पुरानी फाईलों पर दृष्टि गई। लचकलाल के हाथ उन फाईलों का जरूरी कार्य कर आगे बढ़ाने लगा। शुरू में उसे भी कुछ समझ नहीं आया। कई दिनों से लंबित कार्य एक बार में ही हो गया।

कार्यालय के बाकी साथी अपनी चिरपरिचित रीढ़विहीन मुद्रा में बैठे थे। उनका लचकलाल की ओर कोई विशेष ध्यान ही नहीं गया। जब लचकलाल उस दिन दिनभर तक कार्य करता रहा तो शाम को बाकी लोगों का ध्यान उसकी ओर गया कि इसे आज क्या हो गया है यह बाकी दिनों की तरह घर जाने की जल्दी क्यों नहीं कर रहा है? कुर्सी पर से उठ ही नहीं रहा है! कार्यालय के बाकी साथी देखते हैं कि आज लचकलाल ने अपनी टेबल की अधिकांश फाईलों को आगे बढ़ा दिया है। उसके सामने कोई भी आम आदमी गिड़गिड़ा नहीं रहा है। लचकलाल को चाय पिलाने के लिए बाहर नहीं ले जा रहे हैं। वह उस दिन गंभीर होकर कार्य कर रहा था।

उस दिन बीच बीच में लचकलाल भी थोड़ा आश्चर्य में रहा। उसे शाम को घर जाने पर पता चला कि वह आज अपने पुराने कोर्ट के साथ अपनी 'रीढ़ की हड्डीÓ भी साथ पहनकर कार्यालय चला गया था। उस रात उसे निंद नहीं आई। घरवाली बार बार पूछ रही थी कि आज आपको क्या हो गया ? आज आपने ठीक से टिफिन में से भी कुछ नहीं खाया और शाम का भोजन भी कम ही किया। लचकलाल क्या बोलता। उसे पता था घरवाली उसकी इस गंभीर भूल पर पूरा घर अपने माथे पर उठा लेगी। उस रात उसे बार बार यही विचार आ रहे थे कि कल कार्यालय में क्या होगा? बाकी साथियों को इस गंभीर भूल का कारण क्या बताऊंगा। घरवाली को आज नहीं तो कल बताना ही पड़ेगा। लचकलाल को अपनी एक गंभीर भूल के परिणाम साफ दिख रहे थे। उसे इस गंभीर भूल के बाद लगा जैसे वह एक गिरोह का सदस्य है जिसमें एक दिन भी यदि व्यक्ति अपनी रीढ़ की हड्डी के साथ सार्वजनिक जीवन में कार्य करने जाता है तो उसके गंभीर परिणाम होते हैं। वर्तमान व्यवस्था में ऐसी गंभीर भूल उस व्यक्ति के जीवन में गंभीर परिणाम ला सकते हैं!!


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