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इस बार भारत रत्न मुझे दीजिए न!

भारत में रत्न व्यवसाय अत्यंत प्राचीन काल से चला आ रहा है। हमारे रत्न आज विश्व प्रसिद्ध हैं

इस बार भारत रत्न मुझे दीजिए न!
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  • पूरन सरमा

भारत में रत्न व्यवसाय अत्यंत प्राचीन काल से चला आ रहा है। हमारे रत्न आज विश्व प्रसिद्ध हैं। आजादी के बाद यह खूब फला-फूला बल्कि यों कहें तो ज्यादा ठीक होगा कि यहां से हुनर सीखकर हमारे रत्न विदेशों में पलायन करने लगे। इनका फ्यूचर उन्हें वहां ज्यादा ब्राइट लगा, अत: वे वहीं के होकर रह गये। हमारे एक भारत रत्न तो इस समय भी विदेश में रहकर जीवनयापन कर रहे हैं। भारत में रत्नों की कमी नहीं है। वैसे देखा जाये तो सबसे बढ़िया नगीने हमारी वर्तमान राजनीति में विराजमान हैं। इनका एक-एक का इतिहास उठाकर देखें तो मुंह में अंगुली दबाने के सिवा हम और कुछ कर भी नहीं कर सकते। चूंकि ये ही देश के कर्ता-धर्ता हैं, इसलिए ये ही भारत रत्न छांटते हैं और ये ही बांटते हैं। हमारे यहां हर क्षेत्र में जाूदगर मौजूद हैं। साहित्य, कला, सांस्कृति, समाज, खेल अथवा राजनीति, ऐसा कौन सा क्षेत्र है- जहां जादूगरों की कमी हो। हमारे क्रिकेट के रत्न बनाम जादूगर तो सरेआम बोली से नीलाम होते हैं और मैच फिक्सिंग से अलग कमाकर देश का मान और शान दोनों बढ़ाते हैं। इनका व्यक्तिगत जीवन भी बहुत आलीशान होता है। भरपूर मान-सम्मान पाकर ये गदगद रहते हैं तथा भारत रत्न के हकदार भी बनते हैं।

वैसे हमारे यहां मान-सम्मान और पुरस्कार जुगाड़ से मिलते हैं। इसलिए सभी क्षेत्रों में जुगाड़ुओं की संख्या में निरंतर वृद्धि हो रही है। वैसे तो मैं भी विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत का वोटर हूँ। सरकारें बनाता और बिगाड़ता हूँ तो कभी त्रिशंकु बहुमत देकर राजनेताओं को गठबन्धन को विवश कर सत्तालोलुप बनाता हूँ। चूंकि बाद में वे सब घोटाले करके सूद सहित वसूल कर लेते हैं, लेकिन मेरा जादू तो मानेंगे न आप। जब मैं लोकतंत्र का जादूगर हूँ तो अबकी बार भारत रत्न मुझे दे दीजिये। मैं भी भारत का रहने वाला हूँ, पिता का इकलौता रत्न हूँ, भारत की मिट्टी में पला-बढ़ा हूँ, इसलिए मेरा भी पूरा हक बनता है भारत रत्न सम्मान पर। वैसे भी मैं स्वयं एक प्रतिष्ठित रचनाकार हूँ। आजकल दूसरा कोई आपको प्रतिष्ठित माने या न मानें लेकिन खुद को इस भावना से सराबोर रखना चाहिए, ताकि गमों से मेरी जिंदगी खुशफहमी से जी सकें। इस दृष्टि से मैं अकेला वोटर ही नहीं हिन्दुस्तान का जाना-माना रचनाकार भी हूँ। इसलिए इस बार भारत रत्न मेरी झोली में डाल दिया जाये तो हर्ज क्या है।

हमारे यहां तो मरणोपरांत भारत रत्न देने की भी व्यवस्था है। जब रत्न जिंदा होता है, तब तो पता चलता नहीं है कि यह रत्न है। मृत्यु के बाद मूल्यांकन में वह भारत रत्न के योग्य बन जाता है। मेरी नजर में ऐसा सम्मान उचित नहीं है, क्योंकि इसमें जिसको भारत रत्न दिया जाता है, उसको स्वयं को पता नहीं होता है कि वह भारत का रत्न है। इस दृष्टि से भी मैं ठीक हूँ, क्योंकि मैं जीवित हूँ तथा मेरा कृतित्व एवं व्यक्तित्व दोनों निखरे हुये हैं। मैं तो केवल एप्लाई कर सकता हूँ, बाकी इस देश में जुगाड़ बैठाने की मेरी बस की बात नहीं है।


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