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पितृ दिवस-पुत्र की पिता स्व. गोविंद विश्वास भावे को स्मरणांजलि

Father's Day-Son's father Late. Tribute to Govind Biswas Bhave

रामकृष्ण गोविंद भावे

21 जून इस वर्ष अनेक अवसरों का संगम है, प्रथमत: ग्रीष्म अयनांत दिवस, द्वितीय: विश्व संगीत दिवस और तीसरे-तीसरा रविवार- 21 जून विश्व पितृ दिवस (भारतीय संस्कृति में तीन ऋण में एक)- माता-पिता दोनों.

मैंने सोचा कि इस वर्ष पितृ दिवस पर अपने पिताजी श्री गोविंद विश्वास भावे की पुण्य स्मृति में कुछ उपयोगी अनुभव प्रस्तुत किये जायें।

अभी 16 जून को जब मैं अपनी किताबों की अलमारी से फाइलें निकाल कर देख रहा था तब मैंने पाया कि एक फाइल मेरे पिताश्री के कागजों की थी. उनमें सबसे ऊपर थी उनके पेंशन अदायगी आदेश (पीपीओ) की प्रति जो महालेखाकार नागपुर कार्यालय से जारी थी. उसमें जन्म तिथि थी 16 जून 1898. मैंने कहा कि अरे ये तो आज की तारीख है- अर्थात् उनका जन्मदिन हम एकदम पुरानी दुनिया में खो गये।

उस आदेश की प्रति के साथ ही कुछ और कागज, प्रमाण-पत्र थे जो उनके जीवन की कहानी का बखान कर रहे थे. उनके जीवन के ज्ञात-अज्ञात पहलुओं का ज्ञान हो रहा था कि कितना संघर्षमय जीवन उन्होंने जिया था.

पहला प्रमाण पत्र उनकी एम.ए. की डिग्री थी संस्कृत विषय में और तिथि थी 14 नवंबर 1925, यानी 102 वर्ष पुरानी डिग्री जिसने उन्हें नागपुर विश्वविद्यालय में सर्वोच्च अंक प्राप्त करने के कारण 'दाजी हरि वाडेगांवकर स्वर्णपदकÓ दिलवाया था।

फिर उन्होंने जून 1934 में काव्यतीर्थ की परीक्षा उत्तीर्ण की. यह बंगाल केन्द्रित परीक्षा (कोलकाता) थी. इसलिये उनका नाम इस रूप में में लिखा गया - 'गोबिन्दा विस्वास भाबे।

1936 में उन्होंने नागपुर वि. वि. से ही पुरालेख और शिलालेख विद्या (इपीग्राफी एंड पैलियोग्राफी) में एम.ए. परीक्षा उत्तीर्ण की. उसमें दो बातें उल्लेखनीय हैं - एक उनके परीक्षा प्रवेश पत्र में सिर्फ एम.ए. का उल्लेख था पर विषय का नाम दृष्टिगोचर नहीं है, दूसरी रोचक बात यह है कि वे बताते थे इस परीक्षा में विश्वविद्यालय के वे एक मात्र विद्यार्थी थे. उन्हें विश्वविद्यालय ने सूचित किया था कि चूंकि आप अकेले परीक्षार्थी होंगे इसलिये आपको केवल एक बार बैठने का मौका मिलेगा. दूसरी बार वह परीक्षा विवि आयोजित नहीं कर सकेगा. उन्होंने इसका प्रतिकार किया था और कहा था कि शिक्षा कल्याणकारी राज्य की व्यवस्था है, इसलिये यह उचित नहीं होगा. यह बात अलग है कि उनके प्रथम बार में उत्तीर्ण हो जाने से वह स्थिति बनी ही नहीं. मॉरिस कॉलेज से वे पढ़े और उस समय के लब्ध प्रतिष्ठित विद्वान पं.रामप्रताप शास्त्री और पं. वा.वि. मिराशी जैसे प्रकाण्ड विद्वान प्राध्यापकों के वे प्रिय छात्र थे.

इतनी सारी उपाधियां, और स्वर्णपदक और प्रमाण पत्रों के होते हुए भी वे अपनी इच्छित उच्च शिक्षा में अध्यापन के प्रोफेसर जैसे पद न पा सके. कुछ निजी शालाओं में सेवा करते अपने सेवाकाल के अंतिम पड़ाव में वे शासकीय हाईस्कूल में स्थान पा सके. वे जबलपुर के तत्कालीन मॉडल हाईस्कूल से 1953 में सेवानिवृत्त हुए।

अच्छे पद का उनके द्वारा प्राप्त न कर सकने का एक प्रमुख कारण था कि हमारे दादा स्व. विश्वासराव भावे सागर क्षेत्र-जहां के वे निवासी थे, एक जाने माने स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे. वे स्वतंत्रता आंदोलन में सभा-बैठकों में व्यस्त रहते. दो बार जेल की सजा भी प्राप्त कर चुके थे। हर साक्षात्कार में एक प्रश्न स्थिर था आपके पिताश्री क्या करते हैं ? जवाब रहता कि वे नेेशनलिस्ट (राष्ट्रवादी) हैं. परिणाम में इन्कार. 1948 का पी.एस.सी. का एक पत्र रखा है. इसमें लिखा था कि नियुक्ति की अनुशंसा करना संभव नहीं होगा. उनके संपर्क अनेक प्रभावी लोगों से थे. इनमें एक नाम इस संदर्भ में डॉ. रायबहादुर हीरालाल जी का था. जिनका प्रभावशाली व्यक्तित्व था. सन् 1891 में वे सागर में डिप्टी इंस्पेक्टर ऑफ स्कूल्स हुए. उन्हें सागर, दमोह, जैसे अनेक स्थानों के पुरातात्विक, ऐतिहासिक शोध लेखन का श्रेय जाता है. वे 1922 में नरसिंहपुर से डिप्टी कमिश्नर (कलेक्टर) के पद से सेवानिवृत हुए. उन्हें पुरातत्व के विद्वान होने कारण 'वेदि कीर्ति चन्द्रÓ कहा जाता था।

गजेटियर और जनगणना के काम भी उनके नाम से थे. डॉ. रायबहादुर हीरालाल जी के 6-7 पत्र पिताजी के नाम से मिले थे.

जिनमें पुरातत्व तत्व में शोधकार्य करने प्रेरणा देने के साथ साथ - कहीं सिफारिशों पर भी बात थी. पर नियुक्ति पर बात न बनी. वे पिताजी से उम्र में काफी बड़े (लगभग 30 वर्ष) थे. अपनत्व व प्रेम उनके पत्रों में झलकता था. शायद स्थान प्रभाव हो - दोनों सागर - नागपुर वि.वि. से जुड़े थे.

पिताजी स्वभावत: अकादमिक रुचि वाले थे. मंडला तथा अन्य क्षेत्रों से जुड़े उनके शोध पत्र देखने मिलते थे. बाद में उन्होंने अपनी बहुत सी अभिलेख सामग्री भांडारकर ओरियंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट-पुणे, प्रादेशिक पुरातत्व विभाग-म.प्र. व रानी दुर्गावती संग्रहालय, जबलपुर को दे दी. रानी दुर्गावती संग्रहालय, जबलपुर के लिये तो प्रतिष्ठित नागरिक, शिक्षक, भूतपूर्व महापौर श्री रामेश्वर गुरू स्वयं घर पर अपने 2-3 साथियों के साथ पधारे थे. मुझे याद है उन्होंने कहा था, मास्साब निश्चिंत रहिये यह निधि सुरक्षित व लोकोपयोगी रहेगी. उन्होंने कई पुस्तकों का प्रकाशन किया था. 'संस्कृत कथा तरंगिनी' के लिये राष्ट्रपति भवन से सर्वपल्ली डॉ. राधाकृष्णन का पत्र आया था।

अध्यापन में कभी साथ रहने के कारण श्री हरिशंकर परसाई जी से भी अच्छा परिचय था, जबलपुर व बाद में रायपुर में वे पिताजी से मिलने आते थे। एक बार वे ललित जी ( सुरजन) के साथ पेंशनवाड़ा, रायपुर मिलने आये थे.

स्त्री शिक्षा में भी उनकी काफी रुचि थी. कई छात्राओं को शालेय पढ़ाने वे उनके यहां पैदल ही जाते थे. वे छात्राएं उनकी मानस पुत्रियां हो जाती थी। उनमें से 2/3 पत्राचार से सम्पर्क में थीं और यह पत्राचार संस्कृत भाषा में होता था. इनके 100 एक पत्र, संस्कृत में मेरे पास रखे थे।

पिताजी का अंग्रेज़ी और संस्कृत भाषा पर समान अधिकार था, एक बार जब वे बैतूल में हाईस्कूल में पदस्थ थे, तब एक अंग्रेज़ उच्च अधिकारी बैतूल पधारे. उन्होंने पूछताछ- की कि यहां कोई ऐसा है जो मेरी बात को सभा में श्रोताओं को हिंदी में बता सके. सुनने वाले बताते हैं कि अंग्रेज़ महाशय द्वारा कहा गया वाक्य तुरंत श्रोताओं को हिन्दी में प्राप्त होता गया जिसका सबने आनंद भी उठाया।

पिताजी मदन महल स्टेशन से हनुमान ताल करीब 6-7 किलोमीटर पैदल पढ़ाने नियमित रूप से जाते थे। जबलपुर में उन्होंने एक मिशनरी संस्था 'लियोनार्ड थियोलोजिकल कालेज' में लगभग दो- तीन वर्ष उनके अत्यन्त आग्रह पर अपनी सेवाएं (1957 से 1959) दीं. पर, समयाभाव के कारण बाद भी में छोड़ दिया।

वे स्वास्थ के प्रति सजग थे, शाम को नियमित रूप से 4-5 किलोमीटर घूमने उनके जाने के पूर्व 1981 तक जारी रहा. वे मालवीय रोड, रायपुर तरफ से सब्जी भाजी खरीद लाते थे. एक दिन बच्चे और हम हतप्रभ हो गये जब हमने देखा कि वे हमारे घर से 2-3 किलोमीटर दूर गोल बाज़ार से पत्थर की सिल हाथों में उठाकर पैदल ही ले आये. बोले बट्टा ठीक नहीं मिला, इसलिये नहीं लाया.

हम पुत्र-पुत्रियों के जीवन को अच्छे से विकसित करने में निश्चित रूप से पिताश्री के साथ हमारी माँ की बड़ी भूमिका रही है. मां स्व. राधाबाई भावे वे एक धर्म-परायण महिला थीं. उन्हें नर्सिंग का बड़ा लगाव था, आज से 70-80 वर्ष पूर्व गांव जैसे-मोहल्ले में प्रसूतिगृह बहुत सीमित थे. मोहल्ले से सूचना आती थी कि मां जी चलिये, जचकी का समय आ गया है. उन्होंने कई जचकियां सफलतापूर्वक कराईं भी, वे तैराक भी अच्छी थीं. मंडला के नर्मदा घाट को कई बार तैरकर उन्होंने पार किया था.

लोगों ने पिताजी को समझाया कि उन्हें तैरने से रोकें, मगरमच्छ का डर है. फिर उन्होंने बंद कर दिया. वे पाक कला में निपुण थीं. हमारे यहां गुलकंद, नीबू का शर्बत और मुरब्बे बनते रहते थे.

ऐसे पितृ के पुण्य स्मरण में उनके चरणों में नमन.

—लेखक सेवानिवृत्त प्राध्यापक हैं.


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