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परीक्षा के सवाल, परीक्षा पर सवाल

देश में परीक्षाएँ अब केवल विद्यार्थियों की नहीं रहीं, बल्कि स्वयं परीक्षाओं की भी परीक्षा होने लगी है।

परीक्षा के सवाल, परीक्षा पर सवाल
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  • डॉ रामानुज पाठक

देश में परीक्षाएँ अब केवल विद्यार्थियों की नहीं रहीं, बल्कि स्वयं परीक्षाओं की भी परीक्षा होने लगी है। पहले विद्यार्थी उत्तर-पुस्तिका में उत्तर खोजते थे, अब वे समाचार चैनलों और सोशल मीडिया पर यह खोजते हैं कि प्रश्नपत्र पहले कहाँ पहुँचा था।

कभी परीक्षा ज्ञान की कसौटी मानी जाती थी, आजकल उसकी सुरक्षा ही सबसे कठिन प्रश्न बन गई है। विद्यार्थी रात-रात भर जागकर पढ़ते हैं, माता-पिता मनौतियाँ मानते हैं, शिक्षक मार्गदर्शन देते हैं और प्रश्नपत्र महोदय परीक्षा शुरू होने से पहले ही स्वतंत्रता की घोषणा कर देते हैं। लगता है कि संविधान में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सबसे अधिक लाभ प्रश्नपत्रों ने ही उठा लिया है।

परीक्षा केंद्र के बाहर अभ्यर्थियों की धड़कनें बढ़ती हैं और भीतर प्रश्नपत्र की प्रतिष्ठा घटती है। कुछ परीक्षाओं में तो ऐसा प्रतीत होता है कि प्रश्नपत्र और उत्तर कुंजी का संबंध गुरु-शिष्य जैसा नहीं, बल्कि जुड़वाँ भाइयों जैसा है—एक निकलता है तो दूसरा पीछे-पीछे चला आता है।

आजकल प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी दो भागों में होती है। पहला भाग पाठ्यक्रम का अध्ययन और दूसरा भाग यह अनुमान लगाना कि परीक्षा होगी भी या नहीं, और यदि होगी तो परिणाम आने तक वैध रहेगी या नहीं। अभ्यर्थी अब सामान्य ज्ञान के साथ-साथ यह भी सीख रहे हैं कि 'रद्द परीक्षा ','पुनर्परीक्षा' और 'जांच समिति' जैसे शब्दों का व्यवहारिक अर्थ क्या होता है।

विचित्र स्थिति यह है कि परीक्षा में पूछे जाने वाले प्रश्नों से अधिक प्रश्न स्वयं परीक्षा पर खड़े हो रहे हैं। विद्यार्थी से पूछा जाता है— 'भारत का संविधान कब लागू हुआ?' लेकिन विद्यार्थी मन ही मन पूछना चाहता है— 'परीक्षा प्रणाली में जवाबदेही कब लागू होगी?' प्रश्न आता है— 'नैतिकता का महत्व लिखिए।' और उसी समय समाचार पट्टी पर किसी नई परीक्षा में गड़बड़ी की खबर चल रही होती है।

कोचिंग संस्थान सफलता का प्रतिशत बताते हैं, अभ्यर्थी कटऑफ का हिसाब लगाते हैं और व्यवस्था जांच आयोगों का। ऐसा लगता है कि देश में दो समानांतर प्रतियोगिताएँ चल रही हैं—एक नौकरी पाने की और दूसरी परीक्षा को बचाने की।

सबसे बड़ा व्यंग्य यह है कि हर गड़बड़ी के बाद कहा जाता है कि दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा। यह वाक्य इतना अनुभवी हो चुका है कि अब उसे भी स्थायी सरकारी नौकरी मिल जानी चाहिए। हर बार वही आश्वासन, वही जांच, वही कड़ी कार्रवाई का वादा और फिर अगली परीक्षा में वही पुराना प्रश्नपत्र, केवल तारीख नई।

विद्यार्थी आज भी मेहनत कर रहे हैं। वे आज भी सपने देख रहे हैं। किंतु दुखद यह है कि उनकी तैयारी का मुकाबला केवल लाखों प्रतियोगियों से नहीं, बल्कि अनिश्चितताओं, लापरवाहियों और अविश्वसनीय व्यवस्थाओं से भी है। जब परीक्षा के सवालों से अधिक परीक्षा पर सवाल उठने लगें, तब समझ लेना चाहिए कि उत्तर-पुस्तिका नहीं, व्यवस्था को सुधारने की आवश्यकता है।

अन्यथा वह दिन दूर नहीं जब प्रश्नपत्र के पहले पन्ने पर लिखा होगा—

'समय : तीन घंटे '

और नीचे छोटे अक्षरों में—

'बशर्ते परीक्षा तब तक रद्द न हो जाए। '

सतना म प्र


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