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(संदर्भ : 26 अप्रैल 2026, विश्व बौद्धिक संपदा दिवस)-वाग्दायिनी

विरासत सिर्फ वह नहीं जो बंद तिजोरियों में रखी रहे,विरासत वह भी है जो चेतना में उतरकर सोच बन जाए।

(संदर्भ : 26 अप्रैल 2026, विश्व बौद्धिक संपदा दिवस)-वाग्दायिनी
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प्राची तिवारी 'छबि'

ंविरासत सिर्फ वह नहीं जो बंद तिजोरियों में रखी रहे,विरासत वह भी है जो चेतना में उतरकर सोच बन जाए। माता-पिता से प्रदत्त परंपराएं व संस्कार ताउम्र हमारा मार्गदर्शन करते हैं लेकिन इस बौद्धिक विरासत का असल उत्तराधिकारी कौन होता है? आइए जानने की कोशिश करें इस कहानी में।

हमारे आसपास कुछ ऐसे लोग होते हैं जो अपने जज़्बे और जुनून के चलते समाज में मिसाल बन जाते हैं, उनकी कहानी सबकीजुबांपर होती है; उन्हें 'रियल लाइफ हीरोज़' कहा जाता है, लोग उनसे प्रेरणा लेकर उनके जैसा बनना चाहते हैं। हालाँकि कठिनाइयाँ और संघर्ष तो सभी की जिंदगी में आते हैं पर कुछ उनमें डूब जाते हैं और कुछ अपनी सूझबूझ से पार उतर जाते हैं। उनमें से ज्यादातर लोगों के संघर्ष की कहानियाँ अनसुनी-अनजानी ही रह जाती हैं क्योंकि सबकी किस्मत इतनी अच्छी नहीं होती कि उन्हें उस स्तर की मान्यता अथवा पहचान मिल सके जिससे वे समुदाय या समाजपर अपना प्रभाव डाल सकें। ऐसे लोग 'अनसंगहीरोज़' कहलाते हैं। कुछ ऐसी ही कहानी है हमारी गार्गी -की।

गार्गी, एक उच्च मध्यमवर्गीय परिवार की सबसे छोटी बेटी।आज उम्र के चौथे दशक के उत्तरार्ध में प्रवेश कर चुकी गार्गीपरिस्थितिवश अविवाहित थी। शांत-सौम्य-सरलऔर अनुशासित गार्गी को'बेचारी अविवाहितलड़कीÓका टैग लगा चुके रिश्तेदार एवं पड़ोसी इस बात से सर्वथा अनभिज्ञ थे कि गार्गी अपने भीतर किसी सुप्तप्राय ज्वालामुखी की गहरी उथल-पुथल लिए हुए थी। उसके भीतर कितना कुछ टूटा पड़ा था, जिनसे दर्द बूंद-बूंद करके रिसता रहता था।

गार्गीअपने दो भाईयों की इकलौती बहन थी। पेशे से अध्यापक, उच्चकोटि के विद्वान पिता की शास्त्र, साहित्य और समाजतीनों पर विलक्षणपकड़ थी। घर के हर कोने से उनकी विद्वता और पांडित्य की झलक मिलती थीउन्होनें बेटी का नाम 'गार्गी' भी सोच-समझ कर ही रखा था- गार्गी अर्थात भारतीय दर्शन में स्त्री शक्ति और मेधा का प्रतीक। पिता अक्सर कहते थे कि जीवन का सबसे बड़ा धन सोचने की स्वतंत्रता है। गार्गी ऐसे ही माहौल को अपने भीतर सहेजकर बड़ी हो रही थी, किन्तु पिता के अचानक देहावसान ने जैसे पूरे घर से उसकी धुरी छीन ली। माँ का संसार एकदम बिखर गया, पर इस बिखराव में सबसे अप्रत्याशित थादोनों भाईयों का व्यवहार। जो भाई पिता के रहते परिवार से जुड़े हुए थे, सुशील एवं आज्ञाकारी पुत्रों के रूप में आस-पड़ोस और रिश्तेदारी में जिनकी मिसालें दी जाती थीं, वही पिता के जाने के बाद जिम्मेदारी से दूर हटते चले गए। औने-पौने पिता की चल-अचलसंपत्ति का मनमाना बंटवारा करके अपने-अपने परिवार सहित अलग हो गए। जिस समय माँ-बेटी को आर्थिक, सामाजिक और मानसिक आधार एवं सहयोग की सर्वाधिक आवश्यकता थी, उस समय दोनों भाईयों ने दूरी और उपेक्षा की दीवारें खड़ी कर लीं। माँ के प्रति उनका यही रवैया गार्गी के विवाह न करने की वजह बना।

गार्गी को यह बात कचोटती थी कि जिन भाईयोंसे इतनी उम्मीदें थीं, उन्होनेंही इस संकटकाल में सबसे पहले अपना रास्ता बदल लिया? माँ ने चुप लगा ली थी, गार्गीइधर-उधर की बातें करके उनका दिल बहलाने की कोशिश करती पर सब व्यर्थ। कभीकिसी रात वह तकिये में मुँह छिपाकर सिसक उठती तो माँ बिना कुछ कहे बस उसे सहला देतीं। माँ कहे भी तो क्या? वो खुद गहरे अकेलेपन से जूझ रही थीं, पति के बिछोह और बेटों की बेरुखी से। अपनों का उपेक्षापूर्ण व्यवहार इंसान को अंदर से तोड़कर रख देता है। यही वजह थी कि माँ जीवन के प्रति उदासीन हो गई थीं।

पिता के जाने के बाद उनकी बंद पड़ी अलमारी में सैकड़ों पन्ने, अधूरे लेख, पुराने शोध, व्याख्यानों के नोट्ससभी जस-के-तसरखे हुए थे। गार्गी जब-जब उन्हें देखती, उसके दिल में एक टीस उठती कि क्या ये वही व्यक्ति थे जिनकी वाणी सुनने के लिए लोग दूर-दूर से आते थे? जिनकी कलम समाज की चेतना को झकझोर देती थी? क्या उनका वैचारिक अस्तित्व भी इन पीले पड़ते पन्नों के साथ ही समाप्त हो जाएगा? एक दिन उसने दृढ़ता से अलमारी खोलकर पिता के सारे पेपर्स, नोट्स, डायरीज़मेज पर फैला लीं और अपने आप से कहा, 'नहीं! पिता की इस अनमोल बौद्धिक विरासत को ऐसे नष्ट नहीं होने दूँगी। भौतिक संपदा का बंटवारा तो कर लिया लेकिन इसे मुझसे कोई नहीं छीन सकता। 'बस यही वो क्षण था जिसने उसके जीवन की दिशा एवं दशा दोनों बदल दी।

उसने महीनों तक पिता के लेखों पर काम किया। दिन का समय वह माँ की देखभाल में लगाती और रातें इन कागज़ों के साथ बिताने लगी। कुछ पन्नों पर पिता की टिप्पणियाँ थीं, लाल स्याही से लिखे छोटे-छोटे वाक्य, उन्हें पढ़ते हुए कभी उसकी आँखें नम हो जातीं, कभी चेहरे पर हल्की मुस्कान उतर आती। यही वो समय था जब गार्गी ने पिता का सानिध्य पुन: महसूस किया, जैसे हर शब्द के पीछे उनकी आवाज़ गूँज रही हो।शनै:-शनै: गार्गीपिता के लिखे संसार में इस कदर रम गई कि उसका अपना दु:ख भीउन शब्दों की रोशनी में विलीन होने लगा। उसने पांडुलिपि तैयार की और कुछेक प्रकाशन संस्थानों से संपर्क किया। हर बार निराशा हाथ लगी पर वह हारी नहीं क्योंकि वह दृढ़-प्रतिज्ञथी और पिता के भरोसे को थामे हुए थी। अंतत: एक संस्था ने उस पांडुलिपि को प्रकाशित करने में रुचि दिखाई। जब पहली बार पुस्तक उसके हाथ में आई- मुख्य पृष्ठ पर पिता का नाम, नीचे छोटे अक्षरों में 'विचार-संग्रहÓ तो सहसा उसे यकीन नहीं हुआ, उसका कलेजा निकल पड़ने को हुआ,उसने पुस्तक माँ को थमा दी। उसे सीने से लगाते ही माँ की आँखों से जो अश्रुधारा निकली, वह अपने साथ पुराने सभी दुखों को, क्लेशों को बहा ले गई। अब उन आंखों में गर्व और संतुष्टि की स्निग्ध शीतलता थी क्योंकि बेटी का अटूट विश्वास और अथक परिश्रम रंग लाया था।

पुस्तक के लोकार्पण में शहर के गणमान्य नागरिकों, प्रबुद्धजनोंऔर छात्रों का जमावड़ा था। मंच पर सिकुड़ी-सिमटी बैठी गार्गी के मन में पुरानी स्मृतियाँ मानो किसी फिल्म की भाँति चल रही थीं। विमोचन उपरांत जब उससे पूछा गया कि पिता के विचारों को पुस्तक का स्वरूप देने का ख्याल दिमाग में कैसे आया? तो उसने गम्भीर स्वर में कहा, 'पिता ने मुझे सशक्त व स्वतंत्र सोच दी थी, पर भाईयोंके द्वारा की गई अवहेलना ने मेरे इरादों को मजबूती दी। मैंने जाना कि स्त्री का संघर्ष केवल बाहर नहीं, घर के भीतर भीहोता है। माता-पिता की विरासत केवल चल-अचल संपत्ति, धन-दौलत या मकान ही नहीं होते हैं। उनसे प्राप्त होने वाली सबसे अमूल्य धरोहर उनके विचार व संस्कार होते हैं, जीवन को देखने-समझने का उनका दृष्टिकोण होता है और परिस्थितियों से निपटने की वह क्षमता होती है जो वे अपने आचरण से संतान के मन में अंकित कर देते हैं।

धन समय के साथ खर्च हो सकता है, मकान ढह सकते हैं, पर माता-पिता द्वारा दी गई सोच, संस्कार और बुद्धि ऐसी विरासत है जो मनुष्य को भीतर से समृद्ध बनाती है और पूरे जीवन भर साथ चलती है। यह पुस्तक पिता को ही नहीं वरन समाज में हर उस व्यक्ति को समर्पित है जो विपरीत परिस्थितियों में भी कर्मरत रहते हुए स्वयं को बिखरने नहीं देता है। 'उसकी अंतर्मन से निकली इन बातों पर सभागार में देर तक तालियाँ बजती रहीं। उस क्षणगार्गीने पिता की उपस्थिति को गहनता से महसूस किया। लोगों ने कहा, 'आपने पिता के विचारों को नई पीढ़ी तक पहुँचाकर सच्ची श्रद्धांजलि दी है और उनके मूल्यों, उनकी वैचारिक धरोहर को आगे ले जाने का सार्थक प्रयास किया। 'आज गार्गीअपने विचारों से समाज के एक छोटे दायरे में ही सही, अपनी पहचान बना रही है लेकिन ये सब एक दिन में नहीं हुआ। अब लोग उसे एक 'बेचारीअविवाहित लड़की' के रूप में नहीं, बल्कि 'वाग्दायिनी' के रूप में पहचानते हैं जिसने अपने पिता की लेखनी को वाणी प्रदान की, माँ को संबलदियाऔर स्वयं को अपनी शर्तों पर समाज में स्थापित किया।वह यह सत्य जान चुकी थी कि जीवन जिन मार्गों पर कठोर परीक्षा लेता है, वे मार्ग ही चेतना को परिष्कृत कर उसे उसकी वास्तविक मंजि़ल तक पहुँचाते हैंऔर वो मंजिल उसे मिल चुकी थी सम्मान, पहचानऔर पिता की बौद्धिक विरासत को जीवित रखने से प्राप्त हुए संतोष के रूप में।


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