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'सीजेपी और पीजेपी का लोकतांत्रिक महाभोज'

राजनीति का सौंदर्य कभी विचारों की विविधता में था। अब विविधता दलों के नामों में बची है।

सीजेपी और पीजेपी का लोकतांत्रिक महाभोज
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  • डॉ रामानुज पाठक

कोकरोच जनता पार्टी का चुनाव-चिह्न शायद झाड़ू नहीं, बल्कि वह जीव होगा जो हर सफाई अभियान के बाद भी मुस्कराता हुआ किसी दरार से बाहर आ जाता है। उसका घोषणापत्र भी बड़ा वैज्ञानिक होगा— 'हम परिस्थितियों के नहीं, परिस्थितियाँ हमारी हैं।'

राजनीति का सौंदर्य कभी विचारों की विविधता में था। अब विविधता दलों के नामों में बची है। पहले जनता पार्टी थी, फिर उसके इतने संस्करण निकले कि वर्णमाला भी सोचने लगी— 'मेरे अक्षर राजनीति में अधिक उपयोग हो रहे हैं या विद्यालय में?' इसी क्रम में दो नए दलों की कल्पना कीजिए—सीजेपी अर्थात 'कॉकरोच जनता पार्टी' और पीजेपी अर्थात 'पिकनिक जनता पार्टी '। आश्चर्य मत कीजिए, यह केवल कल्पना है; किंतु कल्पनाएँ अक्सर वास्तविकता के बहुत निकट खड़ी मिलती हैं।

कोकरोच जनता पार्टी का चुनाव-चिह्न शायद झाड़ू नहीं, बल्कि वह जीव होगा जो हर सफाई अभियान के बाद भी मुस्कराता हुआ किसी दरार से बाहर आ जाता है। उसका घोषणापत्र भी बड़ा वैज्ञानिक होगा— 'हम परिस्थितियों के नहीं, परिस्थितियाँ हमारी हैं।' सत्ता बदले, व्यवस्था बदले, विचारधारा बदले, नारे बदलें, गठबंधन बदलें; किंतु कुछ चेहरे ऐसे होते हैं जो कोकरोच की जैविक क्षमता से प्रेरित प्रतीत होते हैं। वे हर राजनीतिक कीटनाशक के बाद और अधिक स्वस्थ दिखाई देते हैं।

इनकी सबसे बड़ी विशेषता है—जीवित रहने की असाधारण क्षमता। सिद्धांत इनके लिए वही है जो दीवार पर टंगी कैलेंडर की पुरानी तस्वीर—देखने भर की वस्तु। कल जिस विचारधारा को राष्ट्र-विरोधी बताते थे, आज उसी के साथ संयुक्त प्रेसवार्ता कर रहे हैं। राजनीति में इसे लचीलापन कहा जाता है; जीवविज्ञान इसे अनुकूलन कहता है; जनता इसे अवसरवाद के नाम से पहचानती है।

दूसरी ओर है पिकनिक जनता पार्टी। यह दल चुनाव को लोकतंत्र का पर्व नहीं, पर्यटन का पैकेज मानता है। इनके नेता जनता के बीच कम, रिसॉर्टों के बीच अधिक दिखाई देते हैं। सरकार बनने के बाद विधायक ऐसे गायब होते हैं जैसे परीक्षा के बाद छात्र पुस्तकें। फिर अचानक किसी पहाड़ी राज्य के किसी आलीशान होटल से सामूहिक तस्वीर आती है—चेहरों पर लोकतंत्र की चिंता कम और स्विमिंग पूल की ताजगी अधिक होती है।

इनकी बैठकों का एजेंडा भी बड़ा रोचक होता है—पहला विषय, नाश्ता; दूसरा विषय, भोजन; तीसरा विषय, रात्रिभोज; और यदि समय बच जाए तो सरकार बचाने पर भी विचार कर लिया जाएगा। लोकतंत्र इनके लिए जनता का विश्वास नहीं, पर्यटन उद्योग को बढ़ावा देने का अभिनव अभियान है।

विडंबना देखिए, कॉकरोच जनता पार्टी सत्ता के हर कोने में घुसने की कला जानती है, जबकि पिकनिक जनता पार्टी सत्ता के संकट को भी अवकाश यात्रा में बदल देने की प्रतिभा रखती है। एक दल कहता है— 'जहाँ अवसर, वहीं हमारा घर।' दूसरा कहता है— 'जहाँ रिसॉर्ट, वहीं हमारा लोकतंत्र। '

आज राजनीति में विचारधारा का स्थान वाई-फाई ने ले लिया है। जहाँ सिग्नल मजबूत, वहीं कनेक्शन। कल तक जो एक-दूसरे पर भ्रष्टाचार के जहरीले कीटनाशक छिड़क रहे थे, आज वही एक ही मंच पर लोकतंत्र की सुगंधित अगरबत्ती जलाते दिखाई देते हैं। चुनाव से पहले भाषणों में आग बरसती है, परिणाम के बाद वही आग बारबेक्यू बन जाती है और गठबंधन की पिकनिक शुरू हो जाती है।

जनता भी कम अद्भुत नहीं। हर पाँच वर्ष बाद वह नई उम्मीदों का पौधा लगाती है। कुछ समय बाद वही पौधा पोस्टरों, नारों और वादों की बेल में उलझ जाता है। फिर चुनाव आता है, पुराने वादों पर नया रंग चढ़ता है और लोकतंत्र पुन: रंगाई-पुताई के लिए तैयार हो जाता है।

कॉकरोच जनता पार्टी का दावा है कि वे हर परिस्थिति में टिकेंगे। पिकनिक जनता पार्टी का दावा है कि वे हर परिस्थिति में घूमेंगे। एक सत्ता के गलियारों की दरारें खोजती है, दूसरी सत्ता के संकट में पर्यटन स्थल खोजती है। जनता दोनों को देखकर सोचती है— 'क्या मेरा वोट विकास के लिए था या किसी नए यात्रा पैकेज के लिए? '

लोकतंत्र का सबसे बड़ा संकट यह नहीं कि दल अधिक हो गए हैं; संकट यह है कि कुछ दल विचारों से नहीं, परिस्थितियों से जन्म लेते हैं। उनका संविधान सुविधा की जेब में रहता है और उनका सिद्धांत मौसम विभाग की भविष्यवाणी की तरह प्रतिदिन बदलता है।

वस्तुत: लोकतंत्र की असली परीक्षा चुनाव में नहीं, स्मृति में होती है। यदि जनता भूलती रहेगी तो कॉकरोचों की जीवटता और पिकनिकबाजों की पर्यटन-नीति दोनों फलती-फूलती रहेंगी। जिस दिन मतदाता स्मरण शक्ति को मताधिकार का साथी बना लेगा, उसी दिन न कॉकरोचों की अदृश्य सुरंगें बचेंगी और न पिकनिक की बसें लोकतंत्र की दिशा तय करेंगी।

लोकतंत्र में दलों की संख्या नहीं, चरित्र की गुणवत्ता महत्वपूर्ण होती है। अन्यथा राजनीति धीरे-धीरे संसद से कम और कीट-विज्ञान तथा पर्यटन-विज्ञान का संयुक्त प्रयोगशाला-अध्ययन अधिक लगने लगती है।


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