भैया
वही भैया, जो हर रोज़ सुबह उसे उसकी पुरानी साइकिल पर बैठाकर स्कूल ले जाता था

- महेन्द्र तिवारी
वही भैया, जो हर रोज़ सुबह उसे उसकी पुरानी साइकिल पर बैठाकर स्कूल ले जाता था। उसकी पीठ से चिपककर वह बचपन की सुरक्षा को महसूस करती थी। वही भैया, जिसने उसे साइकिल चलाना सिखाया था। याद आया वो दिन जब वह गिर गई थी और घुटने से खून बह रहा था। तब भैया ने उसे गोद में उठाया और कहा था, 'रो मत, छोटी। गिरना कोई बड़ी बात नहीं, बस उठना आना चाहिए। फिर कोशिश कर।' उसके वो शब्द आज उसके कानों में गूंज रहे थे, पर आज वह खुद उठ नहीं पा रहा था।
वही भैया, जो हर महीने अपनी जेबखर्च से उसके लिए चॉकलेट लाता था और उसे बिस्तर के नीचे छुपा देता था, ताकि माँ को पता न चले। वही भैया, जो बचपन में उसके दोस्तों से लड़ पड़ता था अगर कोई उसे चिढ़ाता था। वह उसका हीरो था, उसका दोस्त, उसका रक्षक।
अस्पताल के एक कोने में वह खड़ी थी सबसे अलग, सबसे चुप। उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे, पर वह रो नहीं रही थी। शायद इतना बड़ा सदमा बच्चों के रोने की हद से परे होता है। वह बस देख रही थी अपने भैया को, जो आखिरी बार उसके सामने उस पतली सी बैड पर पड़े थे, मानो कोई थका हुआ यात्री विश्राम कर रहा हो।
उसके भीतर बार-बार अतीत की झलकियाँ याद आ रही थीं। वही भैया, जो हर रोज़ सुबह उसे उसकी पुरानी साइकिल पर बैठाकर स्कूल ले जाता था। उसकी पीठ से चिपककर वह बचपन की सुरक्षा को महसूस करती थी। वही भैया, जिसने उसे साइकिल चलाना सिखाया था। याद आया वो दिन जब वह गिर गई थी और घुटने से खून बह रहा था। तब भैया ने उसे गोद में उठाया और कहा था, 'रो मत, छोटी। गिरना कोई बड़ी बात नहीं, बस उठना आना चाहिए। फिर कोशिश कर।' उसके वो शब्द आज उसके कानों में गूंज रहे थे, पर आज वह खुद उठ नहीं पा रहा था।
वही भैया, जो हर महीने अपनी जेबखर्च से उसके लिए चॉकलेट लाता था और उसे बिस्तर के नीचे छुपा देता था, ताकि माँ को पता न चले। वही भैया, जो बचपन में उसके दोस्तों से लड़ पड़ता था अगर कोई उसे चिढ़ाता था। वह उसका हीरो था, उसका दोस्त, उसका रक्षक। पर आज वही हीरो बेजान पड़ा था उसके सामने और वह कुछ नहीं कर सकती थी। कोई चॉकलेट नहीं, कोई दवाई नहीं, कोई जादू नहीं जो उसे वापस ला सके। यह असहायता उसे अंदर से जला रही थी।
धीरे-धीरे, काँपते हुए कदमों से वह आगे बढ़ी। उसने अपना हाथ बढ़ाया और भैया के पैर छुए। वही पैर जो कभी उसके पीछे-पीछे दौड़ा करते थे, जो उसे दौड़ना सिखाते थे। पर आज वे पैर बिल्कुल ठंडे थे। बिल्कुल बेजान। उस ठंडक ने उसके हाथों से रिस कर दिल तक पहुँच कर उसे थर्रा दिया था।
उसने अपना मुँह अपनी छोटी सी हथेलियों से ढक लिया। वह चाहकर भी जोर-जोर से नहीं रो पा रही थी। गला रुँध गया था। आवाज़ नहीं निकल रही थी, मानो कोई उसके गले को पकड़े हुए था। बस एक शब्द उसके दिल में तालियों की तरह बज रहा था, 'भैया... भैया... भैया...' हर धड़कन इसी नाम को पुकार रही थी।
तभी एंबुलेंस की सायरन बजी और वार्ड बॉय बैड को धकेलने लगे। अचानक, उस लड़की में जैसे तूफान आ गया। वह दौड़ी। वह माँ की तरह सहज नहीं रो रही थी, न ही पिता की तरह खामोश खड़ी थी। वह बहन थी, और उसका दर्द बिल्कुल अलग था अधूरापन, टूटा हुआ साया। वह चीखी नहीं, दीवारें नहीं पीटी, बस एक सवाल पूछा, जिसमें उसकी पूरी दुनिया समा गई थी, 'भैया, तू जा रहा है तो बता, कल से मैं किसको कहूँगी भैया?'
एंबुलेंस के दरवाजे बंद हो गए और वह गाड़ी धुएँ के साथ निकल गई। वह वहीं सड़क के किनारे खड़ी रह गई। उसे लगा जैसे उसका बचपन भी उस एंबुलेंस के पीछे भाग रहा है। जैसे वह सारी यादें, वह सारी खुशियाँ, वह सारे पल सब धुंधले हो रहे हैं। धूप थी, पर उसे ठंड लग रही थी। लोग आ रहे थे, सांत्वना दे रहे थे, पर कोई शब्द उसके कानों तक नहीं पहुँच रहा था।
उस रात जब वह घर लौटी, तो घर उसे एक अजनबी जैसा लगा। दीवारों पर लगी तस्वीरें उसे घूर रही थीं। उसने अपने कमरे में जाकर देखा। वहाँ एक साइकिल खड़ी थी। भैया वाली। वह साइकिल जिस पर वह कभी पीछे बैठती थी और भैया तेज़ी से पैडल मारता था, और वह खुशी से चीखती थी। आज वह साइकिल भी रो रही थी। उसने उसे छुआ। हैंडल पर अभी भी भैया के हाथों की पकड़ महसूस हो रही थी। वह ज़मीन पर बैठ गई, साइकिल के पहिए को थामे हुए।
फिर वह रोई। चुपके-चुपके नहीं, बल्कि ज़ोर-ज़ोर से। इतना रोई कि उसकी आँखों ने उस रात सारे तेरह साल का दर्द बाहर निकाल दिया। वह उस साइकिल से लिपटी थी, मानो वह भैया को ही पकड़े हुए हो। उसे याद आया कि कैसे भैया उसके लिए हर मुश्किल आसान कर देता था। अब जि़न्दगी की सबसे बड़ी मुश्किल उसके जाने का दर्द को कौन आसान करेगा?
आज घर सूना है। पिता जी बरामदे में बैठे हैं, उनकी आँखों में बेबसी है। वे शब्द नहीं बोल रहे, बस ज़मीन को ताक रहे हैं। माँ कमरे में हैं, उनके आँसू थम नहीं रहे। और बहन? वह खामोश है। उसका सन्नाटा इतना गहरा है कि उसमें दर्द की चीखें सुनाई दे रही हैं। तीन दिल और एक ही दर्द। तीन रिश्ते पिता का साथ, माँ का स्नेह, बहन का सहारा एक ही चीख के साथ टूट गए।
चाँदनी रात भी अँधेरी लगती है, जब घर का दीया बुझ जाए। भैया, हरीश, उस घर का वो दीया था जो बिना तेल के भी रोशन करता था। वो शख्स जो दूसरों के लिए जीता था, जो अपनी खुशियाँ भी दूसरों में ढूँढता था,आज उनकी कहानी अधूरी रह गई।
भैया जहाँ भी होगा, वहाँ से वह भी देख रहा होगा। देख रहा होगा अपने पापा को जो अभी भी उसे दरवाज़े पर आते देखना चाहते हैं, अपनी माँ को जो उसकी प्यारी रसोई का इंतज़ार करती हैं, और अपनी बहन को जो उसकी साइकिल को थामे रो रही है। वह आसमान से शायद यही कह रहा हो, 'रो मत... मैं आज़ाद हूँ। मैं अब उस पार हूँ, जहाँ न दर्द है, न रोना है। मैं तुम्हारे दिल में हमेशा रहूँगा, हर याद में, हर मुस्कान में।'
जो लोग दूसरों के लिए जीते हैं, उनकी मौत कभी नहीं होती। वे बस नज़रों से ओझल हो जाते हैं, दिलों से नहीं। वह साइकिल, वो चॉकलेट की रैपर, वो पुरानी तस्वीरें सब उसे याद दिलाते रहेंगे कि एक भैया हुआ करता था, जो दुनिया का सबसे अच्छा भैया था। और वह लड़की, जिसने साइकिल संभाली है, वह एक दिन उसे चलाना सीखेगी। गिरेगी, सहारे ढूँढेगी, पर उठेगी ज़रूर। क्योंकि भैया ने कहा था, 'गिरना कोई बड़ी बात नहीं, बस उठना आना चाहिए। 'वह अभी हैं नहीं, पर उनकी आवाज़ उसके कंधे पर है। उनकी असीमित प्यार की छाया अभी भी है। और यह जीवन, जो उन्होंने छोड़ा है, उसे जीना उनकी बहन के लिए एक सबक है एक ऐसा सबक जिसे वह अकेले सीखेगी, पर भैया की याद उसके साथ सदा रहेगी।


