अटूट बंधन
चेन की आँखें अपने आप खुल गई थीं, मानो उनके अंदर कोई अलार्म बज रहा हो

- महेन्द्र तिवारी
सुबह के साढ़े चार बजे थे। रात का अंधियारा अभी पूरी तरह से हटा नहीं था और आसमान में तारे भी अपनी चमक खो चुके थे, मानो वे भी थककर सो गए हों। झेजियांग प्रांत के झोउशान गाँव की सुबहें आमतौर पर बहुत शांत होती हैं। समुद्र की ठंडी हवा गाँव के खाली रास्तों पर बेमतलब घूमती रहती है, लेकिन आज उस हवा में भी एक बेचैनी थी। गाँव की नींद तब भी गहरी थी, लेकिन 82 वर्षीय चेन अचोंग के घर में नींद का नामो-निशान नहीं था।
चेन की आँखें अपने आप खुल गई थीं, मानो उनके अंदर कोई अलार्म बज रहा हो। वे धीरे-धीरे अपने बिस्तर से उठे और अपनी पत्नी जू की ओर देखा। वह वहाँ नहीं थी। बेशक, वह अब घर पर नहीं थी, वह करीब 100 किलोमीटर दूर निंगबो के अस्पताल में आईसीयू की उस ठंडी चारदीवारी में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रही थी। चेन ने अपना एप्रन उठाया और भारी कदमों से रसोई की ओर चल पड़े। शरीर में थकान का बोझ ज़रूर था, पर चेहरे पर एक ऐसी अनकही दृढ़ता थी जिसे समय की मार भी धुंधला नहीं कर पाई थी।
रसोई छोटी थी और सालों के धुएं से दीवारें काली पड़ गई थीं, लेकिन आज उसमें जो महक फैल रही थी, वह दशकों पुराने प्यार की थी। चेन ने चूल्हा सुलगाया। लकड़ी की चटखने की आवाज और आग की सुनहरी लपटें उन्हें स्मृतियों के गलियारे में ले गईं। वे अपनी पत्नी जू के लिए भोजन बना रहे थे। जू के लिए बनाया गया वह भोजन दरअसल एक संदेश था कि वह अकेली नहीं है, और चेन का साथ आज भी उतना ही अटूट है।
उनके हाथों में झुर्रियाँ साफ दिखाई दे रही थीं, नसें फूली हुई थीं, लेकिन उन हाथों में एक अजीब सी फुर्ती थी। शायद यह फुर्ती प्यार की वो शक्ति थी जो उम्र की थकावट को भी हरा कर देती है। उन्होंने मछली को धीरे-धीरे साफ किया। जू को मछली बहुत पसंद थी। चेन को याद था कि कैसे जू हमेशा मछली का सबसे अच्छा हिस्सा उनकी थाली में रखती थी और खुद बचे-खुचे हिस्सों से संतोष करती थी। आज चेन उसी मछली को उस तरह पका रहे थे जैसे उन्हें पसंद था। कम मिर्च, ज्यादा रसा, और बस उंगलियों से मसले हुए स्वाद के साथ।
भोजन तैयार होने में एक घंटा लग गया। तब तक आसमान का रंग गहरे नीले से नीले में बदलने लगा था। चेन ने भोजन को ध्यान से एक स्टील के डब्बे में भरा और फिर उसे एक कपड़े में कई बार लपेटा ताकि ठंडा न हो। उन्होंने एक झोला उठाया जिसमें कुछ फल और जू के लिए घर का बना खाना था। वे घर से बाहर निकले।
सामने सड़क खाली थी। चेन के सामने कोई साधारण रास्ता नहीं था; यह एक ऐसा अभियान था जो एक 82 वर्षीय व्यक्ति के लिए लगभग असंभव था। 12 घंटे का सफर जिसमें छह घंटे जाने में और छह घंटे वापस आने में लगते थे। दो अलग-अलग बसों को पकड़ना, भीड़ में खुद को समेटना और बूढ़े पैरों से उस थकान को झेलना। और यह सब किसलिए? केवल उन 30 मिनटों के लिए जो उन्हें अस्पताल में मिलते थे।
पहली बस मिलने में उन्हें आधे घंटे का इंतजार करना पड़ा। सुबह की ठंडी हवा उनके सूती कपड़ों को भेदकर हड़्डियों तक पहुँच रही थी, लेकिन चेन को ठंड का अहसास भी नहीं था। उनका मन अस्पताल में पहुँचने की उड़ान भर रहा था। जब बस आई, तो वे धीरे-धीरे कदमों से सवार हुए। कंडक्टर ने उन्हें देखा और पहचान लिया। यह रोज का नजारा था।
'चेन अंकल, अस्पताल जा रहे हो?' कंडक्टर ने प्यार से पूछा।
'हाँ बेटा, जू को खाना देना है,' चेन ने मुस्कुराकर जवाब दिया।
बस की सीटें कठोर थीं और सड़कें उतार-चढ़ाव भरी थीं। हर झटके के साथ चेन के जोड़ों में दर्द उठता, लेकिन उनकी नज़र खिड़की के बाहर थी। पेड़, पहाड़ और छोटे-छोटे घर पीछे छूट रहे थे। वे अपने जीवन की फिल्म देख रहे थे। उन्हें याद आया वो दिन जब उन्होंने जू से शादी की थी। उन दिनों उनके पास बहुत कुछ नहीं था। न कोई बड़ा घर, न बहुत सारा पैसा। लेकिन उनके पास जू का साथ था।
जू एक आम गृहिणी नहीं थी; वह चेन के जीवन की धुरी थी। जब चेन खेतों में काम करके थककर लौटते, तो जू का हाथ उनके माथे से पसीना पोंछता था। वह घर को इतना सुंदर बनाती कि मिट्टी के फर्श भी किसी कालीन जैसे लगते। वह जानती थी कि चेन को क्या पसंद है, क्या परेशानी है। वे पचास साल से साथ थे। इतने सालों में दो लोग एक दूसरे के अंग बन जाते हैं। उनकी खुशियाँ और गम एक दूसरे से जुड़े होते हैं। अब जब जू बीमार थी, तो मानो चेन का आधा शरीर ही कट गया हो।
दूसरी बस पकड़ने के बाद स$फर और कठिन हो गया। भीड़ बढ़ गई थी। चेन को सीट नहीं मिली। वे खड़े रहकर स$फर तय कर रहे थे। उनके पैर काँपने लगे थे, लेकिन उन्होंने अपने हाथ में थमा झोला नहीं छोड़ा। वह झोला उनके लिए कोई सामान नहीं, बल्कि जू की जिंदगी की आशा था।
करीब छह घंटे बाद, दोपहर बारह बजे के करीब, चेन निंगबो अस्पताल के गेट पर थे। वे थके हुए थे, उनके कपड़े धूल से लथपथ थे और चेहरे पर थकान साफ झलक रही थी, लेकिन उनकी आँखों में एक चमक थी। वे अस्पताल के गलियारे से गुज़रे। अस्पताल की वह महक, दवाइयों की गंध और मरीजों के रोने की आवाजें यह सब चेन के लिए अजीब था, लेकिन वे डरे नहीं। उनका डर तब खत्म होता है जब वे जू को देखते हैं।
आईसीयू के बाहर उन्हें थोड़ा इंतजार करना पड़ा। वह नर्स का इंतजार कर रहे थे जिससे उन्हें अंदर जाने की इजाजत लेनी थी। उन तीस मिनटों के लिए वे पूरा दिन और अपनी पूरी जिंदगी दांव पर लगा दिए थे। जब नर्स ने दरवाजा खोला और साइन करने को कहा, तो चेन का दिल जोर से धड़कने लगा।
आईसीयू का कमरा ठंडा था। मशीनों की बीप-बीप की आवाजें चारों ओर गूँज रही थीं। बीच में एक बिस्तर पर जू पड़ी थी। उसके चेहरे पर ऑक्सीजन मास्क था और उसके शरीर से कई तरह की नलियाँ जुड़ी थीं। वह पहले जैसी नहीं थी। वह अब वह जू नहीं थी जो घर को सजाती थी, जो जोर से हँसती थी। लेकिन चेन के लिए वह वही थी।
चेन धीरे-धीरे उसके पास गए। उन्होंने अपना झोला एक कुर्सी पर रखा और जू का हाथ थाम लिया। वह हाथ ठंडा और पतला था। चेन ने उसे अपने दोनों हाथों में लेकर गर्म करने की कोशिश की।
'जू,' चेन ने धीमे से कहा, 'मैं आ गया। तुम्हारा खाना ले आया हूँ। तुम्हारी पसंद की मछली बनाई है। '
जू बोल नहीं सकती थी। वह एक वेंटिलेटर पर थी। लेकिन जब उसने चेन को देखा, तो उसकी आँखों में एक चमक आई। उसकी आँखें नम थीं। वह बोल नहीं पा रही थी, लेकिन उसकी नजरें सब कुछ कह रही थीं। वह कह रही थीं, 'तुम थक गए होगे। तुम क्यों आते हो रोज? '
चेन ने उसके बालों को हाथ से सहलाया। उन्हें लगा मानो समय ठहर गया हो। इन तीस मिनटों में वे दोनों अपनी दुनिया में होते थे। चेन ने कहा, 'जू, मुझे याद है जब हमारे बच्चे छोटे थे। हमारे पास पैसे कम थे, लेकिन तुमने कभी शिकायत नहीं की। तुमने मुझे हमेशा सहारा दिया। अब जब तुम थोड़े बीमार हो, तो मैं कैसे न आऊँ? '
उन्होंने उसे खाना खिलाने की कोशिश की, लेकिन जू बहुत कम खा सकती थी। बस कुछ चम्मच ही। चेन ने धीरे-धीरे उसे खिलाया, जैसे कोई माँ अपने बच्चे को खिलाती है। हर चम्मच के साथ उनकी उम्मीद जागती और डर भी बढ़ता। वे जानते थे कि जू का समय कम है, लेकिन वे उसे मानने को तैयार नहीं थे।
'जल्दी ठीक हो जाओ, जू,' चेन ने कहा, 'घर में तुम्हारे बिना सन्नाटा है। बगीचे में जो फूल लगाए थे, वे मुरझा रहे हैं। तुम्हें वापस आना होगा। '
तीस मिनट बाद नर्स ने संकेत दिया कि समय हो गया है। चेन का दिल भारी हो गया। हर दिन यह विदा उनके लिए किसी सजा से कम नहीं थी। उन्होंने जू का हाथ छोड़ा और उसे विदा करने के लिए मजबूर होना पड़ा।
'मैं कल आऊँगा, जू,' चेन ने कहा, 'मत डरना। '
यह सिलसिला 105 दिनों तक चला। 105 दिन आम आदमी के लिए यह अंक है, लेकिन चेन के लिए यह एक तपस्या थी। इन 105 दिनों में उन्होंने अपनी सारी जमा पूंजी खत्म कर दी। इलाज का खर्च आसमान छू रहा था। उन्होंने अपना घर बेच दिया, लेकिन चेन का हौसला नहीं डगमगाया। लोगों ने कहा, 'अंकल, अब छोड़ दो। उम्र ढल चुकी है।' लेकिन चेन ने कहा, 'जब तक साँस है, मैं उसे अकेला नहीं छोड़ सकता।'
इस अथक प्रयास ने समाज को भी रुला दिया। जब बसों के कंडक्टरों और ड्राइवरों को पता चला कि यह बूढ़ा आदमी रोज अपनी बीमार पत्नी से मिलने जा रहा है, तो उन्होंने उनसे किराया लेना बंद कर दिया। 'अंकल, तुम्हारा किराया माफ,' वे कहते। अनजान लोगों ने अस्पताल के बाहर उन्हें देखकर पानी पिलाया और कुछ लोगों ने मदद के लिए पैसे भी दिए। यह प्यार का ही असर था।
13 मार्च का वह दिन भी आ गया। चेन आम दिन की तरह ही अस्पताल पहुँचे। उन्होंने जू को खाना खिलाया। उस दिन जू ने आँखों से कुछ इशारे किए। उसने धीमे से सिर हिलाया। उसकी नजरें चेन पर टिकी थीं। मानो वह कह रही हो, 'चेन, मैं थक गई हूँ। तुमने बहुत किया मेरे लिए। अब मुझे तसल्ली है।' उसकी नजरों में एक गहरी संतुष्टि और विदा का भाव था।
चेन ने उसकी उंगलियों को छुआ और बोले, 'तुम ठीक हो जाओगी, जू। मैं कल आऊँगा।' यह कहकर वे बाहर निकले। वे नहीं जानते थे कि यह उनकी आखिरी बातचीत थी।
जैसे ही चेन अस्पताल के मुख्य द्वार से बाहर निकले और वापस जाने के लिए बस की तरफ बढ़े, उनके मोबाइल की घंटी बज उठी। स्क्रीन पर 'अस्पताल' लिखा हुआ था। चेन का दिल धड़कने लगा। उन्होंने फोन उठाया।
'हेलो? '
'मिस्टर चेन? आप तुरंत अस्पताल वापस आइए। मिसेज जू की हालत गंभीर है। '
चेन के हाथ से फोन छूट गया। उनके पैरों के नीचे की जमीन खिसक गई। उन्होंने दौड़कर अंदर जाना शुरू किया, लेकिन थके हुए पैर साथ नहीं दे रहे थे। वे गिरे, फिर उठे। उनकी साँसे फूल रही थीं। जब वे आईसीयू पहुँचे, तो डॉक्टरों और नर्सों का एक समूह जू के बिस्तरे के आसपास था। मशीनों की आवाज बंद हो चुकी थी। सीधी रेखा चल रही थी।
चेन ने चीख नहीं मारी, न ही जोर से रोया। वे बस उस बिस्तरे के पास गए जहाँ उनकी जू शांत पड़ी थी। अब वह मशीनों से मुक्त थी। उसका चेहरा शांत था, मानो वह सो रही हो। चेन ने कांपते हाथों में उसका हाथ थामा। वह हाथ अब और ठंडा हो चुका था।
उन्होंने अपने आँसू रोके और धीरे-धीरे अपने होठों से उसके माथे को छुआ। उन्होंने उसके कान में आखिरी बार कुछ फुसफुसाया। उनके शब्द भारी थे, लेकिन उनमें एक अद्भुत संतुष्टि थी।
'जू,' चेन बोले, आवाज टूटते हुए, 'इस जीवन में हमारा बंधन अब पूरा हुआ। तुमने मुझे कभी अकेला महसूस नहीं होने दिया। पचास साल तुमने मुझे खुश रखा। आखिरी 105 दिनों में मैंने कोशिश की कि तुम्हें थोड़ी राहत मिले। शायद अब तुम्हें आराम करना है। मैं तुम्हें कभी नहीं भूलूँगा। जब तक मेरी साँसे हैं, तुम मेरे साथ रहोगी। '
अस्पताल का वह कमरा उस दिन एक अलग ही शांति में डूब गया था। वहाँ मौत का शोक नहीं, बल्कि एक अमर प्रेम की विजय थी। डॉक्टर और नर्सें, जो रोज मौत देखते हैं, वे भी आँखें पोंछने लगे। एक बूढ़े आदमी का उसकी पत्नी के प्रति यह अंतिम समर्पण सबके दिलों को छू गया था।
चेन के लिए वह 105 दिन का सफर केवल एक रास्ता नहीं था; यह दो आत्माओं को जोड़ने वाला एक 'प्रेम का सेतु' था। उन्होंने अपनी इस यात्रा से यह साबित कर दिया कि मृत्यु शरीर को अलग कर सकती है, लोगों को भी अलग कर सकती है, लेकिन उस पवित्र समर्पण को और उस प्यार को कभी नहीं तोड़ सकती, जिसे आधी सदी तक साथ जिया गया हो।
उस शाम जब चेन अपने सूने घर में लौटे, तो दीवारों पर सन्नाटा पसरा हुआ था। मगर जू की खुशबू अब भी हवाओं में घुली हुई थी। खिड़की के पास खड़े होकर उन्होंने उस पुरानी राह को निहारा, जहाँ से वे रोज निकलते थे। वह रास्ता अब महज़ धूल और मिट्टी की पगडंडी नहीं थी, बल्कि उनके प्यार का गवाह बन चुका था। उन्होंने महसूस किया कि जू कहीं नहीं गई। वह फिजाओं में है, घर के हर कोने में है, और उनकी हर साँस में है।


