हृदय की गहराइयों से निकली आवाज, शब्द शाश्वत हैं
मनुष्य का शरीर एक न एक दिन नष्ट हो जाता है, लेकिन उसके द्वारा बोले गए या लिखे गए शब्द कभी नष्ट नहीं होते।

— स्वराज्य करुण
मनुष्य का शरीर एक न एक दिन नष्ट हो जाता है, लेकिन उसके द्वारा बोले गए या लिखे गए शब्द कभी नष्ट नहीं होते। कई मौखिक या लिखित शब्द हमारी यादों में समा जाते हैं या फिर पत्र -पत्रिकाओं और पुस्तकों में छपकर लम्बे समय तक हमारे बीच बने रहते हैं । जैसे रामायण और महाभारत जैसे कई कालजयी महाकाव्य।
शब्दों के बिना साहित्य सृजन नहीं हो सकता । साहित्यिक रचनाओं के शब्द मनुष्य को बताते हैं कि क्या बुरा है और क्या अच्छा? शब्दों की इसी महिमा के अनुरूप इंदौर के वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. अखिलेश शर्मा की तुकांत और अतुकांत कविताओं का संग्रह 'शब्द शाश्वत हैं ' शीर्षक से वर्ष 2025 में सामने आया है।
विगत पचास वर्षो से साहित्य साधना में लगे डॉ. शर्मा का यह पहला काव्य -संग्रह है, जिसकी पहली कविता 'शब्द और पंचतत्व' में कवि ने शब्दों की महिमा को अपने शब्दों में कुछ इस तरह रेखांकित किया है - शब्द जीवन हैं!
शब्द तैरते हैं हवा में
ऑक्सीजन बन कर,
शब्द प्राण वायु हैं!
शब्द बहते हैं नदी में, सागर में
अणु बनकर, परमाणु बनकर,
निर्मल जल के साथ ।
शब्द ब्रम्ह हैं,शब्द विचरण करते हैं,
नभ में, अंतरिक्ष में लयबद्ध ।
कोई भी सच्चा कवि या लेखक अपने समय की सच्चाइयों से मुँह मोड़कर साहित्य सृजन नहीं कर सकता। वह अपनी रचनाओं में मनुष्य के दु:ख -दर्द को अभिव्यक्ति देने के साथ ही समाज को सही दिशा में चलने की नसीहत भी देता है। डॉ. अखिलेश शर्मा की कविताओं में भी इसे महसूस किया जा सकता है।
संग्रह में प्रकाशित कविता 'मौन संभाषण ' में उन्होंने मनुष्य के हृदय और मस्तिष्क के बीच काल्पनिक संवाद के जरिए सामाजिक विसंगतियों को जिस अंदाज में उजागर किया है, वह वाकई मर्मस्पर्शी है -
हृदय कहता है -
आह! आज फिर एक चोट लगी
रोटी के अभाव में।
रोती हुई आत्माओं की आवाज़
सहन न कर सका मैं ।
चुप करने चला था, उस ओर,
रास्ते में टकरा गया
एक पूँजीपति के कठोर हृदय से ।
इस पर कवि के हृदय को सम्बोधित करते हुए मस्तिष्क कहता है -
पहले भी समझाया है तुम्हें अनेक बार,
क्यों जाते हो उन अँधेरी गलियों में,
जहाँ डरती है रौशनी भी जाने में?
वैसे तो संग्रह की सभी कविताएँ पठनीय हैं, लेकिन युद्ध के इस निर्मम दौर में लिखी गई उनकी कविता 'युद्ध! युद्ध! ' दुनिया में आज कहीं न कहीं युद्ध का माहौल है, जिसमें पीड़ित मानवता कराह रही है। अराजक और हिंसक वातावरण से व्यथित होकर कवि डॉ. अखिलेश शर्मा अपने इस संग्रह की कविता -'युद्ध! युद्ध! 'में लिखते हैं -
मानवता का करे संहार
युद्ध! युद्ध!
रुदन, क्रन्दन,
चीख़, पुकारें,
बारूदी सांसें -सिसकारें,
निर्दोषों पर अत्याचार,
युद्ध! युद्ध!
संग्रह की एक अन्य कविता 'जि़न्दगी पूछ रही ' में भी कवि ने युद्ध के घातक चक्रव्यूह में फँसी मानवता की पीड़ा को अपने शब्द दिए हैं -
जि़न्दगी पूछ रही मौत से सवाल।
मानवता टिकी हुई रेत के ढेर पर,
मानव इतरा रहा बारूद को देखकर।
शस्त्रों के ज़खीरे मचा रहे बवाल,
जि़न्दगी पूछ रही मौत से सवाल।
संग्रह में प्रकाशित 'बारूद का धुआँ ' शीर्षक अपनी एक छोटी -सी कविता में भी कवि ने युद्ध से उपजती विडंबना पर लिखा है -
ईमान बिक रहा है।
इंसान गिर रहा है ।
आँखें मूंदी हुई हैं,
होंठ सिल रहा है ।
बारूद का धुआँ फिर,
मृत्यु से मिल रहा है ।
मिट्टी के दीपक को प्रतीक बनाकर मेहनतकश कुम्हारों के प्रति कवि की संवेदना इन शब्दों में प्रकट होती हैं -
माटी के ये दीप सलौने,
करें उजाला कोने -कोने ।
मेहनत तो ज़्यादा है लेकिन,
दाम मिल रहे औने -पौने ।
प्रकाश पर्व दीपावली के संदर्भ में लिखी गई इस रचना की अंतिम चार पंक्तियों में आशावादी स्वर भी गूँजते हैं-
प्रकाश -पुंज की शक्ति समेटे
किंतु दिखने में लगते बौने,
दीपशिखा और तेल साथ में
चल पड़े हैं अँधियारा धोने ।
डॉ. अखिलेश शर्मा के संग्रह की कविताओं के कथ्य और शिल्प के साथ उनके शीर्षक भी पाठकों के दिलों को छू जाते हैं । जैसे - थके हुए शख़्स, बहा दो प्रेम की नदियाँ, किस तरह की बेबसी है, जि़न्दगी पूछ रही, सत्य क्यों लाचार, वह नदी ही तो है,आदि ।
अपने प्रथम संग्रह में 'आत्मकथन' के अंतर्गत कवि ने लिखा है - मैंने अपनी कविताओं में जिस जीवन को अभिव्यक्त करने की कोशिश की है, वह हमारे आसपास के प्रत्येक व्यक्ति का जीवन है -उनकी हँसी, उनके आँसू, उनके संघर्ष और उनकी उम्मीदें। यह संग्रह उन सभी अदृश्य नायकों को समर्पित है, जिन्होंने मेरी लेखनी को ऊर्जा और ताकत प्रदान की ।
डॉ. शर्मा के कविता संग्रह 'शब्द शाश्वत हैं ' में श्रीहनुमान चालीसा पर आधारित उनके 42 हाइकू भी शामिल हैं। इन्हें मिलाकर 140 पेज के इस संग्रह की कविताएँ 143 तक पहुँच जाती हैं । आवरण चित्र संदीप राशिनकर द्वारा बनाए गए हैं। दिल्ली और इंदौर के संस्मय प्रकाशन ने इसे प्रकाशित किया है। मूल्य है 375 रूपए।
उल्लेखनीय है कि एम. बी. बी. एस. और डी. सी. एच.तक शिक्षा प्राप्त डॉ.अखिलेश शर्मा शिशु रोग विशेषज्ञ हैं। वे मध्यप्रदेश सरकार के चिकित्सा अधिकारी के पद से सेवानिवृत्त हो
चुके हैं।


